सुख को आगे रखने की प्रक्रिया का नाम है संसार

यूनान में पुरानी कथा है कि एक ज्योतिषी रात आकाश के तारों का अध्ययन करता हुआ चल रहा था, एक कुएं में गिर पड़ा. चिल्लाया, घबड़ाया.

पास कोई किसान बूढ़ी औरत ने दौड़ कर रात में इंतजाम किया, लालटेन लाई, रस्सी लाई, उसे निकाला.

वह बड़ा प्रसिद्ध ज्योतिषी था. उसकी फीस भी बहुत बड़ी थी. सम्राटों का ज्योतिषी था. साधारण आदमी तो उसके पास पहुंच नहीं सकते थे.

उसने कहा: बूढ़ी मां, तुझे पता है मैं कौन हूं? तेरा सौभाग्य है कि तूने यूनान के सबसे बड़े ज्योतिषी को सहायता देकर कुएं से बाहर निकाला है.

ज्योतिषी ने कहा, मेरी फीस इतनी है कि सिर्फ सम्राट चुका सकते हैं. मगर तेरा हाथ और तेरा भविष्य मैं बिना फीस के देख दूंगा. तू सुबह आ जाना.

वह बूढ़ी हंसने लगी. उसने कहा: बेटा, तुझे अपने सामने का कुआं नहीं दिखाई पड़ता, तू मेरा भविष्य कैसे देखेगा? तुझे अपना ही… भविष्य तो छोड़, वर्तमान भी दिखाई नहीं पड़ता. तू पहले रास्ते पर चलना सीख. तू चांद-तारों पर चलता है!

जिसकी आंखें चांद-तारों पर लगी हैं, अक्सर हो जाता है कुएं में गिरना. तुम सब भी ऐसे कुएं में ही गिरे हो. आंखें चांद-तारों पर लगी हैं, यहां देखो तो कैसे देखो! पास देखे तो कौन देखे! तुम्हारे सारे प्राण तो वहां अटके हैं.

और बचपन से ही यह दौड़ शुरू हो जाती है. तुम्हारे चारों तरफ जो लोग हैं, वे सब पागल हैं. वही पागलपन छोटे बच्चों के प्राणों में भी हम डाल देते हैं.

छोटा बच्चा सोचता है: बस परीक्षा पास हो जाऊंगा, तो बड़ा सुख होगा. परीक्षा अभी साल भर दूर है, अभी तो दुख उठा रहा है; आशा है कि परीक्षा पास होगा तो सुखी होगा.

फिर पहली कक्षा पास हो जाता है; एकाध-दो दिन फूला—फूला सा रहता है, फिर पिचक जाता है. फिर सोचता है: इस साल तो वह बात नहीं घटी, शायद अगले साल घटे; शायद प्राइमरी स्कूल से निकल आऊं, तब सुख हो.

और चारों तरफ लोग हैं कहने वाले. वे कहते हैं: फिकर मत करो, एक दफा पास हो गए, स्कूल से निकल आए तो सुख ही सुख है.

फिर कालेज से निकल आए तो सुख ही सुख है. फिर विश्वविद्यालय से निकल आए तो सुख ही सुख है. फिर शादी हो गई तो सुख ही सुख है. फिर बच्चे हो गए तो सुख ही सुख है.

सुख कभी होता नहीं. बस लोग आगे सरकाए जाते हैं. वे कहते हैं: जरा और चले चलो.

सुख ऐसा ही है… जैसा बुद्ध एक बार यात्रा करते थे. राह भटक गए. जंगल था. एक लकड़हारे से पूछा कि गांव कितनी दूर है?

उसने कहा: बस पहुंचे जाते हो, दो मील समझो.

दो मील गुजर गए, गांव का कोई पता नहीं. फिर एक घसियारिन से पूछा कि मां, कितनी दूर होगा गांव?

उसने कहा: यही कोई दो मील.

दो मील फिर निकल गए, लेकिन गांव का कोई पता नहीं. एक लकड़हारे से पूछा कि भाई गांव कितनी दूर होगा?

उसने कहा: यही कोई दो मील.

आनंद से न रहा गया. बुद्ध का शिष्य था.

उसने कहा कि भगवान, इन लोगों को कुछ होश है? पहला आदमी भी बोला दो मील, दूसरा भी बोला दो मील, यह तीसरा भी बोल रहा है. छह मील तो हम चल ही चुके.

बुद्ध ने कहा: तू यही गनीमत समझ कि फासला बढ़ नहीं रहा है; दो मील का दो मील ही है. तीन भी हो सकता था, चार भी हो सकता था, छह भी हो सकता था. फिर सोच. ये भले लोग हैं.

ऐसी ही जिंदगी है. इतनी ही गनीमत है कि तुम्हारा और तुम्हारे सुख का फासला उतना ही रहता है जितना पहले दिन था.

अंतिम दिन भी उतना ही रहता है – दो मील. बढ़ता नहीं, यही काफी गनीमत है. मगर सुख कभी मिलता नहीं.

फिर आदमी जब बिलकुल थक जाता है तो सोचता है: मृत्यु के बाद स्वर्ग में मिलेगा, परलोक में मिलेगा. अगले जनम में मिलेगा; इस जनम में शुभ कर्म कर लिए, अब अगले जनम में सुख मिलेगा.

तुम मूढ़ता छोड़ोगे या नहीं छोड़ोगे? तुम अपनी मूढ़ता को फैलाए ही चले जाते हो. जीवन बीत जाता है, तो तुम मौत के पार रख लेते हो सुख को. मगर सदा आगे!

अब यहां जगह भी नहीं है रखने की; आदमी मर रहा है, खाट पर पड़ा है, अब यहां कह भी नहीं सकता कि कल सुख मिलेगा, क्योंकि कल तो यहां होने वाला नहीं.

आज का सूरज आखिरी सूरज है, कल सुबह नहीं उगेगा. तो वह कहता है: अगले जनम में मिलेगा. मगर मिलेगा जरूर! लेकर रहूंगा! इधर चूक गए, कोई हर्जा नहीं; कब तक चूकेंगे? कभी तो मिलेगा!

इस तरह आदमी अपने सुख को आगे रखता जाता है.

संसार यह नहीं है जो तुम्हें दिखाई पड़ रहा है फैला हुआ.

सुख को आगे रखने की प्रक्रिया का नाम – संसार.

ओशो : पद घुंघरू बांध – (प्रवचन–12)

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