तुम हिन्दुस्तान की जीत का जश्न नहीं, एक पराजय के दुखद अंत को बेचना चाहते हो

संजय लीला भंसाली,

क्या तुमने बाहुबली फिल्म देखी है? नहीं देखी होगी, क्योंकि तुम कुंठित मानसिकता और हीन भावना के शिकार आदमी हो.

वैसे तुम्हे इतिहास पर फिल्म बनाने का शौक हैं, तो तुम्हे पता होना चाहिए कि बाहुबली फिल्म ने इतिहास रचा है.

पता है उसकी सफलता का राज? उसकी सफलता का राज उसकी भव्यता और फिल्मांकन मात्र नहीं है बल्कि उसका कथानक और उसका प्रस्तुतिकरण है.

कहने को तो यह फिल्म काल्पनिक है मगर हर कल्पना की तरह इसके सूत्र भी कहीं धरातल की हकीकत से जुड़े हैं. जिसके तार फिर हिन्दुस्तान के जन जन से जुड़ गए. जिनके मन में एक आक्रोश है, जो हजार साल से अब तक ना दबाया जा सका ना बुझाया जा सका.

याद करो बाहुबली प्रथम का मध्यांतर बाद का निर्णायक युद्ध, जिसमें एक जंगली कबीले के वहशी दरिंदों से एक शक्तिशाली राज्य और सभ्य समाज की अनुशासित सेना का सामना होता है.

उन बाहरी आक्रमणकारी दरिंदों के किसी भी दानव को जब माहिष्मती की सेना का कोई भी सिपाही मारता है तो दर्शक झूम उठता है. पता है क्यों? क्योंकि आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व ऐसे ही दरिंदों ने हम पर आक्रमण किया था.

इतिहास में उसका परिणाम चाहे जो रहा हो, मगर उस हार की टीस आज भी जनमानस में है, यही कारण है जो फिल्म में हीरो की विजय का जयघोष जनता ने ऐसा किया कि फिल्म ऐतिहासिक रूप से सफल हो गई.

यह हमारे इतिहास की उस पराजय का बदला था, वो हार जिसका कारण हमारी कमी से अधिक आक्रमणकारियों की दरींदगी थी, मगर हमने अपनी पूरी हार कभी नहीं मानी.

तभी तो एक फिल्म में भी एक काल्पनिक विजय को अपने दिल से लगाया और जिसकी खुशी में दर्शकों की आँख में आंसू उतर आये थे. और फिर उसने अपनी तालियों की गड़गड़ाहट से बाहुबली द्वितीय का ऐसा स्वागत किया कि जिसने फिर सारे रेकॉर्ड तोड़ कर निर्माता निर्देशक को हमेशा के लिए अमर कर दिया.

क्या बाहुबली को यही सफलता तब भी मिलती अगर माहिष्मती युद्ध हार जाती? नहीं, फिर चाहे फिल्म में शिवागामी जौहर ही क्यों ना कर लेती.

तुम चाहे जितनी नौटंकी कर लो, बाहुबली जैसी सफलता कभी नहीं पा सकोगे क्योंकि तुम हिन्दुस्तान की जीत का जश्न नहीं मनाने जा रहे बल्कि एक पराजय के दुखद अंत को बेचना चाहते हो. हमे पता है तुम इस पराजय में हमें कोई सन्देश भी नहीं दोगे.

तुम तो उन बर्बर दरिंदों को मानव के रूप में दिखाना चाहते हो. अगर यह नहीं होता तो तुम खिलजी के लिए एक चॉकलेटी रणवीर को नहीं लेते. क्या तुमने बाहुबली प्रथम का वो राक्षस खलनायक देखा है? क्या वैसा वीभत्स व्यक्तित्व रणवीर का बन सकता है?

नहीं! तुम्हारे मन में खोट है! वरना तुम उसी रणवीर को नहीं लेते जो इसके पहले बाजीराव बन चुका है. यह वही रणवीर है जो ना तो बाजीराव के महान व्यक्तित्व के साथ न्याय कर पाया और ना अब खिलजी जैसा दानव ही बन पायेगा.

याद रखना, यह सप्त सिन्धु की भूमि है. यह देवभूमि है. ये विशिष्ट आदिभूमि है. यह जमीन का एक मात्र भूखंड नहीं, दुनिया में यही एक ऐसी सभ्यता संस्कृति है जो इन बर्बर जंगली लोगों के सामने आज तक हिमालय की तरह खड़ी है.

वरना इन कबीलों की बर्बता के सामने ईरान जैसा शक्तिशाली साम्राज्य भी अधिक समय तक नहीं टिक पाया. यह तलवार की नोक पर चली आंधी सिर्फ हिन्दुस्तान में आकर कमजोर पड़ गई. पता है क्यों?

क्योंकि यहां पद्मावती जैसी महान नारियां थीं. पद्मावती जिस आग में कूदी उसकी ज्वाला फिर कभी शांत नहीं हुई. वो असंख्य हिन्दुस्तनियों के दिल में सदियों से जल रही है. तुम्हें क्या लगता है तुम्हारी फिल्म पद्मावती को सम्मान दिलवाएगी या इस फिल्म से उन्हें पहचान मिलेगी?

अरे नहीं मूर्ख, ये नाम सैकड़ों साल की लंबी गुलामी में भी जन जन के दिलों में ज़िंदा रहा, और आज भी है और आगे सदियों तक रहेगा. पश्चिम एशिया के पास एक भी पद्मावती नहीं थी इसलिए वो सब उस कबीली संस्कृति के सामने मिट गए, जबकि हमारे पास तो अनगिनत पद्मावती थीं जिनके बलिदान से हम आज भी ज़िंदा हैं.

इस देश में भी कई रानियों ने उन राक्षसों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. मगर वे फिर किस दानव के किस हरम की किस कोठरी में मरीं होंगी, इतिहास भी नहीं जानता. इतिहास जौहर को याद करता है समर्पण को नहीं.

हिन्दुस्तान युद्ध में जीत पर जश्न मनाता है, लेकिन अपनी पद्मावती के बलिदान पर आक्रोशित होता रहा है और आज भी है. और जब तक ज़िंदा है तब तक आक्रोशित रहेगा. आज अगर पद्मावती के लिए सारा हिन्दुस्तान आक्रोशित है तो इसका मतलब ही है कि ये राष्ट्र अभी ज़िंदा है. और एक ज़िंदा कौम से टकराना ठीक नहीं भंसाली, पद्मावती की आग में भस्म भष्म हो जाओगे.

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