हर्षोल्लास नहीं, सिर्फ पीड़ा दे जाता है ये दिन

कांग्रेस की सरकारों और उनके बने गए शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को लेकर ऐसा मिथक बनाया है कि लोग अपने बाल्यकाल से ही उन्हें चाचा जैसे भावनात्मक रिश्ते से स्वयं को बाँध लेते थे.

इसका इतना मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है कि लोगो में नेहरू को लेकर उभरते हुए प्रश्नो को देखने की या अपनी दृष्टि ही खत्म हो गयी या फिर नेहरू को लेकर प्रश्न पूछने को एक कार्डिनल सिन बना दिया गया है.

इस चचा नेहरू सिंड्रोम का मैं भी अपवाद नहीं रहा हूँ लेकिन जब पिछले 25 वर्षो में खुद सोचने और समझने की ऊष्मा जागी, तब नेहरू को लेकर बताई गयी समकालीन बातों में विरोधाभास स्पष्ट दिखने लगे थे.

मैंने इसी विरोधाभास को समझने के लिए, भारत में स्वतंत्रता के बाद लिखे गये कांग्रेसी शासन तंत्र द्वारा पोषित, वामपंथी विचारधारा से आत्ममुग्ध बुद्धिजीवियों के लिखित इतिहास को पढ़ा.

वहीं मैंने कम से कम अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय लेखकों की 50 किताबें और भी पढ़ी जो कांग्रेसियों और वामपंथियो की छाया से तटस्थ थे.

इस तमाम पठन पाठन के बाद जवाहर लाल नेहरू को लेकर मेरा बाल सुलभ प्रेम स्वतः समाप्त हो गया.

मैंने भारत की स्वतंत्रता और उसके पुनर्निर्माण को लेकर नेहरू का आंकलन, कांग्रेसियों या फिर अपने पूर्वजों की आँखों से करना बंद कर दिया है.

भारत के पुनर्निर्माण को लेकर नेहरू को नकारने से पहले एक प्रश्न जरूर खड़ा होता है कि क्या नेहरू, क्या नाकारा थे? या फिर ऐसा क्या नेहरू में था जिसको गाँधी जैसे सशक्त संबल ने भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बना डाला था?

आप या मैं कितना भी नेहरू के विरोधी हों लेकिन नेहरू का एक तरफा आंकलन करना स्वयं वर्तमान के साथ धोखा होगा और मेरा मानना है कि उनका आंकलन एक तरफा नहीं हो सकता है.

मेरा मानना है कि गाँधी की एक राजनीतिज्ञ के रूप में असफलता का प्रारम्भ 1930 के दशक से ही शुरू हो गया था और उनकी असफलता का प्रमुख कारण, गांधी की नेहरू के प्रति आसक्ति थी, जो उम्र के साथ बढ़ती रही थी. इसी आसक्ति ने नेहरू को महामंडित किया जिसको स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने शासन का मूल मंत्र बना लिया.

तटस्थ हो कर देखा जाय तो नेहरू, एक जबरदस्त शख्सियत थे. नामी परिवार से थे, खूबसूरत थे, अंग्रेजो के अंग्रेज थे, राजा रजवाड़ों के से कम ज़हीन नहीं थे.

संक्षेप में 20वीं शताब्दी के शुरू में उनमें वह सारे गुण थे जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बुद्धिजीवियों और सामान्य जनमानस को उनकी तरफ आकर्षित कर सकता था. इसमें भी कोई शक नहीं है कि भारत की स्वतंत्रता और उसके बाद भारत के विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पूरी थी.

लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ, जो मेरा जैसा भारत का एक बड़ा वर्ग, स्वतंत्रता के सात दशक के बाद, नेहरू को महान नायक मानने से न केवल इंकार कर रहा है बल्कि आज के भारत और उसके समाज में व्याप्त विभीषका के लिए उनको जिम्मेदार मानने लगा है?

विश्व में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद, ख़ास तौर से योरप में वैसा ही वातावरण था जैसे भारत में ‘जेएनयू’ जैसे विश्वविद्यालयों का माहौल है.

उस काल में विश्व में राजतंत्र के पराभव के साथ, 19 वीं शताब्दी में यांत्रिकी युग के उफान से उपजी पूंजीवादी व्यवस्था में बने पूंजीपतियों की एक तरफा संकीर्णता और लालच ने, नये पढ़े लिखे चैतन्य युवा वर्ग को मार्क्सवाद की तरफ आकर्षित किया था.

उस वक्त के हर उस व्यक्ति को, जो शोषण या उपनिवेशवाद के विरुद्ध खड़ा हुआ था, उसे यह एक सार्थक विकल्प लगा था.

नेहरू भी अपने योरप प्रवास के दौरान इससे प्रभावित हुए थे और उस वक्त के योरप के तमाम बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार व राजनीतिज्ञ भी सोशलिस्म और वामपंथी विचारधारा में आर्थिक विषमता को लेकर समाज के लिये उत्तर ढूंढ रहे थे.

उनके सामने 1918 की रूस में हुयी बोल्शेविक क्रांति एक बड़ा प्रेरणा स्रोत भी था और उसका असर योरप की राजनीति पर सीधा पड़ भी रहा था.

मै समझता हूँ कि नेहरू का उससे प्रभावित होना बड़ा स्वाभविक था और पराधीन भारतीय की राजनीति में वो अकेले ऐसे अकेले भी नहीं थे.

देखा जाय तो, जो उस काल जो नेहरू के साथ हुआ, उन्ही परिस्थितियों में मेरे जैसे व्यक्ति के साथ भी हो जाना बड़ा स्वाभाविक होता.

मेरे और उस काल के नेहरू में अंतर बस अंतर यही खत्म हो जाता है क्यूंकि मैंने 25/ 30 वर्ष पहले समझी हुयी और सीखी बातों को, परिणाम व विरोधाभास के तराजू पर तौल कर विकल्प की तलाश की है.

और वहीं नेहरू, क्योंकि वह गलत हो ही नहीं सकते है, इसलिए उन्होंने कभी नये आये समय में, स्वतंत्रता काल में स्थापित नए तंत्रों व नई परिस्थितियों में अपने विचारों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया और लड़ने की कोशिश नहीं की.

उन्होंने शायद अपने जीवन के आखिरी काल में कोशिश की हो लेकिन तब तक नेहरू ने अपने को गुलाम मानसिकता के दरबारियों से घेर लिया था और सचेतन अपने को भारत का नया महाराजा बनने दिया था.

नेहरू प्रधानमंत्री कैसे बने और क्यों बने, अब इसका कोई मतलब नहीं रह गया है. जो 15 अगस्त 1947 को हो गया, वो हो चुका है. उसको लेकर विलाप का कोई औचित्य नहीं है.

बात तो उसके बाद की है. भारत को जिस रूप में स्वतंत्रता मिली है उसमें उनके योगदान को हम नहीं नकार सकते है. हम भारत में हैवी इंडस्ट्री और तकनीकी शिक्षा के प्रति उनकी संकल्पता को भी नहीं नकार सकते हैं.

मेरा मानना है इस सब को लेकर उनकी नीयत तो अच्छी थी लेकिन उसके साथ उनकी समाजवाद को लेकर रोमानियत और उसके साथ अपने को विश्व नेता माने जाने के अहंकारोन्माद व भारत के स्वयंभू विश्व गुरु होने के मुगालते ने उन्हें बर्बाद कर दिया.

उनकी आँखों पर भारत का चश्मा न हो कर योरप का चश्मा था जिसने भारतीयता को पुरातनपंथी समझ कर तिरस्कार किया, वहीं प्रगतिशीलता के नाम पर पाश्चात्य की बौद्धिकता को न स्वयं अपनाया बल्कि उसको भारत की नीव में जड़ें भी दीं.

नेहरू अपने आभा मंडल और महिमामंडन से इतने आसक्त हो गये थे कि वे खुद अपने से बेहद मुहब्बत करने लगे थे. नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के आदर्शवाद के चरित्र को ही केंचुल की तरह उतार फेका था.

गांधी जब मरे थे तब वह कोई भी सम्पति अपने किसी उत्तराधिकारी की लिये नहीं छोड़ गये थे, यही हाल सरदार पटेल का था. जब वह मरे थे तो उनकी विरासत में 2 धोती कुरता और कुछ बर्तन थे.

लेकिन नेहरू, लेनिन, स्टेलिन जैसे वामपंथियों की तरह वर्गविहीन समाज में अलग वर्ग का प्रतिनिधित्व करने लग गये थे. उन्होंने बाकायदा अपनी वसीयत की और सब कुछ अपनी बेटी के नाम कर गये. नेहरू स्वतंत्रता के संघर्ष काल की अग्रिम पंक्ति के अकेले ऐसा नेता थे जो देश को न देकर अपना सब कुछ अपने बच्चे को देकर गये थे.

नेहरू ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण को भारत के शासन तंत्र का ध्रुव बनाया जिससे हिन्दू बहुल राष्ट्र में हिंदुत्व ही हीनता का शिकार हो गया.

नेहरू ने राजनैतिक लाभ के लिये मुस्लिम वोट बैंक का निर्माण किया जिसने भारतीय समाज को ऐसी असाध्य बीमारी से ग्रसित कर दिया, जिसका बिना रक्तपात के इलाज की संभावना क्षीण लगती है.

नेहरू ने भारतीय राजनीति में वंशागत परिवार को बढ़ाने का सूत्रपात किया था. नेहरू ने भारत की राजनीति में होने वाले भ्रष्टाचार पर सबसे पहले अपनी आँखे मूंदी थी.

उनके ही सगे दामाद फिरोज गांधी (गांधी नाम नेहरू ने दिया था, वो कोई गुजराती हिन्दू नहीं था), ने उन पर भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने का इलज़ाम लगाया था.

नेहरू ने ही सबसे पहले विदेशों से मिले उपहारों को राष्ट्र को समर्पित न कर के, व्यक्तिगत उपयोग और राजकीय कोष में जमा न करने की परम्परा की शुरुवात की थी.

जैसे गांधी को महात्मा पुकारा गया और वह मान लिये गये, उसी तरह जवाहर लाल नेहरू को भी, विश्व का शांति दूत और महान नेता हो जाने का यकीन था और वह इस विश्वास में इतने वाहियात हो गये थे कि जब चीन उनको, सीमा के विवाद को लेकर बार बार समझा रहा था, तब वह पंचशील समझौते की बात कर रहे थे और अपने मित्र मेनन, जो एक अंग्रेज़ीदां वामपंथी था, उसे देश का रक्षामंत्री बनाये रक्खे हुये थे.

खैर जो है वो तो है ही है, नेहरू ने जहाँ मेरे भारत के लिये कुछ अच्छा किया. वहीं उससे ज्यादा भारत का बुरा भी किया, जो आज हमारे सामने है.

उनके बारे में आज अमर्यादित बातें कही जा रही हैं, वह पूरी तरह इसके भागी है क्यूंकि लोकतंत्र में रजवाड़ों की तर्ज़ पर, वंशगत उत्तराधिकारी को जनतान्त्रिक वैधानिकता उन्होंने ही प्रदान की है.

नेहरू की सहमति से, नेहरू की कांग्रेस ने भारत के जनमानस में यह अच्छी तरह बात बैठा दी थी कि वह शासक हैं और उनके परिवार का, उन पर शासन करने का पहले अधिकार है और उसी मानसिकता से नेहरू का खानदान आज तक अपने को नहीं निकाल पाया है.

आज नेहरू का जन्मदिवस कोई हर्षोल्लास नहीं लाता है, सिर्फ पीड़ा दे जाता है.

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