नोटबंदी – 1 : भारतीय दर्शन और रुपये का इतिहास

भारत देश हमेशा से कृषि प्रधान रहा है. 1835 के रिज़र्व बैंक के आंकड़े यद्यपि यह बताते हैं कि भारत देश इसके साथ ही औद्योगिक देश ही था क्योंकि हमारे देश का विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में 33% का योगदान था.

इसी बात को सन 2000 के Angus Madison के शोध ने भी पुष्ट किया है. इसी के साथ शंका होती है कि देश कृषि प्रधान था या औद्योगिकि प्रधान था?

थोड़ा सा अधिक विश्लेषण आप करेंगे कि पता चलेगा हमारे उद्योग कृषि पर आधारित थे. उदाहरण के लिए मलमल का कपड़ा, जिसकी पूरी साड़ी एक अंगूठी से निकाल जाती थी. अब यह काम बिना कपास के नहीं कर सकते जो कि कृषि से उत्पन्न होता था.

हमारे देश के मसाले, फल सब्जी इत्यादि से संबन्धित कारखाने बने. हमारी कृषि मे उर्वरक क्षमता बढ़ाने के लिए खाद के रूप मे गोबर का उपयोग किया तो पशु पालन यहाँ का व्यवसाय बना. खाने पीने के लिए दूध दही घी भी पशु पालन से संबन्धित रहे.

पश्चिम देशों के अर्थशास्त्री Max Weber के अनुसार भारत की पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों पर आधारित थी. हर गाँव मे सभी आवश्यक वस्तुएं उत्पादित होती थी और उनका उपयोग भी स्थानीय स्तर पर होता था.

ग्रामीण उत्पादन और ग्रामीण उपभोग मे समानता होने के कारण किसी का भी शोषण नहीं होता था और न कोई वंचित रहता था. यहाँ तक के हर गाँव मे 12 प्रकार के कारीगर होते थे जैसे कि धोबी, जुलाहा, लुहार बढ़ई इत्यादि.

अर्थात प्रत्येक गाँव अपने आप मे सक्षम था. यद्यपि यातायात, संचार, बाह्य सुरक्षा इत्यादि के साधन के लिए शासक था. परंतु रोज़ के जीवन में उनकी भूमिका नगण्य थी. और उस व्यवस्था को चलाने के लिए कृषक से अनाज इत्यादि राजा को मिलते थे, जिसे आप कर या लगान कह सकते हैं.

उस समय हरेक को अपनी आवश्यकताओं के लिए कुछ वस्तु विनिमय की आवश्यकता भी थी. तब हमारे यहाँ विनिमय के लिए अनाज, फल, सब्जी इत्यादि का प्रयोग होता था. परन्तु क्योंकि कृषि उत्पाद बहुतायत में था, लोगों का हृदय विशाल था. उसका सबसे बड़ा कारण था कि हमारे देश में अनुकूल प्रकृति का आशीर्वाद.

नदी, पर्वत, पेड़ इत्यादि और अनुकूल वर्षा के कारण. इसके कारण हम अपनी प्रकृति के लिए भी नतमस्तक हुए. यह नदी को पूजना, पर्वत की पूजा और वृक्षों का पूजन यह सब उसी परंपरा की देन है. क्योंकि पूजन से इनका संवर्धन करने का संदेश सबको मिलता था. इनका दोहन नहीं किया जाता था. इसलिए हमारे हजारों सालों कि व्यवस्था में कभी पर्यावरण दिवस नहीं मनाया जाता था और न ही उसे मनाने की आवश्यकता पड़ी.

दूसरी तरफ परिवार व्यवस्था के कारण कभी भी मातृ दिवस, पितृ दिवस इत्यादि नहीं मनाया गया. संयुक्त परिवार की व्यवस्था होने के कारण हमारे यहाँ पर परिवारों में वृद्धों का सम्मान इत्यादि हमारे सामान्य रूप से संस्कृति का हिस्सा रही.

साथ ही एक और भावना रही जिसे आप अतिथि देवो भव: के नाम से जानते हैं. हम अतिथि को पूजते रहे और उसे हमेशा अभिवादन करते रहे. कारण स्पष्ट है कि हमारे पास बहुतायत में था. इसीलिए पूरे विश्व से जो जो भी आया हमने उसका स्वागत किया. इसके कारण हमारे हृदय विशाल रहा और हमारी बुद्धि ने आन्तरिक शोध किया जिसके कारण हम आंतरिक खोज में आगे बढ़े.

व्यक्ति से परिवार बड़ा, परिवार से समाज बड़ा, समाज से संसार बड़ा और संसार से ईश्वर बड़ा. इसी धारणा में हम आगे बढ़े. हमारा दर्शन शास्त्र आगे बढ़ा क्योंकि हमें प्रकृति से लड़ना नहीं था. आवश्यकतायें पूरी हो रही थीं. देश ने सफलता के स्थान पर संतुष्टि के महत्व को समझा.

वहीं दूसरी तरफ आई यूरोपीय या पश्चिमी सभ्यता जहां प्रकृति का अभिशाप अधिक था. महीनों सूर्य के दर्शन नहीं होते थे. खेती की संभावना नहीं. प्राकृतिक संसाधनों का पूर्णतया अभाव.

पशु तो दूर मनुष्य का जीवन भी दूभर था. ऐसे समय पर वहाँ के लोगों को प्रकृति से संघर्ष करना था. उनके अस्तित्व की लड़ाई थी. इसके लिए वहाँ तकनीकी का विकास हुआ. उनकी बुद्धि बाह्य शोध की तरफ बढ़ी और सांसारिक उपभोग की वस्तुओं का वहाँ प्रचार हुआ. इसके कारण हृदय में संकीर्णता आ गयी.

आज ही सब्जी ले लूँ कल मिले न मिले, आज समान का संग्रह कर लूँ क्योंकि कल मिलने की संभावना का पता नहीं. इसलिए आप उनके उपकरण देखें. वातानुकूलित संयंत्र बने. मात्र Refrigerator ही नहीं बड़े बड़े deep freezer बनाए गए. यह उनकी आवश्यकता थी. दुर्भाग्य से हम उनके जाल में फंस कर उनकी वस्तुओं का उपयोग करने लगे.

यहाँ आपकी और पश्चिमी देशों की सभ्यता और संस्कृति से आप जुड़ कर जान सकते हैं कि क्यों हमारे और उनके स्वभाव मे अंतर है और वह प्राचीन काल से चला आ रहा है. हमारे यहाँ दिल बड़ा होता गया और बुद्धि का विकास आन्तरिक सुख या दर्शन के लिए हुआ.

प्रकृति माता की गोद में पले बसे होने के कारण हमारा प्रकृति से सामंजस्य रहा. वहीं पश्चिमी सभ्यता में दिल छोटा और बुद्धि का विकास प्रकृति के विपरीत परिस्थिति होने के कारण तकनीक विकसित करने के लिए हुआ. हमारे यहाँ परिवार वाद रहने के कारण समाज महत्वपूर्ण रहा वहाँ व्यक्ति महत्वपूर्ण रहा. हम लोग संतुष्टि या संतोष satisfaction प्राप्त करने के लिए आगे हुए और वहाँ सफलता success के लिए बढ़े. हम समाज के assurance या आश्वासन से आगे गए और वहाँ insurance यानि बीमा का प्रभाव रहा.

अगले अंक मे आगे रुपये की विनिमय की आवश्यकता और उसके प्रभाव

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY