The Man Who Knew Infinity के बहाने : गीता उपदेश

कहानी सीधी सी, नायक नायिका के प्रेम और बीच में खलनायक के टांग अड़ाने की ना हो, कुछ अलग हो, ऐसा सोचना हिम्मत का काम होता है.

फ़िल्में काफी खर्च, आर्थिक और समय दोनों लगा कर बनती हैं. इस वजह से जो चला-चलाया फार्मूला है, उस से कोई हटना नहीं चाहता.

लीक से हटकर सिंह और सपूत चलते हैं, ये कायरों का काम होता ही नहीं, ऐसे आशय की तो हिंदी कहावतें भी हैं.

स्थापित परिपाटी से बाहर जाना सत्ता को चुनौती भी हो जाता है, पुराने, जमे हुए इंडस्ट्री के लोग क्या कहेंगे-सोचेंगे, आगे समर्थन देंगे या विरोध होगा जैसे प्रश्न भी उठ आते हैं.

शायद ऐसे ही कारणों से भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन पर बनी एक अच्छी फिल्म ‘The Man Who Knew Infinity’ भी ब्रिटिश फिल्म है, भारतीय नहीं.

ये 2015 की फिल्म इसी नाम की रॉबर्ट कनिगेल (Robert Kanigel) की 1991 में आई एक किताब पर आधारित है, जो कि कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की कहानी दिखा रही होती है.

कहानी की शुरुआत में श्रीनिवास मद्रास में रहने वाले एक मामूली से मज़दूर हैं जो गरीबी रेखा से नीचे ही होंगे, ऊपर तो हरगिज नहीं.

उन्हें काम देने वालों को थोड़े ही दिनों में उनकी गणितीय, जोड़-घटाव, गुणा-भाग की आश्चर्यजनक क्षमता नज़र आने लगती है.

वो लोग धीरे से उन्हें मज़दूरी से, हिसाब किताब रखने के मुनीम टाइप काम में डाल लेते हैं.

अब कॉलेज तक शिक्षा लिए मालिक को जब दिखता है कि ये मुनीम से भी ऊपर की जानकारी वाला दिमाग रखता है तो वो लोग श्रीनिवास को लिखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वगैरह से उसके बारे में बात करना शुरू करते हैं.

ऐसी ही एक चिट्ठी जी.एच. हार्डी के पास भी पहुँचती है. हार्डी कैंब्रिज के मशहूर गणितज्ञ थे जो श्रीनिवास में रूचि लेते हैं. भारतीय प्रोफेसरों ने रूचि ली या नहीं, पता नहीं. श्रीनिवास रामानुजन कैंब्रिज गए थे, रूस नहीं, इसलिए वो वामपंथी तो नहीं थे, ऐसा तो माना जा सकता है.

श्रीनिवास रामानुजन शादी करते हैं, अपनी नौकरी जारी रखते हैं और धीरे धीरे उनका लिखा छपने भी लगता है. हार्डी उन्हें एक भावी गणितज्ञ के तौर पर जांचने के लिए कैंब्रिज बुला लेते हैं.

लम्बे समय के लिए विदेश जाने का मतलब परिवार-पत्नी से दूर रहना भी होता, वो पत्नी को चिट्ठियां लिखने के वादे के साथ रवाना होते हैं. उस समय का कैंब्रिज मतलब पहले विश्वयुद्ध के दौर का इंग्लैंड था, जहाँ ईसाईयों को लगता था कि काले लोगों का उत्थान तो उनके सर का बोझ है.

‘व्हाइट मैन्स बर्डन’ की मानसिकता से ग्रस्त इंग्लैंड में उनके लिए काफी समस्याएँ आती हैं, लेकिन उनकी गणित की प्रतिभा प्रोफेसर हार्डी पहचान चुके थे. अंग्रेजी भाषा कम जानने और लिखने का अभ्यास ना होने के कारण हार्डी चिंतित भी रहते हैं, पता नहीं श्रीनिवास प्रूफ ‘लिख पायेंगे’ या नहीं. धीरे धीरे श्रीनिवास रामानुजन पत्रिकाओं में छपने लगते हैं, उसी दौर में पता चलता है कि उन्हें टी.बी. है.

उनकी पत्नी को लिखी उनकी चिट्ठियों का जवाब नहीं आ रहा होता लेकिन व्यक्तिगत रूप से जिन दिक्कतों का सामना श्रीनिवास कर रहे होते हैं, वो प्रोफेसर हार्डी को नहीं बताते.

श्रीनिवास की तबियत बिगड़ती रहती है, लेकिन शोध में उनकी रूचि भी साथ साथ बढ़ती जाती है. प्रोफेसर हार्डी और दूसरे अध्यापकों की देख रेख में वो अपने रिसर्च में और आगे बढ़ते रहते हैं.

काफी वक्त बीतने पर जब श्रीनिवास की चिट्ठियां नहीं आ रही होती तो उनकी पत्नी खोजबीन करती है और उसे पता चलता है कि उसकी सास चिट्ठियां छुपा लेती थी.

उधर हार्डी की कोशिशों से आखिर श्रीनिवास की अनूठी प्रतिभा को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के नस्लवादियों को भी मानना पड़ा और उन्हें फेलोशिप दी गई. इसके बाद भी नस्लवादी और दूसरे धर्मों के लोगों को छोटा मानने की सोच की वजह से यूनिवर्सिटी में उन्हें फेल किया गया.

इसाई श्रेष्ठता जैसी मानसिकता से और घरेलू मुश्किलों से जूझते श्रीनिवास को आखिर फेलो माना गया लेकिन तबतक उनकी तबियत काफी बिगड़ चुकी थी.

उनकी पत्नी से उनकी मुलाकात होती है, लोग उन्हें एक गणितज्ञ के रूप में पहचानने भी लगते हैं लेकिन तब तक देर हो गई थी. घटिया मकान में रहते, इंग्लैंड के ठन्डे मौसम में उनकी तबियत का अब ठीक होना मुमकिन नहीं रहा था. पहचान मिलने के कुछ ही दिन बाद श्रीनिवास रामानुजन चल बसे.

उच्च शिक्षा में मौकों की कमी, आरक्षण जैसी वजहों से, खाली जगह होने के बाद भी बाहर धकेले जाते कई छात्रों को आसानी से इस फिल्म के श्रीनिवास रामानुजन में अपनी कहानी दिख जाएगी.

विचारधारा के झंडाबरदार और प्रमाणपत्र धारकों की आपसी रस्साकशी में पिसते छात्रों को भगवद्गीता के चौथे अध्याय का चौतींसवां श्लोक याद रखना चाहिए :

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।4.34।।

इस से ठीक पहले श्लोक में श्री कृष्ण बताते हैं कि ज्ञानयोग बेहतर है क्योंकि सभी कर्म और पदार्थ, ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं. इसमें बताते हैं कि कपट छोड़कर उचित तरीके से प्रश्न करने पर ज्ञानी तुम्हें वो सिखा भी देंगे.

यहाँ कपट छोड़कर या उचित तरीके से पूछना महत्वपूर्ण हो जाता है. लगातार द्वेष झेल रहे श्रीनिवास का चिढ़ा हुआ होना स्वाभाविक था. गरीबी, पारिवारिक समस्या, बीमारियों से झेलता क्षुब्ध व्यक्ति, नम्रता का गुण बचाए रखे ये मुश्किल भी रहा होगा. विनम्रता के बिना ज्ञान नहीं आता ये स्पष्ट कर दिया गया है.

गणित की फिल्म से ही जोड़कर ध्यान रखिये कि छठी क्लास के बच्चे को ग्रेजुएशन लेवल का कैलकुलस नहीं पढ़ाने लगते.

आचरेकर हर बच्चे को पकड़ कर क्रिकेट सिखाएं और वो तेंदुलकर हो जाए ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता.

आपका ध्यान इधर उधर ना भागे, थोड़ा ज्ञान बढ़ते ही दूसरों की खिल्ली उड़ाने में ना जुट जाएँ, ऐसी चीज़ों के लिए विवेक का होना जरूरी है. सही और गलत के बीच आपको हमेशा खुद ही चुनाव करना होता है.

कई बार कुछ चीज़ें इसलिए भी नहीं सिखाई जाती हैं क्योंकि वो बन्दर के हाथ उस्तरा देने जैसा होगा. सीख भी गए तो अपना ही नुकसान करेंगे. ऐसी स्थितियों के लिए आगे इसी अध्याय के अंत में कहा गया है :

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।4.39।।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।4.40।।

मतलब कि श्रद्धावान् तत्पर और जितेन्द्रिय ज्ञान प्राप्त करता है. ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है. बेवक़ूफ़, शक्की, खुद पे काबू ना रखने वाला नष्ट हो जाता है. ऐसों के लिये न यह लोक है न परलोक और न सुख.

ये वैसा है जिसे कभी कभी अर्थ देखते जल्दबाजी करने वाले लोग किताबों में इन श्लोकों का अर्थ देखें और वहां पुरुष लिखा देख के कहें ये तो पुरुषों के लिए है! ‘अरे स्त्रियों के लिए नहीं ये धर्म’ जैसा कोई छाती कूट कुहर्रम मचाना शुरू करने से पहले दोबारा देखिये कि संस्कृत वाले श्लोक में “पुरुष” या “स्त्री” जैसे शब्द हैं ही नहीं. जितेन्द्रिय या संशयी स्त्रीलिंग-पुल्लिंग दोनों पर लागू हो जाने वाले शब्द हैं.

बिना इन गुणों के खुद में विकास किये अगर कपट से आप ज्ञान पा भी लेते हैं तो आपकी ज्यादातर वही स्थिति होगी जो चर्च के कई बिशप-विकर जैसे अधिकारियों की हो चुकी है. यौन शोषण, बच्चों के साथ दुर्व्यवहार जैसी घटनाएँ कपटियों के ज्ञानी हो जाने पर होती हैं. कभी-कभी दूसरे धर्म-मज़हबों में भी इक्का-दुक्का ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे.

बाकी ज्ञान और ज्ञानयोग पर ये जो हमने धोखे से पढ़ा डाला वो नर्सरी लेवल का है. पीएचडी के लिए आपको खुद ढूंढ कर पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा?

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