हे भारत! निश्चिन्त रहो, तुम्हारे जागरण की जम्हाई मात्र से संसार कम्पित है

विनोद खन्ना महाराणा प्रताप बने थे एक टीवी सीरियल में, याद है किसी को?

नहीं ना! कोई बात नहीं, क्योंकि यह बात मात्र प्रचारित हुई थी और कुछ एपिसोड शूट भी हुए हो लेकिन टीवी पर किसी ने विनोद खन्ना को महाराणा प्रताप के रूप में नहीं देखा.

ज्ञात कारण तो यही था कि बिल्कुल सटीक इतिहास को यथारूप प्रसारित करने एवं नाटकीयता एवं मिर्च मसाले के अभाव में दर्शकों की बेरुखी के चलते प्रताप के युवा प्राकट्य (विनोद खन्ना) वाले एपिसोड से पहले ही सीरियल बंद हो गया.

20 साल बाद फिर से भारत का वीरपुत्र महाराणा प्रताप नाम से सीरियल आया, उसमें नाटकीयता की अति इस स्तर पर पहुंच गई कि निर्देशक ने इसे ऐतिहासिक के स्थान पर डेली सोप बना दिया, महारानियों को वैम्प और जगमाल को अकबर से भी भयंकर शत्रु चित्रित कर दिया और अंततः इसमे भी हल्दीघाटी का युद्ध जो मुख्यत दर्शनीय था, वह सुचित्रित ना हो सका.

नाटकीयता की वाहियात अति को दर्शाते उस धूर्त निर्देशक ने हल्दीघाटी के युद्ध के नाम पर जो कचरा परोसा उससे लाख बेहतर राजपूत बच्चे तब अपने बाल्यकाल मे खेल खेल में कर दिखाते थे.

पद्मावती के साथ भंसाली ने न्याय किया है या नहीं फिलहाल भविष्य के गर्भ में है किंतु महाराणा प्रताप के यश का जो क्षरण इस धूर्तसेना यथा अभिमन्यु राज सिंह, आरिफ शंसी एवं नीतीश रंजन ने किया है वह अपेक्षाकृत अधिक विकराल एवं अक्षम्य है.

जिन्हें हल्दीघाटी युद्ध के वास्तविक रूप के विषय में नहीं पता वे निर्दोष जनसामान्य रतनजोत के फल को हरा बादाम समझ कर खाते रहे.

इसी समय में महाराज शिवाजी पर शानदार संतुलित सीरियल बना और उसने नाटकीयता और इतिहास की शुद्धता के साथ पूर्ण समन्वय बनाते हुए अद्भुत कृति दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत की जिसे अपने स्वर्णिम इतिहास को सुन्दर प्रतिरूप मे देखने को व्याकुल जनता ने हाथों हाथ लिया और उस सीरियल ने प्रसिद्धि के रिकॉर्ड्स तोड़ दिए.

भारतीयों का दुर्भाग्य भी कहाँ इतना कमजोर था, उस धारावाहिक को अफजल खान के वध पर ही अदृश्य दुष्ट शक्तियों द्वारा समाप्त करवा दिया गया जबकि औरंगजेब और शिवाजी की अधिक रोचक भिड़ंत का आरंभ भी ना हो पाया था.

जनता सब कुछ भूल गई लेकिन तभी दक्षिण भारत में एक सांस्कृतिक तूफान उठा जिसने सम्पूर्ण भारत में फैले छद्म धर्मनिरपेक्ष खरपतवारों को उखाड़ फेंका और हिंदुत्व के स्वर्णिम काल को काल्पनिक फ़िल्म बाहुबली के रूप में प्रदर्शित कर दिया.

समस्त दिशाओं सहित स्वयं बॉलीवुड उसकी सफलता की चकाचौंध से चुंधिया सा गया.

राजामौली ने सिद्ध कर दिया कि बिना किसी षडयंत्रों में उलझे नाटकीयता की आवश्यक मिलावट के साथ मूल कथा को कैसे श्रेष्ट स्वरूप में दर्शको के समक्ष रखा जा सकता है कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाये.

आज देखिये आप सभी हिंदीभाषी मूवी चैनलों को, सभी अटे पड़े हैं दक्षिण भारतीय फिल्मों से जिनमें कहीं कोई नायक हनुमान जी का अनन्य भक्त है तो कोई मगधीरा, काल भैरव का स्तुत्यगान इस प्रकार से कर रहा है कि रोमहर्षण हो उठता है.

बॉलीवुड चुपचाप अपनी इस शर्मनाक पराजय का एक मोर्चा तो देख ही रहा था कि दूसरी ओर बड़े बड़े महान बादशाहों की फिल्मों ने रजतपट पर पानी भी नहीं मांगा.

ऐसे में आ गई बाहुबली -2, इसने बचे खुचे बॉलीवुडिया अभिमान का चूर्ण बना के फिजाओं में बिखेर दिया जिसे बेरोजगार अख़्तर जैसे लोग बेचारे कॉन्क्लेवो में इकट्ठा करते हुए पाए जाते हैं कि एक दिन फिर से हम अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि से भारतीय सिनेमा पर राज करेंगे.

उपरोक्त सम्पूर्ण गाथा का प्रयोजन यह है कि पद्मावती बॉलीवुड का अंतिम अस्त्र है जो उन्होंने अपने उपलब्ध श्रेष्ट योद्धा संजय लीला भंसाली के हाथों चलवाया है. यकीन मानिए दक्षिण और राजामौली से बुरी तरह से पिटे बॉलीवुड को अब पद्मावती की ऐतिहासिक सफलता की संजीवनी चाहिए और विगत सारा उपक्रम उसी का एक सुनियोजित भाग है.

क्षत्रियों सहित सम्पूर्ण हिन्दू दर्शक यदि जरा भी रणनीति समझते है तो देखें कि इस समय वे श्रेष्ट स्थिति में है. पद्मावती का व्यापक लोक इतिहास यदि भंसाली ने अपनी उत्तम कला के आश्रय से जीवंत कर दिया तो बॉलीवुड शर्म से झुके हुए मस्तक को फिर से उठाने मे सक्षम हो पायेगा. और जो भंसाली ने अपने दलदली संगति से प्रभावित होकर बॉलीवुड का घिसापिटा वामी/मियामी एजेंडा प्रस्तुत किया तो यह तय मानिए कि ना केवल बॉलीवुड दक्षिण के आगे धराशायी हो जाएगा गुणवत्ता एवं स्वीकार्य सफलता के मैदान में अपितु हिन्दू अस्मिता के संरक्षणार्थ होने वाले व्यापक पुरुषार्थ की अग्नि से स्वयं को जलता हुआ भी देखेगा.

तो बंधुओं! शांति से देखिये काल के इस विशेष कदम को और होने दीजिए स्क्रीनिंग, निश्चित रूप से आप कुछ भी खोने नहीं जा रहे. फ़िल्म आपकी अपेक्षा के अनुरूप हुई तो भी आपकी जय है और नहीं हुई तो भी सभी विकल्प खुले हैं जिनमें बॉलीवुड के पतन से लेकर, जूते रखने तक के सभी कौतुक सहर्ष सम्पूर्ण किये जायेंगे और हां! जो भंसाली चूक गए ये मौका तो तैयार रहिये दक्षिण के अगले वार के लिए कि जब आप महाराणा प्रताप, शिवाजी राजे, अमरसिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान सहित कई स्मृत-विस्मृत महानायकों पर ऐतिहासिक भव्य फिल्में देखोगे जिनकी निश्चित अथाह सफलता बॉलीवुड के वामी भाग का क्रूरता से वध कर देगी.

विश्वास कीजिये बहुत शीघ्र ही आप हिन्दू दर्शकों के रुझान, प्रसन्नता ,”बख्शीश ” एवं आशीर्वाद को पाने के लिए दक्षिण बनाम बॉलीवुड में गलाकाट स्पर्धा देखेंगे जैसे आज राजनीति में आपके वोट के लिए विधर्मियो को मंदिरों में नाक रगड़ते हुए देख ही रहे है.

हे भारत! निश्चिन्त रहो, तुम्हारे जागरण की जम्हाई मात्र से संसार कम्पित है, जो तुमने अपना त्रिनेत्र खोला तो प्रलय निश्चित है, लेकिन है आशुतोष थोड़ा धैर्य रखो संजय भी यही है उसकी लीला भी और ” भन साली” भी, साथ ही भाजपा का स्टैंड भी क्लियर हो जाएगा हिन्दू अस्मिता को लेकर.

“स्मरण रहे कि जो फूँक दिए कि लौ को बुझा देती है वही फूँक अंगारों को और दहका कर प्रज्वलित कर देती है, हिन्दुओं को फूँक मारना अब अंगारे सुलगाने के समान ही है जिसका ताप सहने की हिम्मत अब किसी मे नहीं. ”

जय सनातन । जय मेवाड़ ।।
जय शक्तिस्वरूपा महारानी पद्मिनी ।।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY