पात्र काल्पनिक है तो पद्मावती नाम ही क्यों? लीला भंसाली क्यों नहीं?

कई अति बुद्धिजीवी रानी पद्मावती की ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं.

मान लेते हैं ये चरित्र काल्पनिक है. मगर ये हमारे लिए आदर्श है. यह हमारा विश्वास है, हमारा अभिमान. हमारा गुरूर है.

हमारी आस्था जुडी है इस चरित्र के साथ. इस चरित्र की कहानी के साथ जुड़ा है हमारा इतिहास और उसके कुछ काले अध्याय.

और इन काले बादलों के बीच से निकलती है हिन्दुस्तान की कहानी के वो चमकदार शब्द जो हमारे स्वाभिमान को सदियों से जगाये हुए हैं.

ये हमारे अतीत ही नहीं वर्तमान का भी मूल्यवान चरित्र है. और किसी समाज के आदर्श से खिलवाड़ एक गुनाह है.

ऐसे में अगर आप जैसों का कोई आदर्श नहीं तो उसमें हम क्या कर सकते हैं.

और अगर यह पात्र काल्पनिक ही है तो फिर यही नाम क्यों? कोई और क्यों नहीं? इस फिल्म का नाम लीला भंसाली भी तो हो सकता है?

असल में संजय भंसाली तुम कलाकार नहीं हो, एक मनोरोगी हो, बल्कि धूर्त लोभी, ऊपर से सांस्कृतिक रूप से बीमार भी हो.

तुमने अपनी देवदास में जब पारो और चंद्रमुखी को एक साथ नचाया तो यकीनन उपन्यासकार शरतचन्द्र की आत्मा तड़पी होगी.

और जब तुमने बाजीराव में मस्तानी और काशीबाई को नचा दिया तो पेशवा की आत्मा क्रोधित हुई होगी.

वैसे हम तुम्हारी फिल्म देखते नहीं, ना देखेंगे. अब सुना है पद्मावती को भी नचा रहे हो.

यह संस्कार तुम्हे कहाँ से मिले? जिसमें जो देखो वही नाच रहा है. वैसे संस्कार घर से ही मिलते हैं. तो यह दोष तुम्हारा नहीं, तुम्हारे वंश में पल रही सोच का है.

वैसे शायद एक बात तुम नहीं जानते कि हिन्दुस्तान में नाचने वालियों की भी नाक हमेशा ऊंची रही है, उनका भी एक उसूल होता है. जो तुम लोगों के नचनिया गिरोह में कभी नहीं रहा.

अरे मक्कार, क्या तुझे यह भी नहीं पता कि हिन्दुस्तान में सिर्फ राजपूत ही नहीं बल्कि किसी भी सामान्य हिन्दू परिवार की महिलायें भी यूं ही नहीं नाचती. और यहां तो तुम्हारा फ़िल्मी चरित्र एक महारानी का है.

अरे मूर्ख, महारानियाँ नाचा नहीं करतीं बल्कि नचाती आईं हैं. और हिन्दुस्तान के हर घर की महिला किसी महारानी से कम नहीं होती.

तुम कहते हो कि फिल्म एक बार देख लो, इसमें ऐसा कुछ गलत नहीं होगा. तो हमें पता है इसमें कुछ सही भी नहीं होगा.

हम जानते हैं इसमें क्या होगा. इसमें वही होगा जो मुगले आज़म में था. एक व्याभिचारी अय्याश अकबर को फिल्म के द्वारा मुगले आज़म बना डाला गया.

जोधाबाई के चरित्र के कंधे पर रखकर उस हिन्दू विरोधी क्रूर अत्याचारी को महान सम्राट बना दिया गया. उसके बाद की पीढ़ी अकबर को उसी रूप में देखती सोचती है.

यह छल था और वही एक बार फिर तुम करने जा रहे हो. पद्मावती के नाम के सहारे तुम एक दानव खिलजी को मानव के रूप में पेश करोगे, जो भारत के दर्शकों के साथ एक बार फिर धोखा होगा.

वैसे तुम चाहते तो इस फिल्म का नाम खिलजी भी रख सकते थे और उसमें उसके समलैंगिक प्रेम का खूबसरती से वर्णन कर सकते थे. वैसे भी यह अधिक सच होता और तुम्हारे लिए आसान भी. हो सकता है अपने ख्वाब में तुम्हे खिलजी से मोहब्बत हो.

ऐसे में अगर तुम अपनी मोहब्बत को परदे पर उतारते तो तुम्हे कम पैसे नहीं मिलते. और फिर जहां तक बात रही मीडिया गॉसिप की तो खिलजी ना सही, रणबीर के साथ अपनी प्रेम कहानी की चर्चा करवा देते. वैसे यह तुम्हारी चाहत के करीब भी होता.

हिन्दुस्तान में इस कहानी से भी पैसे कमाए जा सकते हैं. तुम्हे पैसे के पैसे मिल जाते, साथ ही तुम्हारी शारीरिक और मानसिक भूख भी शांत हो जाती.

हो सकता है तुम इस फिल्म से भी 100-200 करोड़ कमा लो. मगर तुम्हारी औकात दो कौड़ी की नहीं. पता है क्यों? क्योंकि कोठे के दलालों की इतनी ही कीमत होती है!

हाँ कोठे वाली की कीमत पर यह थोड़ा बहुत ऊपर नीचे हो सकता है. मगर तुम्हारी नाचने वालियों की कीमत भी कुछ ज्यादा नहीं, फिर चाहे वो दीपिका हो या प्रियंका.

हाँ, ये दीगर बात है कि ये सब भी हिन्दुस्तान की महान महिलाओं के नाम का सहारा लेकर लाखों कमा लेती हैं. वरना इनसे बेहतर गली में अनेक आम मिल जाती हैं.

कुछ शरीफ और नारीवादियों को मेरे इस लेख से बहुत गुस्सा आ रहा होगा. कैसे मैंने कुछ नारियों के नाम लिए. आ रहा है ना? आना भी चाहिए.  ठीक वैसे ही मुझे भी गुस्सा आ रहा है, क्योंकि पद्मावती के चरित्र के साथ धोखा हो रहा है.

क्या पद्मावती नारी नहीं? या तुम्हारी नारी की इज्जत है और हमारी नारी का कुछ नहीं. ये दोगलापन नहीं चलेगा.

और फिर पद्मावती तो जीवित भी नहीं, कि वो अपना बचाव कर सकें या फिर अग्नि परीक्षा दे सके. वैसे भी उन्होंने तो अपने आप को अग्नि को समर्पित कर दिया था सिर्फ इसलिए कि कोई राक्षस उनके शरीर को छू भी ना सके.

कल्पना करके देखना. यह कायरता नहीं है, ना ही मूर्खता है. यह प्रतिशोध है, युद्ध का एक अंतिम प्रहारक और अचूक शस्त्र, कि अगर हम जीत नहीं पाएंगे तो शत्रु को भी जीतने नहीं देंगे. क्योंकि कुछ लोग कभी हारते नहीं.

और हम हिन्दुस्तानी उसी वीर पद्मावती के वंश के हैं. जिन्होंने किसी भी कीमत पर अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया. हाँ, जो खिलजी के वंश के हैं या उसके सामने नतमस्तक होते रहे हैं, वो कला के नाम पर हो सकता फिल्म पद्मावती को देखने चले जाएँ. मगर वहाँ भी उन्हें नकली पद्मावती ही मिलेगी. क्योंकि असली, कभी खिलजी जैसों के सामने ना कभी आई है ना कभी आएगी.

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