ओल्ड स्कूल फेसबुकिया

तरीका वही है जो पहले था. कम मित्र रखो, सुखी रहो.

किसी भी फेसबुकिया प्रोफ़ाइल की रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट करते समय प्रोफ़ाइल पिक जरूर देखना चाहिए, उसमें मित्र या रिश्तेदारों के कमेंट्स न् हों तो मानकर चलिये कि फेक होने के चांस बहुत हैं.

फेक न भी हो तो लाइफ डांवाडोल जरूर है. कुछ खोज रहा होता है ऐसा जातक. खुद के मुंह न लगाएं, दूसरों को क्या मुँह लगाना. पहला सफर वहीं से शुरू होता है. भरमार है.

अजीबोगरीब नाम वाले तो महाबोगस नजर आते हैं. अपने ही नाम पर कैसी शर्म? धड़ाके के साथ नाम सहित रहना चाहिए.

जो नहीं रह पाता वो किस कारण से करता है मुझे तो नहीं पता पर मेरे काम का नहीं रह जाता. होती होंगी किसी की मजबूरियां. मजबूर लोगो से ही जुड़ना चाहिए. अपने पास तो टेम नहीं शरलॉक होम्स खेलने का. सीधी सी बात है.

लिस्ट में है तो मित्र ही मानता हूं, शत्रु रिक्वेस्ट तो होता नहीं. फिर उसके अलावा आपके आसपास कुछ ही फिगर्स होते हैं. अलग अलग नेचर और क्वालिटी वाले. उनसे दो चार बात शेयर हो जाये तो ठीक बाकी अपने अपने रास्ते. जो हो काम की बात हो.

लिखना छोड़ सा दिया था, कुछ मन में आया तो वापिस लिखने का मन होने लगा. जुड़ता मैं कम ही हूँ, पर मन से जुड़ता हूँ, मन हां कर देता है तभी.

सभी सम्मानीय ही होते हैं, कुछ ढीले होते हैं, कुछ तेज होते हैं, अलग अलग बंधन में पड़ा भिन्न भिन्न स्तर का आत्मप्रकाश होता है. उस अवस्था में बात हो जाती है.

टेक्निकल स्तर की पोस्ट्स अलग से निश्चित सूचना सहित होती हैं, इमोशनल पोस्ट अनिश्चित भाव में अपना मार्ग खोज रही होती है. इसी बात को सूंघ कर अलग अलग प्रतिक्रियाओं का प्रयोजन भी होता है. तरीका वही पुराना है, सरलतम बात ही कहना. उससे पहले, जो पता हो वही कहना, बाकी राम राम कर देना.

तो कैसे हैं मित्रों!

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