इश्क़ में आशिक़ भी ख़ुद, माशूक़ भी ख़ुद

तुम शायद नहीं जानते
तुम्हें जानने की कोई ज़रूरत भी नहीं
कि तुम्हें भेजा गया है मेरे लिए

यूँ तो तुम बहुत काम करते हो
बहुतों से इश्क़ भी फ़रमाते हो
तुम्हारा ह्यूमर भी काफ़ी अच्छा है
ध्यान भी करते हो

पर मेरी ज़रूरत के हिसाब से
मेरे दर्द के मद्देनज़र
ख़ुदा तुम्हारे हाथों मुझ तक संदेश पहुँचाता रहता है

तुम नहीं जानते
तुम्हें जानने की कोई ज़रूरत भी नहीं
तुम्हारे रूप में ख़ुदा आकार ले लेता है
साकार मुझ से बात करने आ जाता है

यूँ तो हर कोई उसी एक की मैनिफ़ेस्टेशन है
पर हर कोई दिल का मेहरम तो नहीं होता
हर कोई अपनी ही रूह का गुमशुदा हिस्सा नहीं होता

और बात तो सारी अपनी ही है
अपने दिल की, अपनी रूह की
इश्क़ में आशिक़ भी ख़ुद, माशूक़ भी ख़ुद

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