इनको शायद पता नहीं है कि शब्दकोश में एक शब्द वीरगति नाम का भी है

रानी पद्मिनी के प्रसंग में मैं कुछ भी बोलने से बच रहा हूँ कि लोगों को लगेगा कि आखिर में इसमें भी जाति सेंटिमेंट जोर मारने ही लगा.

जबकि यहाँ आलम ये है कि जब मैं 2005 में कोलकाता से दिल्ली आया था तो मुझे ये भी नहीं पता था कि राजपूतों को ही ठाकुर कहते हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक मित्र ने जब एक दिन मुझे ठाकुर साहब संबोधित किया तो मैं उन पर बिगड़ पड़ा, जैसे उन्होंने मुझे कोई गाली दे दी हो.

मेरे अन्तरमन में ये बात समाई हुई थी कि ठाकुर मतलब अमरीश पुरी जैसा हिन्दी फिल्मों का गुंडा, ऐय्याश, बलात्कारी कोई विलेन.

फिर मेरे मित्र ने समझाया कि यूपी में राजपूतों को ठाकुर ही कहते हैं.

कोलकाता जैसे महानगर में शिक्षा-दीक्षा हुई, वहाँ हिन्दीभाषी कुछ मित्र बन गये, यही बड़ी उपलब्धि थी.

तब तक मेरा एक भी दोस्त राजपूत नहीं था. वहाँ राजपूतों के लिए बाबूसाहब का संबोधन तो सुना था, पर ठाकुर कभी भी नहीं सुना था.

ऊपर से बाबाओं के आश्रमों में फकीरों से यारी, अब ऐसे में किसे जाति की पड़ी है.

अब आदत ही पड़ गई है अपने जैसे लोगों को ही दिल के करीब आने देता हूँ.

जैसे ही पता चलता है कि सामनेवाले में जाति का जहर पड़ा हुआ है, उसे बिना बताये उससे दूरी बना लेता हूँ.

आजकल तो दूरी बनाने का मौसम ही चल रहा है. भला हो फेसबुक का जो कितनों का कृत्रिम पटल उघाड़ देता है.

शातिर लोग खुद कोई गलत पोस्ट नहीं डालते हैं, पर दूसरों के पोस्ट पर राजपूतों के प्रति नफरत भरी उनके कमेंट्स और दूसरों के कमेंट्स को आह्लादित होकर किया गया उनका लाइक, उनके मूल चरित्र को उजागर कर रहा होता है.

इन लोगों के स्तर पर हम जैसे लोग उतर भी नहीं सकते हैं कि किसी जाति की एकतरफा केवल कमियों को ही देखो.

एक मंदबुद्धि महाशय कह रहे हैं कि राजपूत अगर बहादुर थे तो हार कैसे गए?

इन साहब को ये भी नहीं पता कि बहादुरी का संबंध सिर्फ जीत और हार से नहीं होता है बल्कि अपने प्राणों के मोह का त्याग ही वीरता है. इनको शायद पता नहीं है कि शब्दकोश में एक वीरगति नाम का शब्द भी है.

11वीं शताब्दी में प्राकृत-अपभ्रंश के एक महान कवि हुए हैं. इनका नाम ‘हेमचंद्र’ था, ये एक जैन मुनि थे, उन्हें ‘प्राकृत का पाणिनि’ भी कहते हैं. इन्होंने जैन मुनियों के नैतिक उपदेशों का प्रसार करने के लिए साहित्य की रचना की.

ये कोई चारण कवि नहीं थे, जो अपने आश्रयदाता राजा की वीरता का अतिश्योक्तिपूर्ण गुणगान करते. इनकी धार्मिक रचना में उस समय के भारत के जनसामान्य की चेतना का सहज ही समावेश हो गया है.

वे लिखते हैं – ‘भल्ला हुआ जू मारिया बहिणी म्हारा कंतु। लज्जेजं तु वयंसिअहु जइ भग्गा घरू एंतु।।’ (एक महिला पनघट पर अपनी सखी से कहती है कि अच्छा हुआ मेरा पति युद्ध में मारा गया, अगर वो युद्ध में पीठ दिखाकर भाग आता तो मैं लज्जा से तुम लोगों को मुँह ही नहीं दिखा पाती).

एक दूसरा उदाहरण – ‘खग्ग विसाहिउ जहिं लहहुँ, पिय ताहि देसहिं जाहुँ। रण दुब्भिक्खें भग्गाइँ, विणु जुज्झें न बलाहुँ।।’ (नायिका प्रिय से कहती है कि मुझे उस देश ले चलो जहाँ तलवारों का व्यापार होता है. यहाँ तो युद्धों का अकाल पड़ गया है, बिना युद्ध के हम कमजोर हो जायेंगे).

वीरता एक पूरे समाज का गुण होता है. जहाँ पत्नियाँ वैध्वय को सहने के लिए तैयार नहीं होंगी, जहाँ मातायें अपने बेटों के लाश देखने को मानसिक स्तर पर तैयार नहीं होंगी, वहाँ वीरता दुर्लभ हो जायेगी. जनसामान्य के इसी सेंटिमेंट के गर्भ से वीरों का जन्म होता है.

यह वही समय है जिसे इतिहासकारों ने राजपूत काल कहा है. अधिकांश लड़ाइयाँ अहंकार के टकराहट या सुन्दर राजकुमारियों से विवाह के लिए लड़ी जाती थी.

एक आदर्श राजा उसे माना जाता था जो दशहरा समाप्त होने पर अपने पड़ोसी राज्य पर हमला कर दे. बेशक आप इनकी नीतियों की आलोचना कर सकते हैं पर आप इन्हें किसी भी दृष्टि से कायर नहीं कह सकते.

एक राजा तो अपने अहंकार और राजकुमारी की प्राप्ति के लिए लड़ रहा था पर हज़ारों सैनिक जो सिर्फ अपने सामंतों के आदेश पर अपने प्राणों को उत्सर्ग कर देते थे. अब ये मत कहियेगा कि उन्हें प्राण नहीं गँवाने चाहिए था, उन्हें इसका विरोध करना चाहिए था.

जब एक सिपाही को आज लोकतंत्र में बोलने का अधिकार नहीं है तो फिर उस राजतंत्र में तो ऐसे किसी विरोध की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.

जिस धर्म के शास्त्रों में ईश्वर से कामना की गई है कि हे प्रभु! अगर पुत्र हो तो, या तो भक्त हो या शूरवीर हो. उस धर्म के योद्धाओं की संततियों को आप भले ही कोई इल्ज़ाम लगा सकते हैं पर कायर नहीं कह सकतें.

आपको राजे-राजवाड़ों को जितना कोसना है कोसिए, पर प्रोटोकॉल में बंधे रह कर शहादत देने वाले लाखों हुतात्मा सिपाहियों को भी कभी याद कर लीजिए, जिन्हें समुचित सम्मान न तब मिला था न अब मिल रहा है.

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