प्रेम की नियति

उसने प्रेम को ट्रेन की खिड़की से चिप्स के पैकेट के रैपर की तरह मसल कर बाहर फेंक दिया. पता नहीं उसका मन भर गया था या उसे चिप्स की जगह चॉकलेट की ज़रूरत थी.

ये रैपर उड़ता रहा. तितलियों से लेकर इंद्रधनुष तक ने उस पर अपने होठों से हस्ताक्षर कर दिए. यह एक पतंग बन गया.

फिर एक उदास और उत्कंठित चौदह साल की लड़की ने इसे उछल कर पकड़ लिया. लड़की इस पतंग से प्रेम करने लगी. इस पतंग में सूर्य की ऊष्मा थी. फूलों का पराग था. इंद्रधनुष के रंग थे.

उस पगली लड़की ने कहा,
मैं इसे कभी मांझे के साथ नहीं बाँधूँगी. कट कर आई पतंग का कोई कैसे भरोसा करे कि वह फिर कहीं नहीं उलझेगी.

थक कर आई पतंग को लगा उड़ने से ज़्यादा आनंद है लड़की की छातियों से चिपके रहने में. उसके हृदय की धड़कनों में उमगते गीतों को सुनने में.

पतंग शरीर नहीं आत्मा थी जो इस चौदह साल की लड़की की नाज़ुक हथेलियों में कैद हो गई थी.

अब लड़की उस रंगीन पतंग को लेकर रोज़ छत पर आती है. हवा से चहक-चहक कर बातें करती है. सहेलियों को अपनी पतंग दिखाती है और चुपके से अपने घर में लौट आती है. वह चाहती है
वह सदा पतंग के साथ उड़े.

पतंग तो हम सब लूट लेते हैं
पर उड़ना शरीर की नहीं मन की क्रिया है
इतना सिर्फ यह बुद्धू लड़की ही जानती है.

प्रेम की तो यही नियति है.

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