नोटबंदी – 2 : अर्थशास्त्र और पारिस्थितिकी विज्ञान का अंतर समझ नहीं पाये हम

अब धीरे धीरे भारतीयों के व्यापार का विस्तार हुआ और विदेशों में भी माल आने जाने का कार्यक्रम हुआ. तब विदेशों के व्यापार के लिए विनिमय का माध्यम बनी स्वर्ण मुद्राएं.

रोम की संसद में तीसरी शताब्दी का वर्णन है जिसके अनुसार पता चलता है कि विश्व का लगभग 60% सोना भारत देश ही ले जाता है.

ईसा के 600 वर्ष पूर्व के आसपास के प्रमाण आज उपलब्ध है कि चीन और भारत चाँदी और सोने से ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार करते थे.

चन्द्रगुप्त के काल में ईसा से लगभग 350 वर्ष पहले चाँदी के रुपये को रूप दिया सिक्के के रूप में. उसी के साथ स्वर्ण रूपा और ताम्र रूपा भी बनाया गया. यद्यपि अनेक स्थानों पर चांदी से विनिमय होता था.

इसका अर्थ है कि व्यापार में भारत के सामान की इतनी मांग थी. अभी तक भी भारत देश में क्योंकि कृषक ही प्रधान था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अनुसार अनाज ही विनिमय का एक मात्र साधन था.

सन 1770 में पहली बार बैंक ऑफ हिंदोस्तान ने आंतरिक उपयोग के लिए कागज़ के रुपये को चलाया था, उस समय तक ब्रिटानिया साम्राज्य भारत पर हावी हो गया था.

परंतु कोई भी बैंक अपने पास रखे गए चाँदी के कुछ अंश के अनुपात में ही नोट छापता था. अभी तक अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में स्वर्ण मुद्रा का ही चलन था.

देश की आंतरिक व्यवस्था अभी भी अपने आवश्यकतानुसार विनिमय पर ही आधारित थी. जब ब्रिटानिया साम्राज्य ने पूरे भारत पर अपना कब्जा कर दिया तो उस समय कि सरकार ने Coinage Act Of India 1835 के माध्यम से इस चांदी के रुपये को कानूनन सर्वमान्य करवाया.

आपको ध्यान होगा कि ब्रिटीश सरकार ने कानून बना बना कर भारत देश की व्यवस्थाओं को तोड़ा था. इसी में से एक यह व्यवस्था भी थी. इसको लागू करने का कारण यह था कि सम्पूर्ण देश अभी भी इस व्यवस्था को नहीं मान रहा था और शांतिपूर्वक अनाज इत्यादि के विनिमय से जीवन जी रहा था.

आपको ध्यान होगा कि अंग्रेज़ सरकार ने भारतीयों पर विभिन्न प्रकार के कर लगा कर धन बटोरा था. अब जब तक सारी क्रय विक्रय की व्यवस्था ब्रिटिश साम्राज्य की मुद्रा में नहीं होगी तब तक भारतीयों से कर वसूलने में परेशानी का होना स्वाभाविक था. इसलिए कानूनन इसको वैधता प्रदान की गयी. इसके बाद जब पहला विश्व युद्ध हुआ तब पहली बार चांदी के अभाव में कागज़ का रुपया अधिक चलन में आया. दूसरे विश्व युद्ध में भी यही हाल रहा पर तब तक 1920 में अमेरिका में मंदी आ चुकी थी जो एक दशक के बाद ठीक हुई.

अब समझिए भारत की आज़ादी के बाद का इतिहास. आपको शायद जान कर अचरज होगा कि आज़ादी के बाद भी भारत का रुपया दुबई, कुवैत, बहरीन और कतार जैसे देशों में मान्यता प्राप्त मुद्रा के रूप में रहा.

और भी अन्य देश जैसे केन्या, युगांडा मौरिशियस इत्यादि रहे. क्योंकि भारत का चाँदी का सिक्का अपनी विश्वसनीयता बनाए हुए था. क्योंकि उसमें चांदी होती थी. भारत का अरब या खाड़ी के देशों में इतना व्यापार था कि भारत को उनके लिए Gulf Rupee 1959 में बनाया.

भारत के केंद्रीय रिज़र्व बैंक ने एक कानून को बना कर Gulf Rupee को बना कर खड़ी देशों की अर्थव्यवस्था को चलाने मे बहुत बड़ा योगदान दिया. भारत की विश्वसनीयता का आप इसी से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि सैंकड़ों वर्षों की लूट के बाद भी भारत की आर्थिक साख बनी रही. और आज भी भूटान, नेपाल और ज़िम्बाबवे भारतीय मुद्रा को स्वीकार करते हैं.

इसे currency इसीलिए कहते हैं कि यह current की तरह चलती हैं. हमारे दर्शन मे भी धन का एक रूप द्रव के रूप में कहा गया है. मतलब यह संग्रह की वस्तु न हो कर द्रव की तरह बहता रहे.

किसी न किसी कीमती धातु के समर्थन से यह मुद्रा बनती थी. 1971 में 35 औंस सोने के आप 1 डालर के रूप में ले सकते थे यह अमेरिका का बनाया हुआ मानक था. परन्तु जब अमेरिका के पास सोना कम हुआ तो उसने एक कानून के तहत यह समाप्त किया और अब डॉलर केवल अमेरिकी सरकार से मान्यता प्राप्त एक कागज़ का टुकड़ा रहा. यहीं पर इसका किसी भी धातु या प्रकृतिक सम्पदा से संबंध टूटा और इसकी दुर्दशा शुरू हुई.

आज भारत का रिज़र्व बैंक बिना सोने के ही अपनी मुद्रा छाप सकता है और वह भी मात्र भारत सरकार के एक अध्यादेश के अनुसार. तभी इसे legal tender कहा जा सकता है यानि भारत की सरकार कि संवैधानिक शक्ति है.

अब जब यह रुपया किसी भी किसी भी धातु या वस्तु से समर्थन प्राप्त नहीं करती. अब इससे उपजने वाले दुष्परिणाम को समझें.

अब जब कि इसका समर्थन किसी धातु या वस्तु से नहीं है तो सरकार जितने भी नोट छापेगी उससे आपके देश के संसाधनों में वृद्धि नहीं होगी. इसीलिए इसके बाद महंगाई बढ़ जाती हैं क्योंकि पैसा ज़्यादा है और संसाधन कम.

इसी के साथ लोगों में असुरक्षा की भावना ने जन्म लिया. इस के बाद संग्रह करने की धारणा बलवती होती गयी. आप सब अपने पास पैसा संभालते रहे कि कहीं ज़रूरत पड़े तो काम आ जाए. सरकार ने पैसा छापा था कि वह वस्तु विनिमय का साधन बने पर हमने उसे साध्य बना दिया. जो पैसा सरकार ने एक वस्तु के क्रय विक्रय के लिए दिया था. वह लोगों ने अपने पास रखना शुरू किया और फिर बाज़ार में पैसा नहीं आया. फलस्वरूप सरकार को और नोट छापने पड़े.

भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि जो 1000 तक के नोट थे उनमें से दो तिहाई कभी भी बैंक में वापिस ही नहीं आए और इसी तरह 500 के नोटों से एक तिहाई वापिस ही नहीं आए. 1999 में पूरी चलन की मुद्रा के 29 प्रतिशत नोट ही 500 और 100 रुपये के थे जबकि यह 2016 में नोटबंदी के समय 86% हो गए थे.

आप कल्पना कर सकते है इसके कारण आए असंतुलन की. इसी से जुड़ी एक बात और समझें कि कि अमेरिका की मुद्रा का दो तिहाई डॉलर आज भी विदेशों में है. अमेरिका अपने डॉलर को बाहर निर्यात करके अपनी महंगाई का नियंत्रण करता है. और उससे विश्व के सभी देशों से अपनी उपयोगिता के सामान का आयात करवाता है. अमेरिका के पास एक विशेष लाभ है कि उसकी घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा एक ही है.

अब इसके दूसरे पहलू को समझें जो बहुत ही भयावह है. इस 2000 रुपये के नोट को छापने में सरकार का कुल 3.80 रुपये का खर्चा आता है आप समझें कि सरकार को संसाधनो की कमी कर रही है मात्र 4 रुपये के लिए आपको 2000 का समान देना होगा. मतलब सरकार 4 रुपये से 500 गुना का सामान की कीमत खरीदने की शक्ति आपको दे रही है. उसी तरह अमेरिका में 100 डॉलर के नोट की कीमत आती है 12 सेंट. अर्थात आज के हिसाब से मात्र 20 रुपये के कागज़ के लिए भारत उसे 6000 रुपये का बासमती चावल, आम या उससे भी पीड़ादायक अपने युवा शक्ति को दे रहा है. इस बैंकिंग के तरीके में नोटों के कारण बैंक कृत्रिम सम्पदा बना सकते हैं, जिसका संसाधनों से कुछ लेना देना नहीं है.

दरअसल अर्थशास्त्र (economics) और पारिस्थितिकी (Ecology) विज्ञान का अंतर हम नहीं समझ पाये. हमारी पुरानी व्यवस्थाएं पारिस्थितिकी विज्ञान पर आधारित थी. और भी आसान शब्दों में ecology स्त्रोतों का अध्ययन है economics है संसाधनों का अध्ययन. स्त्रोत का अर्थ प्रकृति प्रदत्त संसाधन है. उदाहरण के रूप में जल, वायु वनस्पति इत्यादि स्त्रोत हैं. और जब आप इस जल और सौर ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाते है तो वह संसाधनों में आता है. दुर्भाग्य से हम वित्त शस्त्र प्रबंधन (Financial management) को ही अर्थशास्त्र समझ बैठे हैं. क्योंकि हमारा अर्थशास्त्र पहले से ही पारिस्थितिकी पर आधारित रहा है इसलिए आपने कभी पर्यावरण दिवस नहीं मनाया है. परन्तु अब प्रकृति के दोहन के कारण उसके विशेष दिन मनाने पड़ते हैं.

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