परमात्मा सेवा करने वाले के वश में हो जाते हैं

जगत की संरचना परमेश्वर ने प्राणी मात्र के आनंद प्राप्ति के लिए की है. परमात्मा आनंद स्वरूप हैं, अत: उसका अंश जीव मात्र भी आनंद स्वरूप है. सृष्टि में मानव की रचना करने पर परमात्मा को विशेष आह्लाद हुआ.

मानव विवेक और भाव प्रधान प्राणी है. संसार के प्राणियों में मानव अपने विवेक एवं भाव से दो कार्य मुख्य रूप से कर सकता है —
1. प्रभु का भजन, ध्यान, चिंतन
2. सेवाकार्य (परहित)

इन दोनों ही कार्यों से आनंद एवं शांति की अनुभूति होती है.

भली सभी कौ चाहिए बुरी न करियौ कोय,
जन हरिया सब कुन कह्या राम भजौ नर लोय….

परदु:ख से दुखी होने का भाव जिस मानव के अंत:करण में होगा, वही सेवाकार्य में प्रवृत्त होगा. परदु:ख से दू:खी होने में दया का भाव अंत:करण में मुख्य है. परमात्मा सेवा करने वाले के वश में हो जाते हैं.

सेवा में हिंसा मात्र को पूर्ण रूप से त्यागना होता है. अपने स्वार्थभाव की जागृति होने पर अंत:करण में हिंसा जाग जाती है, जो परहित नहीं होने देती.

मानव स्वार्थ के कारण ही जीवहिंसा करता है, जो परमात्मा की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है. सेवा करने के लिए भोगवृत्ति और संग्रह वृत्ति को त्यागना परमावश्यक है.

विषय भोग एवं धन संग्रह का उद्देश्य होने पर सेवा भाव का उदय भी नहीं हो सकता. सच्चे सेवक में अहर्ता और ममता भी नहीं रहती. सेवा के लिए वस्तु, व्यक्ति, धन, देश, काल सभी को भगवान् का समझते हुए भगवत्सेवा में समर्पित किया जाता है अथवा प्रकृति का समझकर समाज सेवा में लगाया जाता है.

दोनों में ही त्याग भाव की मुख्यता है. सेवक का स्वभाव छल, कपट आदि से रहित होना चाहिए. वाणी में मधुरता होनी चाहिए. दुखी का आधा दुःख तो सच्चे सेवक के बात करने पर ही मिट जाता है.

सेवक सेव्य की ही वस्तु को सेव्य को ही देता है. सेवक की अपनी स्वतन्त्र इच्छा नहीं होती है. सेव्य की इच्छा ही सेवक की इच्छा होती है. निष्काम भाव से परहित करना ही सेवा का असली स्वरूप है.

सांसारिक वस्तुओं के संग्रह की इच्छा मिट जाती है. सांसारिक राग-द्वेष सेवा करने से मिट जाते हैं. उसके भीतर समभाव रहता है. वह सभी का हित करता है –

मुखिया मुखु सो चाहिए खान पान कहुं एक.
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक.

(साभार : कल्याण- सेवा अंक, गीताप्रेस गोरखपुर)

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