मस्जिद सरयू पार और काशी-मथुरा हिन्दुओं के, मुस्लिमों को इन पर कैसे मनाएंगे श्रीश्री

अयोध्या विवाद में बातचीत का क्रम तो वीपी सिंह के जमाने से ही चल रहा है.

1990 में तत्कालीन PM वीपी सिंह ने आडवाणी जी की रथयात्रा टलवाने के लिए बातचीत की.

इस वार्ता में अन्य तमाम सुझाव थे, उनमें एक मुख्य सुझाव था ढांचे को यूं ही रख मंदिर निर्माण इसके ऊपर हो जाये जिसका गर्भगृह ज्यों का त्यों ही मंदिर का हिस्सा रहेगा.

लेकिन विश्व हिन्दू परिषद (VHP) यहाँ बाबरी का कोई भी अवशेष अयोध्या में शेष नहीं देखना चाहती थी…

VHP ने बाबरी के बदले में दूसरी मस्जिद के लिए अपना पक्ष हमेशा ही साफ़ रखा कि हिन्दू समाज मस्जिद अपने ही खर्चे से बनवा कर दे देगा, लेकिन वो मस्जिद अयोध्या परिक्रमा मार्ग से बाहर सरयू पार ही हो सकती है…

क्योंकि VHP नहीं चाहती थी कि कोई भी अवशेष विश्व स्तर पर हिंदुओं की गुलामी का स्मारक बन कर मुसलमानों का सबसे बड़ा टूरिस्ट सेंटर बन कर उभरे.

तब VHP ने उक्त ढांचे को उस समय तक चलन में आ चुकी भवन स्थानांतरण तकनीकी को अपना कर बाबरी ढांचे को स्थानांतरित करने का सुझाव दिया.

तब भाजपा की बैसाखी पर टिके वीपी सिंह ने मुस्कराते हुये विहिप नेताओं से कहा “ढांचे को तो आपके बजरंगी ही उठा के रख देंगे, इस समय फिलहाल इस मामले को टलवाओ.”

1990 की कारसेवा पर अयोध्या में मुलायम द्वारा किए गए हत्याकांड ने बातचीत की उक्त मधुरता को लुप्त ही कर के रख दिया था…

इसके बाद चंद्रशेखर जी के समय भैरौ सिंह शेखावत को विश्वास में लेकर वार्ता चली…

मामला बस हल होने को ही था… मुस्लिम पक्ष का कहना था ‘हम बाबरी पर दावा छोड़ देंगे लेकिन आगे कोई और विवाद दूसरी मस्जिदों पर ना हो…’

मुस्लिम पक्ष से पूछा गया “विश्वास कैसे होगा?” तब मुसलमानों ने कहा ‘बस संघ और अशोक सिंहल जी मुंह से ही कह दें.’

तब इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी और विश्वास आने पर संघ/VHP ने कहा कि वे पूरे भारत की हर एक विवादित मस्जिद या दूसरे निर्माण के लिए लिखित वादा करने को तैयार हैं… लेकिन काशी मथुरा के लिए नहीं…

मुस्लिम नेताओं से कहा गया कि साथ के साथ सारा विवाद निपट निपट जाएगा… वे 3000 मस्जिदों को छोडने को तैयार हैं, बस काशी मथुरा और अयोध्या दे दो…

इसी पॉइंट पर मामला बिगड़ गया…

अब 6 दिसंवर 1992 को ढांचा ध्वस्त हो गया था… पूरे भारत में नारा गूंज रहा था “ये तो पहली झांकी है काशी मथुरा बाकी है.”

तब बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा करने वाले नरसिम्हाराव से लेकर अटल जी तक वार्ताओं के ना जाने कितने ही दौर अधिकृत और अनाधिकृत रूप से चले… ना जाने कितने ही फॉर्मूले आए.

लेकिन हर बार बात दो बिन्दुओं पर बिगड़ती रही…
पहला- VHP और संघ का आगे के लिए काशी मथुरा पर अपना दावा ना छोड़ना
दूसरा – कोई भी मस्जिद अयोध्या परिक्रमा मार्ग से बाहर सरयू पार बनना.

अब देखना ये है कि श्री श्री इतने ज़ोर शोर के प्रचार के साथ पंच बन कर अपने को पेश कर रहे हैं… क्या ये इन दो बिन्दुओं पर किसी भी पक्ष को समझा पाएंगे!

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