निर्णय है आप का, आखिर पैसा और दिमाग है आप का!

चेतावनी: यह लेख भद्र लोगों को बड़ी अभद्र लग सकता है. जिन्हें आपत्ति होने की आशंका है, आगे बढ़ें, इस लेख को नजरअंदाज कर दें. मैं लेख के विषय पर सार्थक बहस चाहता हूँ, न कि बेकार की नैतिक घालमेल! अतः सावधान!

मैं कभी कभार वो ‘गन्दी वाली’ वीडियोज़ देख लेता हूँ! दिल बहलाव के लिए, और उन में जो कलात्मक पहलू होते है उन की सराहना के लिए!

उन में कुछ खास नहीं होता है, बस एक ही उबाऊ क्रिया! तो वे लोग उस में दिलचस्पी कैसे पैदा करते हैं?

जवाब है “रोल प्ले”! यानी कुछ कहानी बनाओ, कुछ घटना का आधार लो, एक लड़की और एक लड़का (वैसे ये किसी भी उम्र के हो सकते है, बस वयस्क हो!) होना चाहिए.

उन्हें किसी बहाने इकट्ठा लाओ, और फिर ज्यादा बकवास न पेलते हुए उन्हें कपडे उतार कर मुख्य काम में लगा दो! उस के बाद कहानी नहीं चाहिए!

तो अमूमन इन वीडियोज़ को कलात्मक मूल्य या कहानी पर आंकना ठीक नहीं होगा! और लोग कहानी तो बस बहलाव के लिए चाहते है. मुख्य आकर्षण तक ले जाने के लिए कहानी उपयोगी होती है, और कुछ नहीं!

संजय लीला भंसाली की कलात्मक और बाज़ारू फ़िल्में छोड़ दें तो उन की बिग बजट फ़िल्में कुछ ऐसे ही होती है –
(1) हम दिल दे चुके सनम
(2) देवदास
(3) बाजीराव मस्तानी
(4) पद्मावती.

इन चारों फिल्मों में कुछ समानताएं है –
(1) चार में से तीन ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित है.
(2) चारों में संगीत महत्वपूर्ण है, और लोकसंगीत पर खास ध्यान है.
(3) इन के सेट और लोकेशन्स बड़ी महँगी है, और किसी भी कहानी के हिसाब से कहीं अधिक खर्चीले है.
(4) नायिकाएं सुन्दर और सजाई हुई है और उन से स्थानिक लोकगीतों पर आकर्षक नाच नचाए गए है.
(5) सारे कहानियों में प्रेम का त्रिकोण है
(6) प्रेमप्रसंगों को मूल कहानी से कहीं अधिक महत्त्व दिया है.
(7) मूल कहानी की भाव-भंगिमाओं को कोई महत्व नहीं है, मूल पात्रों के गाम्भीर्य को कोई स्थान नहीं दिया गया है.
(8) कहानी अपने ही ढंग से चला कर उसे काल्पनिक होने का एक नोटिस चिपका कर ऐतिहासिक सन्दर्भों को कूड़े में डालने का समर्थन है.

कुल मिला कर संजय लीला भंसाली के एपिक्स में कहानी की सार्थकता पर उतना ही जोर होता है जितना उन ‘रोल प्ले’ वाले वीडियोज़ में होता है. ‘सुन्दर लड़की – नायक – प्रेम – नाच – व्यवधान – नतीजा!’ इसी सांचे में से इन की सारी फ़िल्में निकलती है. और कोई ऐसा सोचता भी नहीं, यह कमाल की बात है!

लोगों के इस पैटर्न को सहन करने के कारण है! लोग फिल्म देखने क्यों जाते है? मनोरंजन के लिए! वह संजय लीला भंसाली कूट कूट कर भरता है फिल्मों में.
(1) सुन्दर लड़कियां – ऐश्वर्या राय, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा आज की सब से सुन्दर नायिकाएं है.
(2) बड़े बड़े सेट – हम दिल दे चुके सनम में एक सामान्य गायक की बड़ी हवेलियाँ होती हैं और कमाई की कोई चिंता नहीं होती है. बाकी फ़िल्में तो ऐतिहासिक सन्दर्भों के कारण सेट में खुली छूट देनेवाली थी, लेकिन उन में भी बाजीराव मस्तानी में मध्य एशियाई वास्तुकला और वेशभूषा प्रयुक्त हुई थी, वह भी छत्रसाल के महलों को दिखाने के लिए. संक्षेप में, दिमाग न चलाओ, बस आँखें सेंक लो!
(3) बड़े ही आकर्षक लोकसंगीत का प्रयोग कर नायिका नचाओ – डोला रे डोला, निम्बुडा, ढोली तारो ढोल बाजे, पिंगा, घूमर… सारे एक से एक बढ़कर लोकसंगीत पर आधारित गाने हैं, और उन पर सुन्दर लड़की का सुन्दर नेत्रोद्दीपक नाच देखने को मिले तो लोग ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर क्यों जाएं?
(4) थोड़ा शोख रंग भरो, थोडा स्थानिक परम्पराओं को सहलाओ. लोग खुश!

इतना कर के भी लोग फिल्म देखने आएँगे या नहीं, इस की कोई गारंटी नहीं होती. तब क्या किया जाए?

तब थोड़ी बहस छिड़वा दो. हम दिल दे चुके सनम के समय ऐश्वर्या और सलमान के प्रेम की बाजारगप्पें गर्म करवाओ, देवदास के समय साहित्यिक रचना के साथ प्रामाणिकता का मुद्दा छेड़ दो.

बाजीराव मस्तानी में काशीबाई का बाजारू नाच दिखा दो, जो कुलीन महिला कर ही नहीं सकती, एक अपाहिज की बात अलग! पद्मावती का खलनायक के साथ ड्रीम सिक्वेंस दिखा दो, या उस की बस बात ही छेड़ दो!

काफी है! लोग उछल उछल कर बहस करेंगे और देखने भी जाएंगे कि ये विवादित फिल्म आखिर है तो कैसी?

मुझे इस पैटर्न का अंदेशा बाजीराव मस्तानी के समय हो चुका था. तभी मैंने प्रण किया था कि केवल बड़े परदे पर बड़े सुन्दर अभिनेत्रियों द्वारा आप के चक्षुओं को ठंडक देने वाले आकर्षक नृत्य, भव्य सेट और बकवास कहानियां मुझे इस तरह की फ़िल्में देखने के लिए बाध्य नहीं कर सकती!

और मुख्य बात मुझे उल्लू समझने और साबित करने की है – संजय लीला भंसाली सोचता है कि मैं बस इन हथकंडों के चलते उस के वश में आ कर मेरे परिवार के 700-800 रूपए खर्च कर उस के कलेक्शन को बढाने का काम करूंगा!

ना! बिलकुल नहीं! मैंने बाजीराव मस्तानी और उसके आगे वाली उस की फ़िल्में नहीं देखी है, और आगे भी नहीं देखूँगा! मेरा परिवार भी नहीं देखेगा!

आप को सोचना है कि आप इस धूर्त की फिल्म्स किस तरह लेते हैं, और क्या आप को इस को अपना समर्थन देना चाहिए? निर्णय है आप का, आखिर पैसा और दिमाग है आप का!

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