धूमिल न होने दीजिये राजस्थान का गौरव

बड़ी कोफ़्त होती है जब रात का स्पेशल स्लॉट किसी विवादित मुद्दे पर भेंट चढ़ाना पड़ता है.

रात का समय अमूमन ज्ञानवर्धक, मनोरंजक लेख के लिए तय है.

पद्मावती को लेकर ताज़ा अपडेट ये है कि राजस्थान के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने फिल्म से जुड़े मुद्दों के लिए एक कमेटी गठित करने के विकल्प पर चर्चा करने का आश्वासन दिया है.

और इस कमेटी में सिर्फ इतिहासकारों को शामिल किये जाने की ‘संभावना’ है.

ध्यान दीजियेगा कितना मज़ेदार बयान है.

कमेटी गठित करना उनके लिए अभी एक विकल्प है और विकल्प पर भी चर्चा होगी.

गजब है राजस्थान के गृह मंत्री.

अब मैं आपको कुछ साल पीछे लिए चल रहा हूँ, फ्लैशबैक में.

10 मार्च 1995 को मणि रत्नम की फिल्म ‘बॉम्बे’ प्रदर्शित होने जा रही थी.

इस फिल्म की पृष्ठभूमि में बाबरी मस्जिद का घटनाक्रम था, हिन्दू-मुस्लिम दंगे थे और हिन्दू लड़के व मुस्लिम लड़की की प्रेम कहानी थी.

फिल्म के विषय को लेकर मुस्लिम समुदाय की ओर से तीखी प्रतिक्रिया हुई. फिल्म की रिलीज मुश्किल में आ गई.

मणिरत्नम ने ये फिल्म बड़ी दिलेरी से बनाई थी और वे भी पीछे हटने को तैयार नहीं थे. देशभर में इस फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन किये गए. अंततः सभी शहरों में जहाँ ये फिल्म रिलीज होनी थी, एक कमेटी बनाई गई.

कमेटी में शहरी प्रशासन और मुस्लिम नेताओं को पहले फिल्म दिखाई जाती. कोई आपत्ति न होने पर ही फिल्म अन्य दर्शक देख सकते थे.

कई मुस्लिम नेताओं ने फिल्म को मुस्लिमों को अपमानित करने वाला बताकर पहले ही माहौल बिगाड़ दिया था. शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने भी फिल्म में कुछ कट लगाने की मांग की थी.

बॉम्बे को लेकर सरकारें बहुत सतर्क थी ये आपने ऊपर पढ़कर जान ही लिया होगा. इस विरोध से फिल्म को कुछ फर्क नहीं पड़ा.

ये उस साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म साबित हुई थी. ऐसे ही विरोध ‘विश्वरूपम, ‘दिल से’ के एक गाने, ‘हम’ फिल्म के जुम्मा-चुम्मा गीत को लेकर हुए थे और सरकारों ने गंभीरता से इन मामलों को निपटाया था.

पद्मावती को लेकर राजस्थान सरकार का लचर रुख आपने उनके गृहमंत्री के बयान में देख ही लिया होगा. अहंकार इतना कि कमेटी में इतिहासकारों को शामिल कर सकते हैं लेकिन राजपूत समाज को शामिल नहीं करेंगे.

ये गोलमाल है या झालमेल, समझ नहीं आ रहा. दही-हांडी स्पेशलिस्ट सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत फिल्म का विरोध करने वाली याचिका ही खारिज कर डाली. किस आधार पर की, ये पूछने का हक़ तो किसी को नहीं है.

उधर सूचना और प्रसारण मंत्री ने भंसाली को फिल्म रिलीज करने में कोई बाधा न आने का आश्वासन दे दिया है. देश का गृहमंत्री खुद इस फिल्म को लेकर अनिच्छा जता रहे हैं लेकिन राजस्थान के रजवाड़े मंत्री को देश के गृहमंत्री के बयान से कोई सरोकार ही नहीं है.

आप सोचिये बॉम्बे फिल्म की काल्पनिक कहानी के काल्पनिक किरदारों को लेकर हुए विरोध के बाद शहर-शहर कमेटियां बनाई गई. सहमति से फिल्म प्रदर्शन के बाद भी रिलीज वाले दिन फिल्म निर्देशक मणिरत्नम के घर के बाहर बम फेंका जाता है.

इस देश के एक समुदाय को कभी संतुष्ट नहीं किया जा सकता.

और एक तरफ पद्मावती का मामला है. पद्मावती तो राजस्थान में पूजी जाती है, गांव-गांव उनके मंदिर बने हुए हैं.

एक देवी तुल्य रणसती के लिए न्यायालय का विक्षोभ भरा रवैया समझ आता है लेकिन राष्ट्रवादी सरकार इसे टालने का प्रयास करेगी तो अपयश मिलेगा ये निश्चित बात है.

राजपूत यही मांग रहे हैं कि उन्हें कमेटी में शामिल किया जाए. आपने पद्मावती और खिलजी के बीच प्रेम-प्रसंग न दिखाने की बात कही, जो हमने मानी. लेकिन इस पर संतुष्टि नहीं है.

घूमर वाला गीत अविलम्ब हटाया जाए. खिलजी का बेवजह महिमामंडन न किया जाए. पद्मावती की छवि आहत न की जाए. इन बातों पर संतुष्ट तभी हो सकते हैं जब आप राजपूत समाज को कमेटी में शामिल करो.

जब इस देश में फिल्मों से अन्य धर्मों की भावनाएं आहत हो सकती हैं तो फिर हिन्दू फ़ालतू नहीं बैठा है. मित्रों हर एक वॉल से ‘पद्मावती’ फिल्म के खिलाफ एक बड़ा शोर उठना ही चाहिए.

यदि मांगे मानी जाए तभी फिल्म देखी जाए अन्यथा बहिष्कार किया जाए. राष्ट्रवादी सरकार को यहाँ तो संज्ञान लेना ही होगा.

ये मामला राजस्थान में पूजी जाने वाली एक देवी की छवि से जुड़ा है. यदि यहाँ न बोले तो लोकप्रियता कम होगी, निश्चित बात है.

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