इसलिये कभी रुकना नहीं चाहिये उनका विजय-रथ, न गुजरात में और न ही 2019 में

किसी गैर-भाजपा समर्थक ने मुझे पूछा था कि इस बार के गुजरात चुनावों में क्या होगा?

क्योंकि भाजपा के परंपरागत वोट-बैंक रहे व्यापारी वर्ग भाजपा से नाराज़ है और तुम जैसे लोग हिंदुत्व पर उनके रवैये को लेकर दुखी हो.

तो इसके जवाब में मैंने उससे कहा था कि तुम ये ऐसा इसलिये सोच सकते हो क्योंकि तुमको संघ-भाजपा या फिर और उनके परंपरागत संबंधों का कुछ पता ही नहीं है.

हम जैसे लोग विरोध और नाराजगी की हद वहीं तक बाँध कर रखते हैं जहाँ विचार-परिवार को कोई न नुकसान हो.

जब नुकसान होने की आशंका भी हो तो हम सतर्क होकर साथ खड़े हो जाते हैं. और इस बात का प्रमाण तुमको सोशल मीडिया पर भी दिख जायेगा.

साहेब से कुछ दिन पहले तक घनघोर असहमत लोग भी खुल कर समर्थन में उतर आएंगे.

ऐसा इसलिये होता है इसको समझने के लिये मैंने उनको एक घटना बताई तो जो आपके साथ भी साझा कर रहा हूँ.

2007 में पूज्य गुरूजी का ‘जन्मशताब्दी वर्ष’ था. इस दौरान देश भर में जगह-जगह कई अलग-अलग तरह के कार्यक्रम किये गये थे.

ऐसे ही एक कार्यक्रमों में भोपाल से प्रकाशित होने वाले हिंदी दैनिक “स्वदेश” ने अखिल भारतीय स्तर पर एक आलेख प्रतियोगिता आयोजित किया था.

प्रतियोगिता में “भारतीय ईसाइयों और मुसलमानों के प्रति श्रीगुरुजी के विचार” विषय पर लिखे आलेख के लिये मुझे द्वितीय पुरस्कार मिला था.

फरवरी, 2008 में वाणगंगा, भोपाल के रवीन्द्र भवन में आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कार वितरण समारोह था.

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूज्य संत स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों पुरस्कार मिलना था.

उसी दिन बाबा रामदेव भोपाल आये थे इसलिये अंतिम क्षणों में शिवराज सिंह चौहान कार्यक्रम में नहीं आ पाये पर उनके आने की खबर के चलते उस रवीन्द्र भवन में भाजपाइयों और संघ विचार परिवार के दूसरे लोगों का जमघट लगा था.

मेरे बायें-दायें कोई पुराने संघी और एक भाजपाई इस बात को लेकर एक-दूसरे से उलझ पड़े कि 2003 के लोक-सभा चुनावों में हार इसलिये हुई थी क्योंकि अटल जी ने हिंदुत्व का रास्ता छोड़ दिया था या फिर उस हार की कोई और वजह थी.

दोनों एक-दूसरे से बहस में उलझे हुये थे तभी स्वामी सत्यमित्रानंद जी ने बोलना शुरू कर दिया.

गुरूजी को याद करते हुये उन्होंने कहा कि एक बार किसी कार्यक्रम में पूज्य गुरूजी ने मुझे मुख्य-अतिथि के रूप में आने के आमन्त्रण दिया.

मैंने उनसे फोन पर बात की और कहा, आपका आदेश सर आँखों पर परतु आने से पूर्व मेरी एक शर्त है. गुरूजी ने पूछा, जी बताइए.

स्वामी सत्यमित्रानंद जी ने कहा, मैं तभी आऊँगा जब मेरे स्वागत के लिये आप नहीं आयेंगें क्योंकि मैं आपको ऋषि मानता हूँ और स्वयं को उतना बड़ा नहीं समझता कि मेरे स्वागत के लिये पूज्य गुरूजी को आना पड़े.

पूज्य गुरूजी ने सहमति दे दी और कहा, ठीक है मैं आपके स्वागत के लिये स्टेशन पर नही आऊंगा.

स्वामी सत्यमित्रानंद जी कहते हैं कि वो जब स्टेशन पर पहुँचे तो देखा वहां पूज्य गुरूजी खड़े हैं. मैंने उनसे कहा, पूज्य गुरूजी ये ठीक नहीं है, आपने मुझसे वादा किया था कि आप मेरे स्वागत के लिये नहीं आयेंगें पर आपने अपना वादा तोड़ दिया.

पूज्य गुरूजी मेरे पैरों पर झुकते हुये बोले, “गोलवलकर अपने वचन पर ही हैं, आपको शायद मेरे शब्द याद नहीं, मैनें कहा था कि मैं आपके स्वागत के लिये नहीं आऊँगा, इसलिये आपके स्वागत के यहाँ के विभाग संघचालक जी आये हैं और मैं आपके “स्वागतार्थ” नहीं बल्कि “दर्शनार्थ” आया हूँ और दर्शन से रोकने के अधिकार आपको नहीं है.”

(पूज्य गुरूजी के ये स्वभाव में था कि भगवा वस्त्रधारी सन्यासियों के वो पैर छूते थे).

ये संस्मरण कहते-कहते स्वामी सत्यमित्रानंद जी फूट-फूट कर रोने लगे और उनके साथ उस पूरे ‘रवीन्द्र भवन’ में सबकी आँखें भर आई जिसमें आपस में लड़ने वाले वो दोनों भी थी. इसके बाद दोनों के गिले-शिकवे ख़त्म हो चुके थे.

ये प्रसंग केवल ये बताने के लिये लिखा है कि संघ विचार परिवार के सदस्यों को किन सूत्रों और अंतर्संबंधों ने एक-दूसरे से बाँध कर रखा हुआ है. साहेब और संघ-भाजपा के एक सामान्य कार्यकर्ता के संबंधों की धुरी भी यही है. तमाम मतभेदों के बावजूद दोनों एक ही वर्तुल में हैं और रहेंगे.

विरोध और आलोचना सिर्फ विचार-परिवार की वृद्धि के लिये होती है जिसमें अपने तरीके से उधर वो लगे हैं और इधर हम लोग. “वो करेंगें और उनको करना ही होगा” और इसलिये आवश्यक है कि उनका विजय-रथ कभी रुकना नहीं चाहिये न गुजरात में और न दो हज़ार उन्नीस में.

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