राष्ट्रवादियों, पुराने नियमों के साथ नए फॉरमेट में खेलेंगे तो जीतेंगे कैसे आप

दो दिनों से सोशल मीडिया और मीडिया पर राहुल गांधी छाये हुये हैं.

उनका लगभग एक मिनट का वीडियो सामने आया है जिसमे उन्होंने आलू से सोना बनाने की मशीन की बात की है और लोगों ने उस पर खूब चटकारे लिये है.

लोगों ने जहां इस वीडियो को खूब शेयर किया है वही उन्होंने अपनी कल्पनाशीलता को पंख देते हुये एक से एक आमोद प्रमोद की पोस्ट भी लिखी हैं.

राहुल गांधी की इस वीडियो का यह प्रभाव यह हुआ कि खुद कांगेस पार्टी भी रक्षात्मक मुद्रा में आ गयी थी.

प्रथम दृष्टया पूरे भारत के साथ कांग्रेस पार्टी ने यह मान लिया था कि यह एक असली वीडियो है जिसमे कोई वॉइसओवर नहीं हुआ है.

हां, यह अलग बात है कि शाम तक यह भी साफ हो गया था कि यह हिट वीडियो अपने में पूर्ण नही है.

राहुल गांधी ने अपनी सटायर करने की प्रतिभा का प्रदर्शन करने के लिये, तंज़ कसते हुये यह सब बातें मोदी जी पर थोपी थी.

अब जब सोशल मीडिया पर लोगों को यह पता चला कि आलू से सोना बनाने की मशीन वाला वीडियो अपने में पूरा नहीं है तो जहां राहुल गांधी प्रेमी सेक्युलर वर्ग बहुत आक्रोशित हुया, वहीं राष्ट्रवादियों का एक वर्ग भी इस बात से बेहद खफा है.

मैं इन दोनों वर्गों की आज की प्रतिक्रिया के कारणों को अच्छी तरह समझता हूँ और मुझे उनकी इस छटपटाहट पर सहानभूति से ज्यादा विस्मय है.

यदि सेक्युलर वर्ग के छाती पीटते हुये क्रंदन को ध्यान से सुना जाय तो यह क्रंदन वीडियो के एक हिस्से को दिखाए जाने के आक्रोश से ज्यादा इस बात की शर्मिंदगी है, कि वो भी राहुल गांधी की वीडियो के उस दिखाए गये हिस्से को सत्य मान कर, कल सरे बाजार मुँह छिपाए पकड़े गये थे.

इस माने गये सत्य को मैं राहुल गांधी की उनके समर्थकों के बीच उनकी विश्वनीयता मानूंगा!

इसका कारण यह है कि राहुल गांधी के पिछले इतिहास व उनके सामान्य ज्ञान की ऊंचाइयों से अच्छी तरह परिचित भारत मे, राहुल गांधी के प्रचार तन्त्र ने एक ऐसा वातावरण बना दिया है कि प्रथम दृष्टया उनके आलोचको के साथ उनके समर्थक भी उनसे इसी तरह की ऊलजलूल बातें किये जाने की अपेक्षा रखते हैं.

राहुल के समर्थक राहुल बाबा की हर बात को सत्य मानते हुये, उसका आंख बंद कर के समर्थन करने को अब अपनी नीति और नियति मान चुके हैं.

अब आते है राष्ट्रवादियों के उस वर्ग की जो शुचिता की मांग भरे व आदर्शो की चूड़ियां पहने, बीजेपी से इस लिये नाराज़ है कि पार्टी के लोगों ने धूर्तता दिखाई और अपूर्ण वीडियो सामने लाकर, कुल की इज्जत को दागदार कर दिया है.

वो रुष्ट इस लिये है क्योंकि बीजेपी के नये नेतृत्व ने शिष्टता और आदर्शो को सर माथे पर रख कर, गुलाल के साथ साथ, कीचड़ में उतर कर कीचड़ से होली खेलना सीख लिया है.

यह लोग वह भद्र लोग हैं जो बदलते समय और बदलते मापदंडों के अनुसार ढलने की बजाय अपने समय और मापदंडों पर ज्यादा विश्वास करते हैं.

इनका रुष्ट होना ठीक वैसा ही है जैसे 70 के मध्य में ‘एक दिवसीय क्रिकेट’ की शुरुआत होने पर भारत के, उस समय के विश्व के सर्वश्रेठ सलामी बल्लेबाज सुनील गावस्कर रुष्ट हुये थे.

गावस्कर भद्र क्रिकेट खिलाड़ी थे जो 5 दिवसीय टेस्ट मैच की मानसिकता में कैद हो कर 60 / 60 ओवर के मैच की कल्पना भी नहीं कर सकते थे.

वो क्रिकेट में इस बदलाव से न सिर्फ रुष्ट थे बल्कि इस फॉरमैट के क्रिकेट के प्रति उनको वितृष्णा भी थी.

गावस्कर ने अपने इस आक्रोश को प्रदर्शित किया था और तिरस्कार स्वरूप इन्होंने इसको प्रदर्शित करने के लिये इंग्लैंड में 1975 में खेले गये ‘प्रथम विश्वकप’, जिसे ‘प्रूडेंशियल कप’ कहा जाता था, में लॉर्ड्स के मैदान पर भारत के इंग्लैंड के विरुद्ध खेले गये पहले मैच को चुना था.

इंग्लैंड ने पहले बैटिंग कर के 60 ओवर में 4 विकट खो कर 334 बनाए थे. जब भारत की बैटिंग आयी तब इस क्रिकेट के नये फॉरमैट से असहज भारतीय टीम अपने 60 ओवर में 3 विकट खो कर सिर्फ 132 रन बना पायी थी और वह मैच 202 रन से हार गयी थी.

इस मैच में 62 की स्ट्राइक रेट पर 37 रन जी आर विश्वनाथ ने बनाए थे और अंशुमान गायकवाड़ ने 47 की स्ट्राइक रेट पर 22 रन बनाए थे.

लेकिन सुनील गावस्कर जो ओपनिंग बल्लेबाजी पर आए थे वे अजेय (नॉट आउट) रहे थे!

उन्होंने पूरे 60 ओवर खेल कर 174 गेंदों का सामना करते हुये, 20 की स्ट्राइक रेट पर 36 रन नॉट आउट बनाए थे. वह गावस्कर के खेल जीवन का सबसे शर्मनाक दिन था.

आज भी गावस्कर कभी भी अपनी इस पारी के बारे मे बात नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि जिस खेल के वह बादशाह रहे हैं वे उसी खेल का तिरस्कार करने उतरे थे और अंत मे खेल तो नहीं बदला, लेकिन उन्होंने 80 के दशक के आते आते अपने खेल को एक दिवसीय क्रिकेट के लायक बना दिया था.

ऊपर का उदाहरण इस लिये दिया है क्योंकि भारत की राजनीति के खेल का फॉरमेट कई दशकों पहले ही बदल चुका था लेकिन उसके महीन पहलुओं पर पकड़ न होने कारण बार बार अच्छी टीम पिटती रही है.

जब अटलबिहारी बाजपेयी जी का आधा अधूरा वीडियो जिसमे मोदी जी को राज धर्म के पालन करने की शिक्षा दी जा रही है, तब सब जानते हुये भी अटलबिहारी जी/ आडवाणी जी की टीम कुछ नही कर पायी थी और बरसों सेक्युलरों ने उसको भुनाया है.

तब राष्ट्रवादी सिर्फ सेक्यूलरों को गाली दे रहे थे लेकिन अपनी टीम को जिता नहीं पाए थे.

आज भी मोदी जी द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री के हैसियत से जीएसटी का विरोध करने वाला सम्पादित वीडियो खूब चला है और स्वयं राष्ट्रवादियों ने भी उसको बढाया है लेकिन अब यह टीम खेल के इस फॉरमैट की पैतरेबाजी सीख रही है और तुरन्त ही उस झूठ को उजागर कर दे रही है.

मैं मानता हूं यह रुष्ट राष्ट्रवादी, शुद्धता की कसौटी पर खरे हो सकते हैं लेकिन आज 60 ओवर में नॉटआउट रह कर 36 रन बनाने वाले गावस्कर की जरूरत नही है.

गावस्कर से सीखिये और अपनी शुचिता व भद्रता को चूल्हे में डाल कर नए फॉरमेट में सफल होने की तैयारी कीजिये क्योंकि अब तो 60 ओवर क्या 50 ओवर से भी तेज 20-20 का फॉरमेट तैयार है!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY