ये अरब किस ओर, और क्यों जा रहा है? भाग-4

रोचक बाद ये है कि जब 27 जनवरी, 661 को हज़रत अली की हत्या की गई तो उसके बाद दो-दो खलीफ़ा एक साथ हो गये.

एक तरफ थे हज़रत अली और बीबी फ़ातिमा के बड़े बेटे हजरत हसन और दूसरी तरफ़ थे हज़रत अबू सूफ़ियान के बेटे अमीर मुआविया.

इराक़ की जनता ने कूफ़े में हसन को खलीफ़ा मान लिया और उधर जेरुसलम से मुआविया के खलीफ़ा होने का ऐलान कर दिया गया.

[ये अरब किस ओर, और क्यों जा रहा है? भाग-1]

यानि खिलाफ़त के पद पर अब एक साथ हाशमी और उम्मिय्या, दोनों घराने के चश्मो-चिराग़ काबिज़ थे.

अली के बेटे हसन सीधे-साधे व्यक्ति थे जबकि अमीर मुआविया कुशल रणनीतिकार, महत्वकांक्षी होने के साथ कुशल प्रशासक भी थे और उन्होंने अपनी योग्यता सीरिया का गवर्नर रहने के दौरान साबित भी की थी.

अमीर मुआविया अकेले खलीफ़ा होना चाहते थे और इसलिये उन्होंने फ़ौरन अपनी सेना को कूफ़े की ओर रवाना कर दिया.

[ये अरब किस ओर, और क्यों जा रहा है? भाग-2]

इधर जब हसन को इस हमले की सूचना मिली तो उन्होंने कैस नाम के एक शख्स की मातहती में एक सैन्य टुकड़ी उसके मुकाबले पर भेजी.

पर कैस पराजित हुये और मार डाले गये जिसके कारण हसन की सेना में भगदड़ मच गई और बिना तैयारी के युद्ध में भेजे जाने से क्रुद्ध सैनिकों ने हजरत हसन के खिलाफ़ विद्रोह कर दिया.

सीधे-साधे हज़रत हसन इसके बाद भी कूफ़े के लोगों के षड्यंत्र के शिकार होते रहे और अंतत: दु:खी होकर उन्होंने कुछ शर्तों के साथ अमीर मुआविया से संधि कर ली.

[ये अरब किस ओर, और क्यों जा रहा है? भाग-3]

इस संधि प्रस्ताव के बाद उन्होंने खिलाफ़त पर अपनी दावेदारी छोड़ दी और अपने परिवार वालों के साथ मदीने चले गये और मुआविया इसके साथ ही इस्लामिक जगत के एकछत्र खलीफा बन गये.

इसके बाद अमीर मुआविया यहीं पर नहीं रुके. इस घटनाक्रम के बाद हज़रत हसन की जहर देकर हत्या कर दी गई और कहा जाता है कि ये सब मुआविया के इशारे पर किया गया.

शिया किताबें कहती हैं कि जब हज़रत हसन को उनके नाना के परिवारजनों के कब्रिस्तान जन्नतुल-बकीअ (मदीना) में दफ़नाने के लिये ले जाया गया तो उनके परिवारजनों को ऐसा नहीं करने दिया गया.

यानि नबी-करीम के विसाल के सिर्फ 30-32 साल के अंदर उनकी अज़ीज़ दुख्तर (बीबी फ़ातिमा), दामाद हज़रत अली और नवासे हज़रत हसन की निर्मम हत्या की जा चुकी थी (बीबी फ़ातिमा के बारे में शिया लोगों का कहना है कि उनकी भी हत्या की गई थी हालांकि सुन्नी उनकी मृत्यु का कारण उनका बीमार होना बताते हैं).

बकौल इस्लामिक जानकार एक बार रसूल साहब ने फ़रमाया था कि रफ़्ता-रफ़्ता खिलाफ़त उठ जायेगा और मलूकियत (बादशाहत) का दौर आयेगा.

उनकी इस भविष्यवाणी के व्याख्याकार इसकी शुरुआत अमीर मुआविया के खलीफा बनने से करते हैं.

इसकी कई वजहें हैं जिसमें एक ये है कि वो पहले खलीफ़ा थे जिसने लोकतांत्रिक तरीके से खलीफ़ा चुने जाने की प्रक्रिया को खत्म कर अपनी औलाद को अपना वली-अहद (उत्तराधिकारी) नियुक्त किया था.

उनका इस तरह से खलीफ़ा बन जाना कई बड़े लोगों को बड़ा नागवार गुजरा था. नबी के प्रसिद्ध सहाबी हज़रत अबू मूसा अशअरी ने इस पर कहा था कि “खिलाफ़त वह है जिसे क़ायम करने के लिये मशविरा किया गया हो और बादशाहत वह है जिसे तलवार के जोर पर कब्जाया गया हो”.

अमीर मुआविया को लेकर उस समय के लोगों में बड़ी नाराज़गी थी. अमीर मुआविया ने जब सबसे बैअत ले लिया तो एक सहाबी हज़रत साअद बिन अबी वक्कास उनसे मिलने गये और उन्हें “ऐ बादशाह” कहकर संबोधित किया जिसने अमीर मुआविया को नाराज़ कर दिया.

अमीर मुआविया के पिता हजरत अबू सूफ़ियान फ़तह-मक्का के दिन मुसलमान हुये थे पर अमीर मुआविया ने उस दिन भी इस्लाम कबूल नहीं किया था.

कहा जाता है कि रसूल की हयात के सिर्फ तीन साल उनको ईमान की हालत में नसीब हुये थे और उस तीन साल के अंदर भी उनका करीबी रिश्ता नबी से कायम न हो सका था.

अमीर मुआविया के बारे में कुछ ऐसी बातें हैं जो मुस्लिम-समाज कभी भी सरे-आम कहने-सुनने की हिमाकत नहीं करता इसलिये उन बातों की चर्चा न करते हुये उनके बारे में सिर्फ़ इतना कहूँगा कि हजरत अमीर मुआविया जंगे-बद्र और जंगे-ऊहद के मुख्य योजनाकार अबू सूफियान और हिन्दा के बेटे थे.

जिस व्यक्ति के माँ-बाप सारी जिन्दगी संघर्षरत रहे हों, जिनके खानदान को जिल्लत और रुसवाई सहनी पड़ी हो, उसके मनोद्वंद को समझने के लिए मनोविज्ञान विशारद होने की आवश्यकता नहीं है.

सत्ता पर काबिज़ होते ही आहिस्ते-आहिस्ते अमीर मुआविया ने उम्मैयद स्वाभिमान को पुनर्जागृत करने और हाशमियों को कमजोर करने का काम शुरू कर दिया.

अपने बेटे यजीद को अपने जीवनकाल में उत्तराधिकारी तो घोषित किया ही, साथ ही हर ऊँचे पदों पर उम्मैयदों को बिठा दिया और फिर अरब के जनजातियों के बीच के झगड़ों को फिर से उभार दिया.

हाशमियों को अमीर मुआविया से इस बात की भी तकलीफ थी कि उन्हें सीरियाई ईसाइयों की भी निष्ठा प्राप्त थी क्योंकि उनकी अपनी पत्नी मैसून, उनका निजी चिकित्सक और दरबार के कई महत्वपूर्ण लोग ईसाई थे, जिनपर उन्होंने कभी धर्म बदलने का दबाब नहीं डाला. इसके अलावा अमीर मुआविया के कई यहूदियों से भी अच्छे रिश्ते थे.

अमीर मुआविया ने सत्ता के लिए हाशमी घराने के चिराग और नबी के दामाद हजरत अली से सिफ्फीन के मैदान में जंग लड़ी.

फिर शिया इतिहासकारों के अनुसार 669 ईसवी में उन्होंने हजरत अली के बेटे और नबी के बड़े नवासे हजरत हसन की हत्या करवा दी. कई इतिहासकारों ने लिखा है कि मुआविया ने कई इस्लामी सिद्धांतों की तिलांजलि दे दी तथा सत्ता को हाशमियों को नीचा दिखाने का माध्यम बना लिया.

एक इतिहासकार के शब्दों में : “हजरत मुहम्मद साहब को सताने वालों ने उनकी संतान की विरासत हड़प ली और बुतपरस्ती के समर्थक इस्लाम धर्म और इस्लामी सत्ता के सर्वोच्च प्रधान बन गये”.

आगे जारी है…

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