इच्छाएं

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कुछ इच्छाएं भीष्म होतीं हैं, जो तुम्हें देखे बगैर मरने नहीं देती.

कुछ इच्छाएं अधमरी होतीं हैं, जो जीने नहीं देती.

कुछ इच्छाएं धृष्ट होतीं, जो चाहती तुम्हारे अधूरे चित्रों के साथ होना.

कुछ इच्छाएं पेड़ा होती है-  हाँ, “पेड़ा”

गाँव की 50 साला विधवा बड़की, जब अपने दम तोड़ रही थी
अंतिम इच्छा पूछने पर
बताया था- खाना है, पेड़ा
हँस पड़े थे सब ठठाकर कहते हुए- पेड़ाsssss

चौक की ही एक छोटी दुकान से लाकर पेड़ा
मरने वाले की अंतिम इच्छा की गयी थी पूरी.

इस सुंदर इच्छा के साथ ही वह संस्कारी बन मरी थी
चार संस्कारी पुरुषों ने संस्कार को श्मशान पहुँचाया था.

उम्र या बीमारी से नहीं, संस्कार बचाने में उपेक्षा से मरी थी वह
श्राद्ध पाँच मिठाइयों के साथ संपन्न हुआ था.

इच्छा पूरी करने वाला, पेड़े की दुकान भी फल-फूल रहा था खूब.
पता नहीं क्यूँ तब से पेड़े का स्वाद कड़वा लगता मुझे
श्राद्घ का भोज कब खाया फिर याद नहीं.

कोई अतृप्त इच्छा कह रहा था -बड़की से मधुर व्यंजन उसके मालिक का था, हाँ..उन्नीस-बीस तो होता ही है.

नानी ने कहा था- बेलन का दोनों मुठ्ठी भी उन्नीस-बीस होता, ताकि बना रहे संतुलन.

बड़की मर कर भी संस्कार और पत्नी धर्म निभा गयी थी.

कुछ इच्छाएं हवा में उड़ती पॉलिथीन होतीं हैं, आसमां छूने की चाह में खुद के ही चिथड़े उड़ा लेती.

कुछ इच्छाएं अपाहिज होतीं जो दौड़ने की चाह में घिसटती है बस.

कुछ इच्छाएं बदचलन होती हैं, जैसे तुम्हें छूने की.

ऐसी इच्छाओं का श्राद्ध भी नहीं होता, जो भूत-पिशाच बनकर भटकती रहती दर-ब-दर…

  • घुँघरू परमार

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