कहाँ से निकलेंगे इस सदी के नए, अद्भुत और परिवर्तनकारी विचार

कई अर्थशास्त्रियों ने सम्पूर्ण मानव इतिहास की प्रगति को आंकने का प्रयास किया है.

अगर एक ग्राफ में इस प्रगति को दर्शाया जाए तो पाएंगे कि पिछले 10,000 वर्षो में हमारा सामाजिक विकास (आर्थिक प्रगति और औसत आयु) लगभग जमीन पर पड़ी एक सीधी लकीर थी, यानी कि कोई परिवर्तन नहीं.

18वीं सदी में भाप के इंजिन के आविष्कार के बाद उस लकीर ने ऊपर की ओर उठना शुरू किया.

20वीं सदी में बिजली, कंप्यूटर, बायोटेक्नोलॉजी इत्यादि जैसी तकनीकी के विकास से यह लकीर एकदम से उठकर सीधी 90 डिग्री के कोण पर खड़ी हो गयी.

जब मानवीय विकास स्थिर था, एक सपाट लकीर था, तब मानव जाति हज़ारों वर्षो तक एक नियमित मात्रा में ही अनाज, फल, और सब्जियां उगाती थी.

उस समय, हमारे पूर्वज किसी को अगर रोटी का एक टुकड़ा ज्यादा देना चाहते थे, तो वह किसी अन्य की रोटी से तोड़कर दिया जाता था, ना कि एक अतिरिक्त रोटी बना कर.

उस समय के धर्मो में सर्वात्मवाद का भाव (पौधों, निर्जीव वस्तुओं, और प्राकृतिक वस्तुओं में दैवत्व पर विश्वास) पाया जाता था जिनमें सनातन धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है.

इन धर्मो के अनुयायी, प्रकृति से जो मिलता था, उसी का भोग करके संतुष्ट रहते थे और प्रकृति की पूजा करते थे और अब भी करते हैं.

लेकिन बाद में जो सम्प्रदाय आये, उन्होंने सीमित भोजन, संसाधनों और आनंद की समस्या से निपटने का एक अनमोल उपाय खोज निकाला –

या तो इन सीमित संसाधनों का पुनः वितरण किया जाए, और अगर यह संभव नहीं हो तो इससे भी विशाल संसाधन और आनंद को परलोक में दिलाने का वादा किया जाये.

इसीलिये कुछ लोग जो इन सम्प्रदाय के अनुयायी होने का दावा करते हैं, जन्नत और हूरो की चाह में निर्दोषो का गला रेत देते हैं, काफिरो को मार डालते हैं, उनकी बच्चियों और औरतों से बलात्कार करते हैं. क्योकि उनके विद्वान पंडितों ने उन्हें शायद यही बतलाया है.

अब नयी तकनीकी और विचारधारा के विकास से वे दुविधा में है.

अब जब गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार होता है, तो विद्वान बुजुर्गो को समझ में नहीं आता कि इस छोटी सी गोली से कैसे निपटा जाये.

जब महिलाएं अपनी कोख पर अधिकार की बात करती हैं, तो वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते है. पुरुष और महिलाओ की बराबरी, तौबा, तौबा…!

अब आप सोचिये. इस सदी के नए, अद्भुत और परिवर्तनकारी विचार कहाँ से निकलेंगे? क्या उस विचारधारा से जो जन्नत, परलोक में ढूँढती है?

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