सांस्कृतिक नरसंहार – 3 : दो पंथों की आक्रामकता का सबसे बड़ा शिकार मूर्तिपूजक

कभी-कभी न चाहते हुए भी अनायास मुंह से सच ही निकल जाता है.

मस्तिष्क में उभरे विचार को कोई सायास दबा तो देता है मगर वो चुभी हुई फांस की तरह तब तक तकलीफ़ देता रहता है जब तक उसे निकाल नहीं दिया जाता.

[सांस्कृतिक नरसंहार – 1 : सबसे बड़ा शिकार भारतवर्ष]

संसार के सबसे भयानक नरसंहारों में सबसे बड़े नरसंहार ईसाइयों और इस्लामियों द्वारा हम मूर्तिपूजकों के हैं.

जिन्हें उन्होंने चतुर भाषा में पैगन कहा है. इसके बाद ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा ही यहूदियों के नरसंहार आते हैं.

मुस्लिमों के इतने तिकड़म, घृणा, तिरस्कार, विनाश और नरसंहारों के बावजूद मुग़ल-काल की समाप्ति पर भी भारत में हजारों हिन्दू स्कूल थे जिनमे धार्मिक शिक्षा व प्रशासन संबंधी शिक्षा दी जा रही थी.

[सांस्कृतिक नरसंहार – 2 : संसार के दो सबसे बड़े इब्राहीमी पंथ]

भारत के सुदृढ़ शिक्षा तंत्र से अंग्रेज ईर्ष्या करते थे. यूरोप के ईसाइयों ने हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने का षड्यंत्र रचा जिसमें उद्देश्य हिन्दू धर्मग्रंथों की भ्रमात्मक व्याख्या कर गलत साबित करना था.

मैक्समूलर ने इस काम की शुरुआत की. मैकाले द्वारा स्थापित अँग्रेजी शिक्षा को श्रेष्ठ बता कर नव शिक्षित भारतियों को हिन्दू धर्म से घृणा करना सिखाया गया. आज भी यह प्रवृत्ति जारी है.

ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक दिनों में ही ईसाई मिशनरियों को चार्टर एक्ट 1813 द्वारा लोगों को क्रिश्चियन बनाने और अँग्रेजी पढ़ाने की अनुमति दी गयी.

इसके बाद तो अंग्रेजों ने भारत की जनता के पैसों पर ही एक इक्लेज़्टिकल डिपार्टमेंट बनाया, जिसके अधिकारी आर्चबिशप और बिशप होते थे.

इस डिपार्टमेंट ने भारत के लगभग सभी नगरों के सामरिक और प्रमुख स्थानों पर कब्जा कर चर्च बनवाया. यह डिपार्टमेंट भारत की स्वतन्त्रता तक बना रहा.

स्वतन्त्रता के पश्चात भी सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद की आपत्तियों को दरकिनार करते हुये नेहरू और संविधान रचनाकारों ने हिंदुओं के सांस्कृतिक अधिकारों का अतिक्रमण कर ईसाइयों और मुसलमानों को असीमित सांस्कृतिक अधिकार दे दिये.

ईसाई मिशनरियों के भारत में प्रवेश और अँग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म-प्रचार और धर्म परिवर्तन के प्रावधान को आज तक समाप्त नहीं किया जा सका है.

विदेशों से मिल रहे अथाह पैसों पर ईसाई मिशनरी प्रतिदिन हजारों हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं.

ये ईसाई बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाते हैं. प्रार्थना सभा, चंगाई सभा और चमत्कारी सभा इत्यादि नामों से हिंदुओं को छला जाता है.

और कई बार तो ईसा को हिन्दू देवी-देवताओं जैसा पेश किया जाता है ताकि आसानी से हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराया जा सके.

और तो और, आज खुद हिन्दू अपने बच्चों को कान्वेंट-शिक्षित कहलाने में गर्व महसूस करते हैं.

यह सांस्कृतिक नरसंहार का ही परिणाम है कि कुछ लोगों को अपनी भाषा व धर्म छोटा लगता है. ऊपर से भारतीय संविधान द्वारा मुस्लिमों और ईसाइयो को दिये गए असीमित सांस्कृतिक अधिकार इस प्रवृति को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं.

इन दो पंथों के आक्रामक विस्तारवादी प्रवृति का सबसे बड़े शिकार अफ्रीका के जनजातीय लोग हैं.

पूरे अफ्रीका को छोटे-छोटे देशों में बाँट कर वहाँ के लोगों को मुस्लिम और ईसाई बना दिया गया है. लोग एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं और प्राकृतिक संसाधनों पर इन पंथों के ठेकेदारों का कब्जा हो गया है.

ये लोग पश्चिमी मीडिया और उसकी पिछलग्गू भारतीय मीडिया को इस्तेमाल कर यही प्रवृति भारत में दुहराने की फिराक में हैं. हिन्दू विरोधी कम्यूनिस्ट उनका हर स्तर पर साथ दे रहे हैं.

हाल ही में इसी उपक्रम में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह!’ नारे लगाए गए और कैथोलिक सोनिया गांधी की काँग्रेस पार्टी ऐसे लोगों के समर्थन में खड़ी है.

इनके षडयंत्रों को देखते हुये यह बात सिद्ध हो जाती है कि भारत में हिंदुओं की संख्या घटते ही देश बंट जाएगा और अफ्रीका कि तरह खूनी संघर्ष शुरू हो जाएगा.

कट्टर कैथोलिक क्रिश्चियन सोनिया गांधी के हाथों भारत की सत्ता आने पर उन्होंने वही किया जो ईसाई विस्तारवादी करते आए हैं.

सोनिया के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने षड्यंत्र बना कर सार्वजनिक जीवन के हर पहलू से भारतीय और हिन्दू चीजों के हटाया.

सरकारी पाठ्य पुस्तकों से रामायण, महाभारत, पंचतंत्र आदि भारतीय महाग्रन्थों को हटवाया गया. उनकी जगह पर पाकिस्तान प्रेम और ईसाई-सेकुलरवाद को बढ़ावा देने वाली कहानियों को बच्चों को पढ़ाया जाने लगा. यह सिलसिला अभी भी जारी है.

सांस्कृतिक नरसंहार हेतु ही ‘शिक्षा के अधिकार’ (RTE) अधिनियम को विभाजनकारी बनाते हुये इसे हिन्दुओं द्वारा चलाये जा रहे निजी स्कूलों पर थोप दिया गया किन्तु मुस्लिम और ईसाई स्कूलों को इससे मुक्त रखा गया.

यहाँ तक की दूरदर्शन द्वारा प्रारम्भ से ही प्रयोग किए जा रहे ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ आदर्शवाक्य को बस इसलिए हटवाया क्योंकि यह उपनिषदों से है जो कि हिन्दुओं के महान ग्रंथो में सम्मिलित हैं.

हिन्दुओं को सांस्कृतिक और सामरिक रूप से कमजोर करने के लिए जैन समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित करवाना भी सोनिया के एस षड्यंत्र का हिस्सा था.

आज भी हिन्दू तीर्थों, मेलों और आयोजनों पर अतिरिक्त कर लगाया जाता है जबकि मुस्लिम और ईसाई आयोजनों के लिए हिन्दुओं से ही वसूला गया कर मुफ्त में लुटाया जाता है.

हमें यह बातें बिलकुल ही बुरी नहीं लगती क्योंकि यह हम हमेशा से देखते आए हैं और हमारी सोच व मानसिकता को पाठ्य-पुस्तकों और संचार माध्यमों से इस तरह की बना दी गयी है.

मुस्लिम और ईसाई आज भले ही हिंदुओं की तुलना में कई गुना कम हों, उनके चर्च और वक्फ बोर्ड के पास हिन्दू-मंदिरों के मुक़ाबले कई-गुना ज्यादा जमीन-जायजाद है.

आज उत्तर भारत के लगभग एक तिहाई गाँवों का नाम इस्लामिक है. अधिकांशतः इन गाँवों में मुस्लिम नहीं रहते और ना ही इन नामों का उस स्थान या भारत की संस्कृति से कुछ लेना देना है, फिर भी ऐसे नाम थोपे गए. यह सांस्कृतिक आक्रामकता का एक उदाहरण हैं, जो कि पीढ़ियो तक असरदार है.

विशेष

हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति विश्व के उन बची-खुची प्राचीन सभ्यताओं में से एक है, जिसे ये दोनों पंथ तमाम कोशिशों के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं कर पाये. हालांकि ये अभी भी प्रयासरत हैं और उनका छद्म-युद्ध अभी भी जारी है.

सोची-समझी आक्रामकता ही सुरक्षा का कारगर तरीका है. हमें इनके षड्यंत्र को समझते हुये अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा. साथ ही विश्व के किसी भी मूल संस्कृति पर ईसाई और इस्लाम द्वारा हो रहे हमले का प्रतिकार करना होगा.

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  1. बहोतही जानकारी युक्त आर्टिकल। इस जानकारी को ज़्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुचाना चाहिये। बॉलीवुड वालोका भी बहोत बड़ा हाथ हैं। ज्यादातर फ़िल्म हिंदु विरोधी बन रही हैं।

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