दिल्ली चलो? ख़ाक दिल्ली चलो

प्रकृति संरचना करती है, अर्पण करती है, पालन करती है.

मनुष्य और प्राणियों को प्राणवायु, धन धान्य समर्पित करती है.

अपने लिए कुछ नहीं, सब दूसरों के लिए.

वृक्ष कबहु नहिं फल भखै नदी न संचय नीर।
परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर।।

साधु यानी आर्य – महाकुल कुलीन आर्य सभ्य सज्जन साधवः ये अमरकोश में साधु की पर्यायवाची है.

इसीलिए हमारे ऋषि मुनि वन में रहते थे. आज भी रहते हैं बहुत से साधु.

जिनको ईसाइयों ने आदिवासी कहना शुरू किया. और मीडिया और colonized भारतीय भी उनको अब इसी संज्ञा से पुकारते हैं.

गृहस्थों के लिए ग्राम्य जीवन सृजित किया गया. लेकिन प्रकृति के गोद में ही.

मनुष्य अपने आसपास से अनुभव जन्य ज्ञान प्राप्त करता है और उसी को जीने की कोशिश करता है.

तो प्रकृति के सानिध्य में मनुष्यों में – विद्या, तप, ज्ञान, दान, शील, गुण, धर्म विकसित होता है.

आज भी धनी लोग छुट्टी मनाने शहरी जीवन से ऊबकर प्रकृति के गोद में ही जाना पसंद करते है.

शायद इन्ही दैवीय गुणों की खोज में – पहाड़, समुद्र, जंगल, रिसोर्ट आदि आदि डेस्टिनेशन है इन शहरी लोगों के रिलैक्स होने के.

गांवों को विनष्ट कर शहरों का निर्माण बाहर से आये आक्रांताओ ने किया.

क्यों?

दूसरों की बुद्धि और श्रम से निर्मित धन धान्य लूटकर शहरों में गिरोह बनाकर रहने से ही उनकी सुरक्षा संभव थी.

शहर पर्शियन शब्द है जिसकी अंग्रेज़ी सिटी है.

नगर हिंदी संस्कृत शब्द है जिसकी अंग्रेज़ी टाउन है. तो शहर का कॉन्सेप्ट आक्रांताओं का कॉन्सेप्ट है.

अलेक्सेंडर डाओ (Alexander Dow) द्वारा संपादित हिस्ट्री ऑफ हिन्दोस्तान के अनुसार 1780 के आसपास भारत की 2 प्रतिशत जनसंख्या शहरी थी.

गज़ेटियर के अनुसार 1900 के आस पास भारत की 5 प्रतिशत जनसंख्या शहरी थी. आज कितनी है?

लेकिन प्रकृति का परित्याग करते ही और शहर में घुसते ही मनुष्य विकारों को, आसुरी प्रवृत्तियों को अपनाने लगता है – काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मत्सर आदि आदि.

प्राकृतिक प्रदूषण ही नहीं मानसिक प्रदूषण और विकृतियों का शिकार होने लगता है – सेल्फ सेंटर्ड कहते हैं अंग्रेज़ी में.

इसीलिए मनुष्य जब जब दिल्ली के जितना नजदीक होता जाएगा, वातावरण के साथ साथ उसका मानसिक प्रदूषण भी बढ़ता जाएगा.

दिल्ली चलो? ख़ाक दिल्ली चलो.

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