गुजरात : इस चुनाव में वोटबैंक नहीं है मुसलमान

गुजरात में हो रहे विधानसभा चुनाव पिछले कुछ दशकों से सबसे अलग प्रकार के चुनाव हैं.

यह एक ऐसा चुनाव है जिसके केंद्र में मुसलमान नहीं नज़र आ रहे.

पिछले कुछ दशकों के लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों की परिपाटी को देखा जाय तो उनमें मुसलमान भी एक महत्वपूर्ण भूमिका में नज़र आते हैं.

आज़ादी के बाद से ही राजनीति की ऐसी बयार चली कि मुसलमानों को वोटबैंक मान के उनके इर्द-गिर्द ही चुनावी बिसातें बिछाई जाने लगीं.

लेकिन गुजरात के इस विधान सभा के चुनाव इस परिपाटी से अलग नज़र आते हैं.

गुजरात और मुसलमान दोनों का एक साथ जिक्र किया जाय तो गोधरा बरबस ही मुद्दे के रुप में सामने आ जाता है.

लगभग वही समय था जब मोदी ने मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश किया था. बाकी इतिहास को दोबारा याद करने की ज़रुरत नहीं.

लेकिन उस दौर से आगे बढ़ते हुये देखा जाय तो गुजरात की समूची जनसंख्या का लगभग दस फीसदी के रुप में निवास करने वाली मुसलमानों की संख्या अन्य राज्यों की अपेक्षा कुछ अलग नज़र आती है.

वामपंथी तो इसे सिर्फ एक वाक्य में निपटा देंगे कि ‘गुजरात के मुसलमान डर कर जी रहे हैं.’ लेकिन अगर समूचे परिप्रेक्ष्य पर नज़र डाली जाय तो वास्तविकता ज़रुर कुछ अलग नज़र आयेगी.

मोदी के गुजरात की राजनीति में प्रवेश करने के काल को ही अगर आधार मान कर चला जाय तो 2002 में गुजरात में लगभग 200 शैक्षिक संस्थाएं ऐसी थीं जिनका प्रबंधन मुसलमानों के हाथ में था. आज 2017 में यह संख्या 800 को पार कर चुकी है.

शायद यही कारण है कि आज गुजरात के मुसलमानों की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से भी आगे 80% तक पंहुच चुका है. गुजरात का शायद ही कोई ऐसा ताल्लुका हो जहां मुसलमानों के स्कूल न हों.

सभी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित मदरसे भी हैं जहां कम्प्यूटर के माध्यम से गणित और विज्ञान सीखने की सुविधा उपलब्ध है. इसकी वजह से 2002 में मुसलमान बच्चों के स्कूल से ड्रॉप आउट होने की दर 40% से घटकर आज 2017 में दो प्रतिशत से भी नीचे आ गयी है.

गोधरा का असर कहा जाय या भाजपा के खिलाफ कुछ लोगों द्वारा किये जाने वाला दुष्प्रचार, सियासत और सत्ता में मुस्लिम भागेदारी अब भी बहुत कम है लेकिन समुदाय ने खुद पर तरस खाने के बजाय अपने पैरों पर दोबारा खड़ा होने का फैसला किया जिसके लिए शिक्षा को पहली प्राथमिकता दी.

इसका नतीजा यह है कि आज गुजरात के पढ़े-लिखे मुसलमान युवा किसी भी अन्य राज्य की अपेक्षा तेजी से विभिन्न क्षेत्रों में आगे आते नज़र आ रहे हैं.

राजनीति में भेड़चाल चलाने के लिये आवश्यक है कि अधिसंख्य जनसंख्या को शिक्षा से दूर रखा जाय. आज़ादी के बाद से ही सरकार की नीतियों और वोटबैंक की राजनीति के लिये मौलानाओं को हथियार बनाकर देश के मुसलमानों को शिक्षा से दूर रखा गया.

पिछले पच्चीस सालों में भाजपा ने गुजरात में इस परिपाटी को बदला और सभी के लिये शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध कराये.

मुस्लिम समाज साक्षर हुआ तो वह पिछड़ेपन के अन्य कारकों को मात देते हुये समाज की मुख्यधारा में शामिल हुआ और गुजरात में वोटबैंक की राजनीति को निष्प्रभावी बना दिया.

यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनावों में मुस्लिम बाहुल्य सीटों में से 70% पर भाजपा जीतने में कामयाब रही.

इस चुनाव में भी गुजरात का मुसलमान वोटबैंक नहीं है. इसीलिये चुनावी मुद्दों से वह एकदम से गायब है. क्योंकि उसे पता है कि जब भी यह समाज चुनावी मुद्दा बना, फिर सरकार बनने के बाद उसकी बेहतरी के सारे मुद्दे गायब हो जाते हैं.

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