भानुमति – 12

जरासंध के शिविर के बाहर कृष्ण के सभी शस्त्रों को धारण किये उद्धव बड़ी व्याकुलता से टहल रहे थे. वे सदैव ही कृष्ण से समहत होते आये थे, परन्तु आज उन्हें कृष्ण का अकेला और निशस्त्र होकर जरासंध से भेंट करना अनुचित प्रतीत हुआ था.

परंतु यह भी तो था कि कृष्ण किसी की सुनते ही कहाँ थे. इसके पश्चात भी उद्धव ने कृष्ण के संज्ञान के बिना ही अपने चुने हुए महारथियों को शिविर घेर लेने का आदेश दिया हुआ था, और उनकी हथेली अपने शंख पर कसी हुई थी कि यदि तनिक सा भी आभास हो तो वे अपने साथियों सहित आक्रमण कर दें.

कृष्ण अपने मनोहारी रूप में सकुशल आते हुए दिखाई दिए, तब उद्धव के स्नायुओं का तनाव ढीला हुआ. उन्होंने पूछा, “गोविंद, कैसी रही? जरासंध ने क्या कहा?”

“तुम्हें क्या लगता है भाई कि मैं उससे कुछ सुनने गया था. मैंने जो कहना था कह आया. सोचता हूँ कि अब जरासंध कोई समस्या नहीं बनेगा. परन्तु फिर भी हमें सावधान रहना चाहिए.

कल प्रातः द्रौपदी के कक्ष से लेकर यज्ञशाला तथा वहां से स्वयंवर स्थल तक यादव रक्षकों को नियुक्त करना होगा. यदि एक भी मागध दिखा तो वे उसे बन्दी बना लें.”

“ऐसा ही होगा. मेरा एक प्रश्न था गोविंद, यदि एक से अधिक प्रतिभागी स्वयंवर जीतते हैं तो क्या होगा? या कोई भी नहीं जीतता तो क्या होगा?”

“एक से अधिक प्रतियोगी के जीतने पर तो कोई समस्या ही नहीं है. द्रौपदी उनमें से किसी एक को चुन सकती है. यदि कोई ना जीत पाया तो इसका अर्थ होगा स्वयंवर-भंग, उस स्थिति में प्रतिभागी बलप्रयोग द्वारा द्रौपदी का हरण करना चाहेंगे. यदि ऐसा हुआ तो हमें भी बल प्रयोग करना होगा.”

“और यदि पांडव समय से ना पहुँच सके तथा दुर्योधन, कर्ण या अश्वथामा जैसा एक भी अवांछित प्रतियोगी विजित हुआ तो?”

“ये ही मेरी समस्या है उद्धव. यदि ऐसा हुआ तो यादवों में से किसी को स्वयंवर में भाग लेना होगा. सात्यकि महान धनुर्धर है, आशा है कि वह लक्ष्यवेध कर लेगा.”

“यदि ऐसा है केशव तो क्या तुम मुझे आज्ञा दोगे?”

“किसकी, स्वयंवर में भाग लेने की? तुम निश्चित ही विजयी होगे, परन्तु क्या इससे तुम्हारी पत्नियां कपिला-पिंगला दुखी नहीं होंगी? और तुम संत स्वभाव के व्यक्ति हो भाई, द्रौपदी जैसी प्रचण्ड अग्निशिखा तुम्हारे अनुकूल नहीं होगी.”

“जो हो केशव, पर मुझे आज्ञा दो कि यदि सात्यकि भी असफल रहा तो मैं भाग लूंगा. और यदि मैं भी असफल रहा, तब भी तुम्हारा वचन पूरा होगा. कोई भी अधर्मी द्रौपदी को प्राप्त नहीं कर सकेगा.”

“सो कैसे?”

“मैंने प्रतियोगिता में प्रयुक्त होने वाला धनुष देखा है. उसके नीचे दबकर किसी की भी मृत्यु हो सकती है. यदि ऐसा हो तो यह विवाहोत्सव नहीं रह जायेगा.”

अचंभित कृष्ण भावुक होकर बोले, “क्या तुम मृत्यु को स्वीकार करोगे? तुम कब तक मेरे लिए अपने प्राणों को संकट में डालोगे भाई?”

“मेरा तो जन्म ही तुम्हारे लिए हुआ है कृष्ण. मैं तो जीता ही इसलिए हूँ कि तुम्हारा वचन सफल हो.”
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अंततः वह दिन आ ही गया. वह दिन जब आर्यावर्त की राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन सम्भावित था, वह दिन जब पांचाल नरेश अपनी प्रिय पुत्री के वैवाहिक सम्बंध द्वारा एक ऐसा अप्रतिम वीर प्राप्त कर सकते थे जो उन्हें द्रोण तथा उनके रक्षक कुरु-साम्राज्य से टक्कर लेने लायक पर्याप्त शक्तिशाली बना सकता था, वह दिन जिस पर कृष्ण ने अपनी सारी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी थी.

पिछले सोलह दिनों से चले आ रहे विभिन्न मांगलिक कार्यकलापों का आज अंतिम दिन था. द्रौपदी प्रसन्न भी थी और उत्साहित भी. उसने अपने आप को गोविंद के भरोसे इस विश्वास के साथ छोड़ दिया था कि यदि उन्होंने कहा है तो सब शुभ ही होगा.

आचार्य श्वेतकेतु के साथ यज्ञशाला में विधिवत पूजा इत्यादि सम्पन्न कर जब वह स्वयंवर स्थल की ओर चली तो उसके साथ उसका भाई धृष्टद्युम्न भी था, उसने पूरे मार्ग में कहीं भी किसी मागध रथी को ना पाकर चैन की सांस ली. उसके अपहरण की शंका निर्मूल सिद्ध हुई थी.

स्वयंवर स्थल में विभिन्न वेशभूषा में जाने-अनजाने राजा एवं राजकुमार विराजमान थे. उसने अपने पिता की ओर देखा, वर्षों बाद उसे उनके मुख पर वह तेज दिखा जो किसी महान राजा के मुख पर ही सम्भव था.

उसके पिता आज इस स्वयंवर द्वारा बिना किसी राजसूय यज्ञ द्वारा ही जैसे चक्रवर्ती सम्राट हो गए हों. उनके दोनों ओर उनके अंगरक्षकों की मुद्रा में उसके भाई सत्यजीत व शिखंडी गर्व से मस्तक ऊंचा किये खड़े थे. उसके कपोल कन्या से किसी की पत्नी बन जाने के विचार मात्र से रक्तिम हो आये.

आचार्य श्वेतकेतु ने सबको शांत करने के उद्देश्य से अपना शंख फूंका और कहा, “मैं श्वेतकेतु, इस स्वयंवर को संपन्न करवाने वाला आचार्य अपने गुरु की आज्ञा तथा पांचालराज यज्ञसेन द्रुपद की सहमति से यह घोषणा करता हूँ कि राजकुमारी द्रौपदी वीर्यशुल्का हैं, जो भी वीर अपनी वीरता से दी गई परीक्षा उत्तीर्ण करेगा, राजकुमारी उसके गले में जयमाला पहनाएंगी.

परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए प्रार्थी को सामने रखे जल के पात्र में बने प्रतिबिंब को देखकर, ऊपर यंत्र द्वारा चलित एक चक्र के ऊपर विपरीत दिशा में घूमती काष्ठ की मछली के नेत्र को, सामने रखे धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के पश्चात सटीक लक्ष्य द्वारा वेधन करना होगा.

प्रतियोगी एक बार में जितने चाहे बाण प्रयोग कर सकता है, इसके अतिरिक्त यदि वह असफल रहता है तो जितनी बार चाहे फिर से प्रत्यंचा चढ़ा कर पुनः प्रयास कर सकता है.

आर्यावर्त तथा अन्य देशों से सभी वीरों को शुभकामनाएं, जो भी वीर पहले आना चाहे, आ सकता है.”

इतनी भीषण परीक्षा सुन आधे से अधिक राजा खिन्न हो गए, क्योंकि वे सभी श्रेष्ठ धनुर्धर नहीं थे. ये प्रतियोगिता तो सिर्फ धनुर्धारियों के लिए थी. दुर्योधन ने श्वेतकेतु की घोषणा ध्यान से सुनी थी, उन्होंने जयमाला कहा, ना कि वरमाला, अर्थात कोई भी वीर लक्ष्यवेध करे पर आवश्यक नहीं कि विवाह भी करे. उसने तुरंत कर्ण एवं अश्वथामा से छोटी सी मन्त्रणा की. कर्ण सहमत प्रतीत हुआ पर अश्वत्थामा की खिन्नता उसके चेहरे पर स्पष्ट देखी जा सकती थी.

सभी एक दूसरे का मुंह देख रहे थे कि पहले कौन अपना भाग्य आजमाता है. तभी चेदि राज्य का राजकुमार शिशुपाल उठ खड़ा हुआ और आगे बढ़ा.
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माता कुंती ने अपने पाँचों पुत्रों को आशीर्वाद दिया और कहा, “जाओ पुत्रों, हमारे वनवास का समय तुम्हारे पराक्रम द्वारा समाप्त हो. और ध्यान रखना पुत्रों, विशेषतः तुम भीम, युधिष्ठिर ज्येष्ठ है, प्रथम अधिकार सदैव ही उसका रहेगा.”

जटाधारी ब्राह्मणों का वेश धरे, भस्म लगाए पांचों पांडवों ने अलग-अलग प्रस्थान किया. भीम जब स्वयंवर स्थल पहुंचे तो अंगरक्षकों ने उन्हें सामान्य जनता के लिए आरक्षित प्रकोष्ठ की ओर जाने का संकेत किया.

भीम का विद्रोही मन स्वयं को यह विचार करने से नहीं रोक पाया कि दिग्विजयी सम्राट पांडु के पराक्रमी पुत्रों की यह दशा कि वे प्राणरक्षा के लिए वन-वन भटकें, भिक्षा मांगें, और यहां इस स्वयंवर में भस्म रमाये साधारण भिक्षुक ब्राह्मणों के साथ बैठें. और अन्यायी, दुष्ट, प्रजा का रक्त चूसने वाले ये राजा-राजकुमार बहुमूल्य वस्त्रों में शस्त्रास्त्र से सज्जित होकर सम्मानित अतिथि का सम्मान पाएं.

उन्होंने ब्राह्मणों के प्रकोष्ठ में बैठे अपने बड़े भाई युधिष्ठिर को देखा और फिर उदास हो गए कि जिस व्यक्ति को दुष्यंत, भरत, कुरु, हस्ती, प्रतीप, शांतनु, पांडु जैसे महान सम्राटों के सिंहासन पर विराजमान होना था, वे यहां सामान्य जनों के बीच बैठे हुए हैं.

तभी उनकी दृष्टि राजन्य वर्ग में प्रवेश करते कुरु-कुमारों पर पड़ी. दुःशासन, दुर्विषह, दुर्मुख, विकर्ण, युयुत्सु, भीमवेगर्व, सह, दुस्पघर्षण, निषंगि, अग्रयायिन, दुर्विमोचन, विवित्सु, विकट, क्राध, अयोबाहु के साथ दूर्योधन ने प्रवेश किया और भीम के रक्त ने ऐसा उबाल मारा कि जैसे वे अभी अपना वृकोदर रूप प्रकट करें और दुर्योधन को अपने हाथों से पटक-पटक कर मार डालें.

क्रोध से फुँफकारते उनकी दृष्टि युधिष्ठिर पर पड़ी और उन्होंने उन्हें अपनी ओर ही देखता हुआ पाया. युधिष्ठिर के दाएं पैर के अंगूठे को देख उन्होंने स्वयं को संयत किया और बैठ गए. माता कुंती ने बचपन में भीम को सुझाव दिया था कि उन्हें जब भी अत्यधिक क्रोध आए, वे युधिष्ठिर के दाएं पैर का अंगूठा देखें, यदि वह नीचे हो तो शांत रहें, और यदि ऊपर हो तो अपने क्रोध को उचित परिणाम तक पहुंचाएं.

अपने भाईयों से अलग बैठे अर्जुन हस्तिनापुर से अपने निर्वासन के समय से ही उदासीन रहने लगे थे. उन्होंने अब तक बस अपनी माता तथा बड़े भाइयों की आज्ञा का पालन किया था. उन्होंने निरपेक्ष भाव से कौरवों को आते देखा.

द्रोणपुत्र अश्वत्थामा एवं कर्ण को आते देखा, कर्ण की उंगली पकड़े उसका अवयस्क पुत्र सुदामन भी था. बड़े भैया कर्ण की ओर सदैव आकर्षित रहते थे, उनका कहना था कि कर्ण के पैर माता कुंती जैसे हैं. पर अर्जुन चाहकर भी कभी उसके पैर नहीं देख पाया, क्योंकि उनकी दृष्टि तो कर्ण के मांसल कुंडलों पर ही अटक जाती थी.

राजन्य वर्ग में प्रचण्ड शोर हुआ. सभी राजा अपने-अपने स्थानों पर खड़े हो गए, लगा कि जैसे किसी अत्यंत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति ने प्रवेश किया हो. अर्जुन ने भी अन्य लोगों की तरह थोड़ा आगे बढ़कर देखा तो उनका ममेरा भाई, उनका सखा वासुदेव कृष्ण चला आ रहा था. उसके साथ भीमकाय बलदेव, मित्र सात्यकि, कृतवर्मा, वृद्ध अक्रूर एवं अन्य यादव अतिरथी थे. देश-देशांतर के राजाओं के मध्य ये यादव वीर, और उनके मध्य वासुदेव कृष्ण, जैसे तारों से भरे आकाश में सूर्य.

जब आचार्य श्वेतकेतु ने स्वयंवर की प्रतिज्ञा सुनाई तो यकायक ही अर्जुन के भाव परिवर्तित हुए कि यह कोई सामान्य स्वयंवर नहीं. ये तो विश्व के सम्मुख सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के प्रकट होने की कसौटी है. उनकी दृष्टि युधिष्ठिर की ओर गई, उन्होंने देखा कि बड़े भाई नकुल तथा सहदेव के साथ उठ कर प्रांगण से बाहर निकल रहे थे. कदाचित युधिष्ठिर ने विचार किया हो कि ये कसौटी उनके लिए नहीं है. भीम की प्रकृति ऐसे आयोजनों से दूर रहने की नहीं थी, वे परम उत्साहित दिखे.

भानुमति – 11

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  1. In the picture of Bhanumati 12 the Spelling of the name is wrong actual spelling is “Yagyaseni” not Yajnaseni.
    And the story is very interesting. I always waiting for the next one.
    Suberb.

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