क्लियोपेट्रा और महारानी पद्मिनी की संस्कृति के बीच युद्ध में जो जीतेगा, वैसा ही होगा भारत का भविष्य

क्लियोपेट्रा नाम सुना है? जरूर सुना होगा. सदियों से पश्चिम का एक चर्चित नाम.

हिन्दुस्तान में भी अब ये नाम गली गली में जाना-पहचाना है. मगर हम शायद इसके बारे में कुछ अधिक नहीं जानते.

सिवाए इसके कि यह एक खूबसूरत महिला थी. इसलिए छोटे-छोटे कस्बों में भी अनेक ब्यूटी पार्लर इस नाम से मिल जाएंगे.

जबकि पढ़ते हैं तो पता चलता है कि यह सुन्दर उतनी नहीं थी जितनी अधिक चालक धूर्त और तेजतर्रार रही है. मगर उससे अधिक महत्वपूर्ण रहा इसका जीवन.

यूं तो यवन रानियों में यह नाम आम है, मगर हम जिस क्लियोपेट्रा की बात यहां कर रहे हैं, या दुनिया जिस क्लियोपेट्रा को जानती है वो मिस्र की सातवीं यवन रानी है, जो चर्चित हुई.

क्लियोपेट्रा को अपने पिता के बाद वसीयत अनुसार, अपने भाई के साथ सत्ता संभालनी थी, जो उसका पति भी था.

मगर वो पहले सीरिया भागी फिर जूलियस सीज़र के द्वारा अपने ही भाई की हत्या करवा कर सिंहासन पर बैठी और स्थानीय परम्परानुसार एक अन्य छोटे भाई के साथ मिल कर राज करने लगी.

मगर वो यहीं नहीं रुकी, उसने जल्द ही इस भाई को भी विष दे कर मार दिया और फिर रोम जाकर जूलियस सीज़र की कीप बन गई. जहां उसे एक पुत्र भी हुआ.

लेकिन जब रोम में इसका विरोध हुआ तो फिर यही क्लियोपेट्रा जूलियस सीज़र की हत्या का कारण भी बनी. बाद में वो भाग कर वापस मिस्र आ गई.

बात यहां खत्म नहीं होती, जूलियस सीज़र की हत्या के बाद, उसके विरोधी मार्क अंतोनी के साथ उसका लंबा प्रेम-प्रसंग चला.

और जब अंतोनी ओक्तावियन से युद्ध हार गया तो ओक्तावियन के कहने पर अंतोनी को मारने के लिए क्लियोपेट्रा तैयार भी हो गई और फिर बड़ी चतुराई से अंतोनी को मार भी दिया.

कहानी लम्बी है, मगर अब तक क्लियोपेट्रा के चरित्र (?) का अनुमान लगाया जा सकता है.

यहां अधिक हैरान करने वाली बात यह है कि इतने घिनौने षड्यंत्र की भागीदार, धोखे की महानायिका, एक सत्तालोलुप हत्यारन और चरित्रहीन, सदियों से पश्चिम की चर्चा का केंद्र रही है अर्थात उनकी संस्कृति का आदर्श.

उन दिनों का पश्चिम आज का यूरोप और पश्चिम एशिया ही माना जाएगा, अमेरिका तो कल पैदा हुआ बच्चा है.

ऐसा नहीं कि हिन्दुस्तान के इतने लम्बे इतिहास में कोई ‘क्लियोपेट्रा टाइप’ महिला ना रही हो. हो सकता है हुई हो, मगर वो आम जन में कभी चर्चा के केंद्र में नहीं रही. हम उन्हें नहीं जानते.

ये सभ्यता तो इतनी विशिष्ट है कि इसने कैकेयी को उसकी एक महाभूल के लिए भी कभी माफ़ नहीं किया. बल्कि हिंदुस्तान का कोई माता-पिता अपनी बच्ची का नाम कभी कैकेयी रखने की सोच भी नहीं सकता. इसलिए यह देवभूमि कहलाती है.

हमारी आदर्श महिलाएं अनेक हैं जिनका चर्चा हम करते रहते हैं. वे हैं शकुन्तला से लेकर रानी पद्मिनी और रानी लक्ष्मी बाई – रानी दुर्गावती, आदि आदि ऐसे अनेक नाम हैं जो हर युग और काल में हुए, जिनके नाम आते ही सुनने वाले के हृदय में श्रद्धाभाव सहज रूप से आ जाता है.

इस तरह पश्चिम और भारत के अपने अपने चर्चा के केंद्र और आदर्श रहे हैं. इन आदर्शों के माध्यम से दोनों सभ्यतायें कैसी रही होंगी इसकी सहज कल्पना की जा सकती है. और फिर दोनों संस्कृति का आगे क्या हुआ यह भी इतिहास में दर्ज है.

मिस्र से लेकर रोम और ग्रीस से लेकर सीरिया अपनी संस्कृति बचा नहीं पाए और आज भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं जबकि हिन्दुस्तान इन सभ्यताओं से कहीं अधिक प्राचीन होते हुए भी आज भी अपने गौरव के साथ उपस्थित है. जबकि उसने एक लंबा गुलामी का कालखंड भी भोगा है.

यहां सवाल उठता है कि अगर हमारी आदर्श भी क्लियोपेट्रा होती तो क्या हम बच पाते? नहीं, या तो हम सीरिया बन चुके होते या ग्रीस-रोम की तरह कंगाल या फिर मिस्र की तरह अपनी प्राचीन संस्कृति को अब तक भुला चुके होते.

मगर हिन्दुस्तान पर संकट के बादल अब भी छटे नहीं हैं. क्लियोपेट्रा की संस्कृति ने हिन्दुस्तान की कला, सिनेमा और बौद्धिक क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है, लेकिन आम जन मानस अब भी रानी पद्मिनी के जौहर से अपनी ऊर्जा लेता है.

इस वक्त हिंदुस्तान में, क्लियोपेट्रा और महारानी पद्मिनी की संस्कृति के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है. यह संस्कृति के बीच संघर्ष का संक्रमण काल है. देखना है इसमें कौन विजयी होता है. जो जीतेगा, भारत का भविष्य वैसा ही होगा.

मैं अपने तन, मन, धन और बुद्धिबल से महारानी पद्मिनी की संस्कृति का सैनिक हूँ. आप किस तरफ से युद्ध लड़ रहे हैं, यह आप को तय करना है. ध्यान रहे युद्ध (संक्रमण) काल में कोई तटस्थ नहीं रह सकता.

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