पर्यावरण का जितना निर्मम दोहन पंजाब का किसान कर रहा, वो कोई नहीं करता

पंजाब इस समय एक जीता जागता Gas Chamber बना हुआ है.

आज इस समय, जब कि शाम के तीन बजे हैं, गहरा Smog चारों तरफ घिरा हुआ है.

सड़क पे Visibility बमुश्किल 200 मीटर है. दिन में लोग अपनी गाड़ियों की Headlights जला के चल रहे हैं.

आज अभी कपूरथला से सुल्तानपुर लोधी आते हुए गाड़ी के भीतर आंखें जल रहीं थीं और सांस घुट रही थी.

कुछ और आगे आये तो एक बड़ा भयावह दृश्य देखने को मिला.

किसानों को ये भयावह स्थिति नहीं दिखती क्या? उनके घर परिवार क्या किसी अलग ग्रह पे रह रहे हैं?

इतनी भयावह स्थिति के बावजूद देखा कि सड़क के किनारे ही किसानों ने पराली में आग लगा रखी है.

आखिर क्यों आग लगा रहे हैं ये किसान, पराली को? सिर्फ 600 रु प्रति एकड़ बचाने के लिए?

खेत में किसी भी घास या पराली हो, Rotatory Tiller जिसे देसी भाषा में रोटावेटर भी कहते हैं, एक घंटे में पूरी घास / पराली मिट्टी में मिला देता है.

मुझे याद है, पिछले साल लखनऊ से कुछ मित्र घूमने आए हुए थे यहाँ. उनके साथ मैं इसी सीज़न में सुल्तानपुर से अमृतसर होता हुआ वाघा बॉर्डर गया था.

अमृतसर तक पूरे रास्ते एक भी खेत ऐसा नहीं मिला जहां किसान ने पराली जलाई हो. सबने उसे खेत मे ही जोत दिया था रोटावेटर से.

अमृतसर से आगे कुछ खेतों में पराली जलाई गई थी. तत्कालीन बादल सरकार का सख्त आदेश था कि पराली जलाने वाले किसानों पे भारी जुर्माना लगाया जाएगा. इसका ये असर हुआ कि ज़्यादातर किसानों ने पराली नहीं जलाई थी.

पर इस साल गुरदासपुर उपचुनाव के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने चुनावी सभाओं में मंच से घोषणा की कि किसी किसान पे किसी किस्म का कोई जुर्माना नहीं होगा (पराली जलाने पे).

इसका नतीजा आज हम आप सब भुगत रहे हैं. पूरा पंजाब, हरियाणा और दिल्ली Gas Chamber बना हुआ है. और क्यों बना है? सिर्फ 600 रु के लिए?

कल इसी विषय पे मैने रविश कुमार (रNDTV वाले) का एक लेख पढ़ा. उसमें उसने “बेचारे किसानों” को हालात का मारा, पीड़ित ठहराया है और सारा दोष सरकारों पे मढ़ दिया है.

रविश कुमार का कहना है कि “बेचारा किसान” क्यों लगाए अपनी जेब से 1200 रु?

सत्य यह है कि ये पराली की समस्या सिर्फ और सिर्फ हरियाणा, पंजाब के किसानों की है.

ज़रा पूर्वी UP, बिहार या बंगाल उड़ीसा के किसी किसान से एक पूली पराली की मांग के तो देखिए. वो आपको ठेंगा दिखा देगा.

धान की पराली का एक धागा भी हमारे लिए बहुमूल्य है. हमारे पशु इसी के सहारे पलते हैं.

जो बेकद्री यहां हरियाणा पंजाब में पराली की है वही बेकद्री किसी ज़माने में बुंदेलखंड में भूसे की होती थी. मैं ये 1995-96 की बात कर रहा हूँ.

उन दिनों जब कि हमारे यहां गोरखपुर की मंडी में भूसा 500 रु क्विंटल बिकता था तो बुंदेलखंड के एक एक किसान के खलिहान में भूसे का एक विशालकाय पहाड़ खड़ा रहता था जिसे कोई मुफ्त में भी नहीं पूछता था और वो पूरा भूसा मई जून की तेज हवाओं में उड़ जाता था.

आज बुंदेलखंड में भूसे की क्या दशा है ये तो कोई स्थानीय मित्र ही बता सकता है, पर मैं इतना जानता हूँ कि धरती माता, भूगर्भीय जल और पर्यावरण का जितना निर्मम दोहन पंजाब का किसान कर रहा वो कोई नहीं करता. ये पाप है… इसकी सज़ा हमें और हमारी आने वाली संततियों को भुगतनी पड़ेगी.

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