भानुमति – 13

चेदि नरेश दामघोष तथा श्रुतश्रवा का पुत्र शिशुपाल गुरुओं के गुरु परशुराम का शिष्य था.

आर्यावर्त में प्रख्यात धनुर्धर के रूप में उसकी प्रतिष्ठा थी.

श्रुतश्रवा कुंती की भांति कृष्ण के पिता वसुदेव की सगी बहन थी, परंतु शिशुपाल कृष्ण से द्वेष रखता था.

कंस की मृत्यु के पश्चात आर्यावर्त में जरासंध के प्रमुख सहयोगियों में से एक शिशुपाल ने द्रुपद को प्रणाम करने के पश्चात धनुष को तिरस्कार की दृष्टि से देखते हुए यकायक ही उठा लिया.

उसने प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए धनुष के एक छोर को पैरों से दबाकर दूसरे छोर को अपनी ओर झुकाने का प्रयास किया कि धनुष झटके देते हुए उसके हाथ से छूट पड़ा.

सभा में हँसी गूंज उठी और सबसे प्रचण्ड हँसी भीम की थी. उसने धनुष उठाने का पुनः प्रयास किया परन्तु इस बार वह असफल रहा.

अपशब्द बोलते हुए शिशुपाल अपने आसन पर आ बैठा. कुछ ही समय पहले उसकी असफलता पर हँसने वाले सारे राजा मूक हो गए, कि आर्यावर्त का एक महान धनुर्धर तो प्रत्यंचा तक नहीं चढ़ा पाया.

समस्त राजा असमंजस में थे कि अब कौन आगे बढे, वहीं दुर्योधन उस प्रचण्ड हास्य को भूल नहीं पा रहा था. ये तो वही हँसी थी जो उसे बाल्यकाल से ही सतत विचलित करती आई थी, ये तो उस निमोछिये भीम की हँसी थी. तो क्या भीम जीवित है, क्या पांडव जीवित हैं?

अबकी राजा दृढ़धन्वा आगे बढ़े. शिशुपाल ने तो धनुष उठा ही लिया था, ये उसे तिल भर भी हिला नहीं सके और समाज में स्यवं को अपमानित कर वापस अपने आसन पर आ बैठे.

एक-एक कर राजा-राजकुमार आते गए और असफल होते गए. कइयों ने तो दो या तीन बार पुनः प्रयास किया. राजन्य वर्ग ने जरासंध की ओर आशान्वित दॄष्टि से देखा.

जरासंध ऐसी परिस्थितियों को संभालना अच्छे से जानता था. मंद स्मित लिए उठा, द्रुपद को प्रणाम करने के पश्चात श्वेतकेतु के समक्ष खड़ा हो गया.

श्वेतकेतु ने आशीर्वचन देकर कहा, “क्या चक्रवर्ती लक्ष्यवेध करेंगे?”

गर्वित जरासंध बोला, “यदि यह मात्र धनुर्विद्या की परीक्षा होती तो अवश्य करता आचार्य, परन्तु यह तो स्वयंवर है. राजकुमारी मेरी पौत्रवधु बनने योग्य वय की हैं, मैं उसका पाणिप्रार्थी नहीं हो सकता.

कितना उचित होता यदि यह मल्लविद्या या गदाविद्या की कसौटी होती. मेरा पौत्र उसमें अवश्य ही विजयी होता.

द्रुपदराज को मेरी शुभकामनाएं कि उन्हें अपनी पुत्री के लिए जमाता के रूप में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मिले. राजन, हम मागध आपके आमंत्रण पर आए थे, अब आपकी आज्ञा चाहते हैं. हम अभी गिरिव्रज लौट जाएंगे.”

जरासंध द्रुपद एवं अन्य राजाओं का अभिवादन करते हुए अपने पुत्र-पौत्रों सहित स्वयंवर स्थल से चला गया. अब मात्र कुरु बचे थे, जिन्होंने अपना भाग्य नहीं आजमाया था.

सबकी दृष्टि अपने ऊपर पाकर युवराज दुर्योधन उठा, अपना खड्ग दुःशासन को थमाकर गर्वित चाल चलता हुआ धनुष तक पहुंचा.

ऊपर से वह अत्यंत विश्वासी प्रतीत होता था, परन्तु यह विचार कि कहीं पांडव जीवित तो नहीं हैं, उसे उद्वेलित किये हुए था.

उसने बाएं हाथ से ही धनुष उठा लिया. तनिक प्रयास कर उसने प्रत्यंचा भी चढ़ा दी, उसका आत्मविश्वास लौट आया. उसने बाण चढ़ाया, जल के पात्र में प्रतिबिंब को देखते हुए बाण छोड़ने ही वाला था कि उसे फिस्स की तिरस्कारपूर्ण हँसी सुनाई दी.

यह, यह तो निश्चित ही भीम की वही जानी-पहचानी हँसी थी, उसका हाथ निमिष भर को हिल गया और बाण छूट चला. उसने ऊपर देखा तो यंत्र यथावत चल रहा था, मछली अपनी परिधि पर वैसे ही घूम रही थी परंतु बाण का कहीं पता नहीं था.

उसने दूसरा बाण उठाया ही था कि उसे प्रचण्ड आवाज सुनाई दी, ‘अंधे का पुत्र अंधा’. दुर्योधन के लिए अब स्वयं को संयत रखना कठिन हो गया. अब केवल चक्र या मछली ही नहीं, समस्त वातावरण ही उसकी आँखों के सामने घूमने लगा. जैसे-तैसे उसने धनुष को यथास्थान रखा और लड़खड़ाते हुए अपने आसन पर आ बैठा.

अब अश्वत्थामा उठा और पांच प्रयासों बाद भी लक्ष्यवेध में असफल रहा. अंततः कर्ण उठा, उसने हाथ जोड़कर धनुष की परिक्रमा की, अपने आध्यात्मिक पिता सूर्य को याद किया और एक पल में ही धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा दी. सारी सभा साधु-साधु की ध्वनि से गूंज उठी. उसने बाण का संधान किया कि एक तीखे स्त्रीस्वर ने उसे रोक दिया. स्वयं द्रौपदी कह रही थी, “हे अंगराज कर्ण, आप इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते.”

अचंभित कर्ण रोषपूर्वक बोला, “क्यों राजकुमारी?”

“यह मेरा स्वयंवर है. ये मेरा विशेषाधिकार है कि कौन इसमें भाग ले या ना ले.”

“अवश्य है, परन्तु कोई समुचित कारण भी तो हो.”

“यदि आप सुनना ही चाहते हैं तो उत्तम कुल में जन्मे सर्वश्रेष्ठ वीर के लिए ही है ये प्रतियोगिता. आप सूतपुत्र हैं, प्रतिलोम विवाह अमान्य है.”

“शास्त्र ही सत्य नहीं, हैं भी तो प्रतिलोम विवाहों के कई उदाहरण भरे पड़े हैं हमारे इतिहास में. मैं आपकी इच्छा का सम्मान करता हूँ. परन्तु यदि वीरता की भी जाति होती है तो हे राजकुमारी, क्षत्रियों से भरी इस सभा में तो आपको कोई वीर नहीं मिला.” यह कहकर उसने धनुष पर चढ़ाया हुआ बाण द्रुपद के चरणों में छोड़ दिया और सारी सभा पर सिंहदृष्टि डालते हुए अपने आसन पर आ बैठा.

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अपने हाथों को मसलते अर्जुन ने शिशुपाल, शल्य, दृढ़धन्वा, विराट, विन्द-अनुविन्द, दुर्योधन, जयद्रथ, अश्वत्थामा इत्यादि को जाते और वापस आते देखा. सबके लटके हुए मुंह देखे. अब यादवों के अतिरिक्त कोई भी नहीं बचा था. उसने सोचा कि ये कृष्ण क्या उसी की ओर देख रहे हैं, उन्होंने अभी अभी बलराम को कुछ कहा, वे भी इधर ही देख रहे हैं क्या? और ये यादव अतिरथी क्यों नहीं उठे अभी तक, ये उद्धव, सात्यकि, कृतवर्मा शांत क्यों बैठे हैं? युधिष्ठिर चले गए, भीम उसकी तरफ देख मुस्कुरा रहे हैं. क्या यही वह पल है जिसके लिए महामुनि व्यास ने हमें यहाँ भेजा था, क्या पांडवों का आज पुनर्जन्म होगा. हाँ, यही बात होगी, अन्यथा ये सभी वीर्यहीन राजा यूँ मुँह लटकाये ना बैठे होते. कृष्ण यूँ ना मुस्कुराते, अन्य यादव यूँ शांत नहीं बैठते.

जैसे किसी सिंह को उसका आखेट दिख गया हो, उन्होंने अपनी लंबी भुजाएं झटकी और धनुष की ओर बढ़ चले. लंबे और सुडौल, भस्म लपेटे जटाजूट संन्यासी को केन्द्रस्थल पर आते देख सारी सभा शांत हो गई. सन्यासी ने द्रुपद को ब्राह्मणोचित रीति से हाथ उठा कर आशीर्वचन कहे और आचार्य से पूछा, “क्या मैं लक्ष्यवेध की पात्रता रखता हूँ?”

आचार्य श्वेतकेतु ने द्रुपद और पांचाली की ओर देख, संकेत पाकर अनुमति प्रदान की. सन्यासी अर्जुन ने बहुत दिनों बाद एक वास्तविक धनुष देखा. वे सब कुछ भूल कुछ क्षणों के लिए बस उस धनुष को श्रद्धा से देखते रहे. उन्होंने धनुष की परिक्रमा की और बाएं हाथ से धनुष को उठा लिया. सावधानी से उसे भूमि पर टिकाकर बाएं हाथ से प्रत्यंचा चढ़ाई. बाणों को सहलाते हुए उनमें से एक बस्तिकबाण चुना और उसे धनुष पर रखकर ऊपर आकाश की ओर तान दिया. जल में घूमती मछली देखकर उन्होंने उसकी आंख को लक्ष्य करते हुए तीर छोड़ दिया.

कुछ समय तक तो किसी को समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या. आचार्य ने स्वतिगान करते हुए शंख फूंका और धीमे पगों चलती राजकुमारी ने अर्जुन के गले में जयमाला पहना दी.

क्षत्रिय समाज की तन्द्रा टूटते ही शिशुपाल चिल्लाया, “ये हमारा अपमान है. हम यहां इतनी दूर इसलिए नहीं आये की कोई कंगला भिखारी हमारे सामने राजकुमारी को ले उड़े. राजाओं, घेरकर मार डालो इस निकृष्ट जंगली को. पांचाली केवल क्षत्रियों के लिए ही है.”

उसके इतना कहने पर सभी राजा अपने अस्त्र शस्त्र चमकाते हुए आगे बढ़े. धृष्टद्युम्न ने द्रौपदी को सुरक्षा देनी चाही जिसे अर्जुन ने अपने हाथों से परे करते हुए कहा कि राजकुमारी अब उनका उत्तरदायित्व है. उन्होंने तीरों से भरे तुरीण को अपने कंधों पर बांधा और एक तीर छोड़ दिया जो सनसनाता हुआ शिशुपाल के पैरों से होता हुआ भूमि में धंस गया. अन्य राजाओं ने भी अपने धनुष उठा लिए पर वे सव्यसाची के सामने निरर्थक थे. राजाओं ने उन्हें घेरना शुरू किया ही था कि ब्राह्मणों के प्रकोष्ठ से एक अतिविशाल ब्राह्मण भीड़ को चीरता हुआ अर्जुन के पास आया और सामने खड़े एक स्तम्भ को उखाड़ राजाओं से भिड़ गया.

अर्जुन के बाणों तथा भीम के विचित्र शस्त्र का कोई उपाय नहीं था किसी के पास. तभी सूर्य की तरह चमकता हुआ कर्ण सामने आया और अर्जुन तथा उसके बीच बाणों की वर्षा होने लगी. उधर मद्र के अहंकारी राजा शल्य ने भीम को मल्लयुद्ध की चुनौती दे दी. अर्जुन और भीम को तो जैसे मनचाही वस्तु मिल गई हो. भीम ने अपने हस्तलाघव से थोड़ी ही देर में शल्य को भूमि पर पटक दिया और गरजते हुए बोले, “अहंकारी राजा, जी करता है कि अभी तेरे प्राण हर लूँ. पर दुष्ट, तू जानता नहीं कि तू किनसे उलझ रहा है. जा तुझे प्राणदान दिया, परंतु यदि फिर कभी भविष्य में अधर्मियों का साथ देते हुए तू हमारे विरुद्ध खड़ा हुआ तो तुझे हम मृत्युदान देंगे.”

भीम की इच्छा थी कि कहीं आज दुर्योधन भी सामने आ जाता तो दो-दो बार उन्हें मृतक बनाने वाले इस नीच का कल्याण कर देते पर वह तो पहले ही मृतक समान अपने आसन पर लुढ़का हुआ था.

मात्र कर्ण ही अर्जुन का सामना कर रहा था कि वासुदेव कृष्ण की आवाज गूंजी, “बस, बहुत हुआ. अब सब शांत हो जाएं. इस वीर ने अपनी योग्यता से द्रौपदी को प्राप्त किया है. अब यदि किसी ने भी शस्त्र उठाए तो उसे पंचालों के साथ हम यादवों का भी सामना करना होगा. और आप अंगराज, किसके लिए लड़ रहे हैं? इस ब्राह्मण को यदि आप हरा भी दें तो द्रौपदी आपको नहीं स्वीकारेगी, और यदि इससे हार गए तो किस मुंह से वापस जाएंगे?”

कर्ण ने कृष्ण का कथन सुना और धनुष नीचे करता हुआ बोला, “जैसी आपकी इच्छा वासुदेव”.
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और तब सभी को आश्चर्य हुआ जब धनुर्धर सन्यासी को कृष्ण ने अपने आलिंगन में बांध लिया. परन्तु सबसे बड़ा आश्चर्य तो तब हुआ जब कृष्ण ने स्वयं को छुड़ाकर उस भीमकाय सन्यासी के चरणों में झुका लिया.
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कुरुकुमार दुःशासन कर्ण के पास आया और निस्तेज कर्ण के कंधे पकड़ कर बोला, “अंगराज, मैं आपके समक्ष एक अत्यंत दारुण समाचार कहने आया हूँ.”

“मेरी आज की पराजय, दुर्योधन की पराजय से भी अधिक दारुण समाचार क्या होगा कुमार.”
“मुझे अत्यंत खेद है मित्र, आप जब अर्जुन से युद्ध कर रहे थे, आपका पुत्र सुदामन आपकी रक्षा हेतु आगे बढ़ा और तीरों की वर्षा ने उसे ढक लिया. मैं आपको उसकी मृत्यु की सूचना देने आया था मित्र. मुझे अत्यंत दुख है. ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे.”

कर्ण की आंखों के आगे अंधेरा छा गया और जब उसने आंखें खोली तो उनमें प्रचण्ड क्रोध भरा हुआ था. उसने दुःशासन के कंधे पकड़ कर कहा, “तुम साक्षी हो कुमार. आज अर्जुन के कारण मुझे पुत्रशोक हुआ है. मैं किसी युद्ध में अर्जुन को बताऊंगा कि पुत्रशोक क्या होता है.”

भानुमति – 12

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