हम अपनी संभावित प्रजाति से 200 साल पीछे खड़े हैं

इस अनंत ब्रह्माण्ड में कितनी आकाशगंगाएं हैं, अब तक गिना नहीं जा सका है.

हमारी ‘मिल्की वे’ में ही अब तक सौ बिलियन ‘सौर मंडल’ होने का पता चला है, हमारी आकाशगंगा की खोज तो हमने अब शुरू ही की है. अभी पड़ोसी आकाशगंगा बाकी है.

हमारी आकाशगंगा के इन सौर मंडलों में निश्चित ही करोड़ो सभ्यताएं पनप रही हैं. इनमें से कुछ पाषाण युग से गुज़र रही हैं तो कुछ इतनी शक्तिशाली हैं कि अपने सौर मंडल को नियंत्रित कर सकती है.

और कुछ ‘पृथ्वियां’ भी हैं जो अभी अपने विकास के ‘ज़ीरो’ लेवल पर संघर्ष कर रही हैं. होमो सीपियन्स यानि हम भी इसी श्रेणी में आते हैं.

सन 1964 में एक रुसी खगोल वैज्ञानिक कार्दाशेव निकोलाई ने ब्रह्माण्ड में सर्वाइव कर रही सभ्यताओं के तकनीकी विकास को समझाने के लिए एक थ्योरी बनाई.

इस थ्योरी को आज ‘द कार्दाशेव स्केल’ के नाम से जाना जाता है. इस पैमाने से अनंत ब्रह्माण्ड में पनप रहे ‘जीवन’ के विभिन्न स्तरों को समझने में वैज्ञानिकों को बहुत मदद मिली.

कार्दाशेव के मुताबिक विभिन्न आकाशगंगाओं में फैली सभ्यताओं के तीन स्तर हो सकते हैं. जब बाद के वर्षों में हमारी विशाल दूरबीने आकाशगंगाओं के भीतर झाँकने लगी तो खगोल वैज्ञानिकों ने द कार्दाशेव स्केल में चार स्तर और जोड़ दिए.

अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने के बावजूद हम मानव इस स्केल में ‘शून्य’ स्तर पर ही है. हमारी उपलब्धि इतनी है कि बहुत कम वक्त में हमने पहिये का अविष्कार कर लिया था, खेती से अंतरिक्ष विज्ञान तक पहुँचने में हमने चंद हज़ार साल ही खर्च किये हैं.

विकास के उच्च स्तर पर पहुँचने के बाद ‘कार्दाशेव स्केल’ शुरू होती है. अभी हम ‘जीरो लो-लेवल सिविलाइज़ेशन’ की श्रेणी में आते हैं.

हम अपनी ऊर्जा की ज़रूरतें प्राकृतिक संसाधनों से पूरी कर रहे हैं. सतत विकास की प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती. जैसे-जैसे विकास बढ़ेगा, ऊर्जा की जरूरत बढ़ती चली जाएगी. इतना सारा तामझाम ऊर्जा मांगेगा.

एक दिन पृथ्वी के संसाधन भी खत्म हो जाएंगे और हमारे लिए डूम्स डे की स्थिति बन जाएगी. ब्रह्माण्ड की सत्तर प्रतिशत सभ्यताएं इस पॉइंट पर आकर विलुप्त हो जाती हैं.

इन सभ्यताओं का काल बनता है परमाणु पर निर्भरता. हम भी उस स्तर तक आ पहुंचे हैं, परमाणु भट्टियां स्थापित कर रहे हैं.

यहाँ से हमारे लिए दो रास्ते खुल गए हैं. परमाणु का रास्ता अंत में हमारा अंत बनेगा और यदि अक्षय ऊर्जा की ओर जाते हैं तो अगले 100-200 साल में ‘ए टाइप सिविलाइज़ेशन’ बन जाएंगे, बशर्ते इस बीच हमें किसी भयानक प्राकृतिक आपदा से न गुज़रना पड़े.

हालाँकि हम अक्षय ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ा रहे हैं, ये अच्छा संकेत है. ऊर्जा के लिए यदि परमाणु के बजाय सौर ऊर्जा और अदृश्य ऊर्जा (ब्लैक मैटर) का उपयोग करने में सक्षम हो गए तो हमारी सभ्यता के लिए आगे के दरवाज़े खुल सकते हैं.

यानि साफ़ है कि ‘ए ‘ श्रेणी तक जाने के लिए कुछ हद तक इस सभ्यता को आध्यात्मिक होना होगा, अपने वैचारिक स्तर को बढ़ाना होगा. विज्ञान के अविष्कार मानव की सहायता और अंतरिक्ष अनुसंधानों के लिए होंगे.

अब जानें कि ब्रह्माण्ड में किस तरह की विभिन्न सभ्यताएं निवास कर रही हैं और आगे के लेवल पर पहुँचने के लिए प्रयासरत हैं

जीरो लेवल- प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित, आध्यात्मिकता और वैचारिकता निम्न स्तर पर, परमाणु का अधिकता में प्रयोग.

पहली श्रेणी – ऊर्जा का सम्पूर्ण उपभोग अपने सूर्य यानि ‘मातृ तारे’ से करती है. अपने ग्रह की प्राकृतिक गतिविधियों को नियंत्रित कर सकती है. भूकंप, सुनामी, बाढ़ आदि पर नियंत्रण कर सकती हैं.

दूसरी श्रेणी- सर्वाइवल के लिए ये सभ्यता किसी भी बंजर ग्रह को रहने लायक बना सकती है. अपनी आकाशगंगा में अदृश्य रूप से बह रही ऊर्जा का उपभोग करने में सक्षम होती है. ये अपने सौरमंडल के किसी भी ग्रह की ऊर्जा खींचने में सक्षम होती है.

तीसरी श्रेणी- ये सबसे रोचक सभ्यताएं हैं. ब्रह्माण्ड में प्राचीन सभ्यताओं में शामिल. ये आकाशगंगाओं के बीच सफर करती है. जरुरी नहीं इनका ग्रह हो. बल्कि इनके स्पेसशिप ग्रहों जैसे विशाल होते हैं, जिनका अपना वायुमंडल होता है. आध्यात्मिकता का स्तर भी ऊँचा होता है. ये प्राणी हो सकते हैं या बायोलॉजिकल सूट पहने रोबोट. इस सभ्यता में प्रकाश की गति से यात्रा संभव होती है.

इसके बाद की सभ्यताओं पर चर्चा दिमाग घूमा देगी इसलिए विराम दे रहा हूँ.

अब सोचने की बात है कि हमें लगता है पृथ्वीवासी चाँद पर पहुँच गए, मंगल पर रोवर भेज दिया, बहुत बड़ा काम कर लिया. जबकि हकीकत ये है कि हम अपनी संभावित प्रजाति से 200 साल पीछे खड़े हैं.

और 200 साल बाद शायद हमारी मिल्की-वे में अन्य सभ्यताओं को पता चले कि दो हाथ-दो पैर वाले मनुष्य अब उनके साथ ‘ए श्रेणी’ की सभ्यताओं में शामिल हो गए हैं.

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