उनकी विदेशी साइबर सेना से मनोवैज्ञानिक युद्ध में बहुत आगे है मोदी सेना

Military Science… सैन्य विज्ञान… जी हां… युद्ध का भी एक विज्ञान है…

सो Military Science में एक Term है, Psychological Warfare… मनोवैज्ञानिक युद्ध.

युद्ध में तो बड़ी पुरानी कहावत है, क्या करेगी तैयारी… लड़ेगी जीदारी…

इतिहास गवाह है कि युद्ध में मुट्ठी भर सैनिकों ने विशाल सेनाओं को मात दी है.

समझदार सेनापति वो, जिसका शत्रु लड़ने से पहले ही हथियार डाल दे.

शत्रु को युद्ध से पहले ही मानसिक रूप से तोड़ दो, कमज़ोर कर दो.

सैन्य इतिहास में दर्ज है कि मुस्लिम आक्रांता मुट्ठी भर सैनिक ले के आये और उन्होंने हमारी विशाल सेनाओं को पराजित पददलित किया और देश को मनचाहा लूटा.

हमारे सैनिक वीरता में उनसे कतई कम न थे, पर Psychological Warfare में हमारी सेनाएं मुस्लिम आक्रांताओं के सामने कभी न टिक पायीं.

पुराने ज़माने में Persian सेनाएं Egyptians से लड़ते हुए अपने सामने बिल्लियां रख लेते थे…

और बिल्लियां देख के Egyptians हथियार रख देते थे क्योंकि उनकी धार्मिक मान्यताएं बिल्ली मारने की इजाज़त नही देती थीं.

महमूद ग़ज़नवी और गौरी, राजपूतों से लड़ते हुए अपने सामने गायें खड़ी कर लेते थे.

मुस्लिम आक्रांता युद्ध से पहले शत्रु को संदेश भेजते थे कि सरेंडर कर दो. और संधि कर लो.

‎जो शत्रु नही मानता था और जिसके साथ युद्ध करना पड़ता था, उसे पराजित कर पूरे शहर और राज्य में कत्लेआम का आदेश दे दिया जाता था…

कत्लेआम में फिर सेना के साथ साथ पूरी की पूरी साधारण जनता को भी क़त्ल कर दिया जाता था… गर्भवती औरतों और दुधमुंहे बच्चों को भी नही छोड़ा जाता था…

इस से पड़ोसी राज्यों को संदेश जाता था कि या तो बिना लड़े आत्मसमर्पण कर दो या फिर समूची जनसंख्या के कत्लेआम के लिए तैयार रहो…

ऐसे में राज्य की स्थानीय जनता, नागरिक अपने राजा और अपनी सेना पर युद्ध न करने और बिना लड़े ही सरेंडर करने का दबाव बनाते थे…

यही Psychological Warfare था…

जिस देश की जनता ही मानसिक रूप से युद्ध के लिए तैयार नहीं, जो नागरिक युद्ध की विभीषिका झेलने को मानसिक रूप से तैयार नहीं, जिस देश की civilian population ही अपने राजा और अपनी सेना के पीछे नहीं खड़ी वो क्या खाक युद्ध लड़ेगा???

‎राजा और उसकी सेना अपनी खुद की जनता के दबाव में ही टूट के बिना लड़े आत्मसमर्पण कर देते थे…

‎यही है Psychological Warfare…

‎पुराने ज़माने में मंगोल आक्रांता चंगेज़ ख़ाँ जब किसी किले पर घेरा डालता तो शाम के धुंधलके में अपने सैनिकों के हाथ मे 3 मशालें पकड़ा देता… जिससे शत्रु को एक विशाल सेना का भ्रम होता था.

‎आगे बढ़ती सेनाओं के घोड़ों की पूंछ में झाड़ू बांध दिए जाते थे जिससे कि धूल का एक विशाल गुब्बार उठे और शत्रु को एक विशाल सेना का भ्रम हो…

युद्ध से पहले सैनिक तरह तरह के करतब दिखाते थे, शस्त्र बजाते, चमकाते कोलाहल करते थे.

चंगेज़ ख़ाँ की सेना के पास ऐसे तीर थे जिनमें सीटियां लगी होतीं, जब उन्हें हवा में छोड़ा जाता तो उनकी आवाज़ सुन के ही शत्रु सेना का हौसला टूट जाता था…

इसके अलावा एक और बड़ा हथियार ये इस्तेमाल किया जाता था कि युद्ध से पहले शत्रु के राज्य में propoganda war छेड़ के राज्य की सेना और प्रजा में राजा के खिलाफ असंतोष भड़का दिया जाता था…

अलोकप्रिय राजा नहीं लड़ सकता… सेना को युद्ध से पहले ही psychological warfare में पराजित कर दिया जाता था…

‎पिछले एक हफ्ते से गुजरात के चुनाव में चिहाड़ मची है.

‎सबसे पहले कांग्रेस के सबसे बड़े तारणहार, Leader Of Masses, जननेता, हरदिल अज़ीज़, पाटीदार हृदय सम्राट की काम क्रीड़ा की CD मार्किट में आ गयी.

अभी उसका गुब्बार थमा भी न था कि पाटण की एक रैली में युवराज मुंह से आलू खा के शुद्ध 24 कैरट स्वर्ण मुद्राएं निकालते हुए पकड़ा गए…

‎गुजरात का चुनाव कोई सामान्य चुनाव नहीं, पूरा युद्ध है… कांग्रेस इस युद्ध में पूरी तैयारी से उतरी थी.

सोशल मीडिया पर तेम मोदी से लड़ने के लिए बाकायदे विदेशी कंपनियों को ठेका दिया गया था…

आगाज़ भी बहुत शानदार हुआ था… दे tweet पे Tweet और retweet हो रहे थे.

कज़ाकिस्तान और इंडोनेशिया, थाईलैंड में बैठे साइबर योद्धा, मोदी-अमित शाह की साइबर सेना के खिलाफ उतार दिए गए थे.

व्हाट्सएप पर ‘विकास गांडो हो गयो छे’ चल पड़ा था…

युवराज ने इतनी ज़ोर से मूता, ऐसा मूता, और उस मूत से ऐसी झाग उठी कि एकबारगी तो लगा कि पूरा गुजरात ही बह जाएगा… पर मूत के झाग से सुनामी नहीं आती मितरों…

‎सिर्फ दो दिन में मोदी जी की साइबर सेना ने राहुल गांधी को सर्टिफाइड पप्पू घोषित करा दिया है…

‎आज देश भर में कांग्रेस का कार्यकर्ता बेचारा हताश-निराश है… किस-किस को समझाए और कैसे समझाए कि राहुल गांधी ने सचमुच आलू खा के सोना नहीं निकाला है…

‎राहुल गांधी की आलू फैक्ट्री ने कांग्रेस की पूरी टीम को हतोत्साहित कर दिया है… सत्य यह है कि मनोवैज्ञानिक युद्ध में मोदी सेना बहुत आगे है…

मोदी से लड़ने भर, न ताक़त जुटा पाओगे, न मोदी सेना जितना कमीनापन ला पाओगे. 18 दिसंबर को कत्लेआम होगा… 2019 बिना लड़े जीतना है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY