सबसे अच्छी मौन की भाषा -2 : कुण्डलिनी जागरण और स्वप्न प्रयोग

स्वामी ध्यान विनय अक्सर कहते हैं, जब यह अनुभव में आने लगे कि परिस्थितियाँ स्वत: निर्मित नहीं हो रही, निर्मित करवाई जा रही है. तब मन में जो भी प्रतिक्रिया उभरती हो उसे बाहर निकालकर ऊर्जा का क्षय मत कीजिये. उसे पूरे साक्षी भाव से देखते हुए अन्दर डुबकी लगाइए.

यह कहने में कोई शर्म नहीं कि मुझे समझ ही नहीं आता था यह अन्दर डुबकी लगाना क्या होता है. ध्यान में बैठो तब भी वही बातें विचलित करती थीं जिसके लिए परिस्थितयां निर्मित की गयी है.

कभी कभी न चाहते हुए भी प्रतिक्रया स्वरूप कोई न कोई चीज़ बाहर निकल ही आती थी. लेकिन पिछले कुछ महीनों के अनुभवों और जीवन पुनर्जन्म की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद धीरे धीरे अन्दर डुबकी लगाना सीख रही थी.

मेरे लिए थोड़ा कठिन था यह… पहले किनारों से लौट आती थी, उस अथाह समंदर में खुद को खो देने का साहस नहीं जुटा पाती थी. लेकिन एक बार जिसने उसकी झलक पा ली फिर उसके लिए अन्दर बाहर सब समान ही रहता है.

एक ऐसी ही झलक कल शाम को पाई. सारी विपरीत परिस्थितियों में भी ऊर्जा को किसी भी स्वरूप में बाहर निकालकर उसका क्षय न होने देना क्या होता है, वह कल जाना.

मौन का अवतरित होना क्या होता है कल जाना.

मौन का अर्थ ऐसा नहीं कि आप किसी से बात नहीं कर रहे, या किसी की बात का जवाब नहीं दे रहे, या संसार से भागकर कहीं जंगल में छुप गए…. नहीं इसी संसार में रहकर, सबसे बात करते हुए… आत्मिक धैर्य और मानसिक मौन का वास्तविक अर्थ जाना.

हमेशा की तरह भावभूमि स्वामी ध्यान विनय की निर्मित की गयी होती है. कारण चाहे जो हो, मैं उनसे साझा करूं या ना करूं उन्हें सब पता होता है. ऐसी मेरी आस्था है. ऐसा कौन गुरु होगा जो शिष्य के मन की बात न जानता हो.

मेरी यात्रा हमेशा से प्रेम, पीड़ा, प्रतीक्षा और परमात्मा के इर्द गिर्द रही है. कल शाम भी वही थी… कल पहली बार प्रेम, पीड़ा और प्रतीक्षा को परमात्मा के चरणों में पूरी तरह अर्पित कर मैं उतर गयी मौन के अथाह समंदर में.

और फिर शुरू हुए प्रयोग… स्वप्न अक्सर याद नहीं रहते, लेकिन कुछ दृश्य स्वप्न जगत के माध्यम से आते हैं. वो वास्तव में स्वप्न नहीं होते लेकिन आप उसे स्वप्न रूप में ही देख पाते हैं. ये कुछ ऐसा ही है जैसे ईश्वर है तो निराकार लेकिन जब उसे प्रकट होना होता है तो उसी रूप में होगा जहां तक आपकी दृष्टि के अनुभव है.

तो कल रात न जाने किन पर्वत और कंदराओं और घाटियों में घूमती रही… और हर घाटी से गुज़रते हुए यह एहसास था कि मैं काली घाटी ढूंढ रही हूँ. जब काली घाटी पहुँचती हूँ तो माँ काली दर्शन देती है. एक बहुत जाना पहचाना सा काली का मंदिर, वातावरण धुंधलके से भरा…

मेरी उम्र कुछ छः – सात साल है , मैं किसी महिला के साथ हूँ जो मेरी माँ है लेकिन उस महिला का चेहरा हर दृश्य के साथ बदलता रहा… कुछ ऐसी महिलाओं के चेहरे में जिनको मैंने अक्सर माँ सदृश्य देखा….

मैं काली के मंदिर में जाकर अपना माथा टेककर उन्हें प्रणाम करने लगती हूँ… तभी वहां कोई मेरी रीढ़ की हड्डी के अंतिम बिंदु पर लोहे की चीज़ से धीरे धीरे प्रहार करता है. मैं भयंकर पीड़ा से गुजरती हूँ… लेकिन उसके प्रहार नहीं रुकते… जब पीड़ा असहनीय हो जाती है तो मैं ही उठकर कहती हूँ आज के लिए इतना काफी है…

प्रहार रुक जाते हैं… आँख अचानक खुलती है… और जागने पर अनुभव होता है जिस जगह प्रहार हो रहे थे उस में अभी भी बहुत पीड़ा है…

एक ऐसा ही अनुभव पिछले वर्ष भी हुआ था… ऐसी ही किसी भावभूमि से गुज़र कर जब नींद में प्रवेश किया तो मेरे दोनों भौहों के बीच किसी ने बहुत पैनी वस्तु गढ़ा दी थी… और मैं असहनीय पीड़ा से गुज़री थी… आँख खुलने पर माथे को छुआ तो उस स्थान पर तब भी पीड़ा हो रही थी.

मैं नहीं जानती मूलाधार चक्र का खुलना क्या होता है, कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया क्या होती है… लेकिन इस बात का अनुभव हमेशा से रहा है.. कि मुझ पर प्रयोग हमेशा स्वप्न जगत में ही होते हैं.. जब शरीर बाह्य जगत से नाता तोड़ देता है… जाग्रत अवस्था में कदाचित मैं बहुत सांसारिक हो जाती हूँ… तभी अक्सर स्वामी ध्यान विनय कहते हैं मुझसे… “अभी बहुत संसार बाकी है आप में”.

जब तक जीवन है संसार तो रहेगा ही… लेकिन इस संसार में रहते हुए भी जब आप इस संसार के नहीं होते तब यह बात कहने का दुस्साहस कर पाते हैं कि मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की

कुण्डलिनी जागरण के सबके अपने अपने अनुभव होते हैं. मेरे अनुभव स्वप्न जगत के हैं. लेकिन कुछ दिन से एक वीडियो बार बार मेरे सामने लाया जा रहा है.. और उसे भी मैं संकेत रूप में ही ले रही थी.. कि क्यों बार बार यह वीडियो अलग अलग लोगों द्वारा मुझ तक पहुँचाया जा रहा है.

इस वीडियो को अवश्य देखिये…. सबके अपने अपने अनुभव होते हैं कुण्डलिनी जागरण के … मुझे तो अब भी कुछ नहीं आता यह कहने में कोई झिझक नहीं… बस जो अनुभव होते हैं साझा करती रहती हूँ… लेकिन संदीप महेश्वरी का यह वीडियो आप अवश्य देखिये. उन्होंने अपनी कुण्डलिनी जागरण का बहुत सुन्दर विवरण दिया है.

आध्यात्मिक यात्रियों को उनके मार्ग पर बने रहने के लिए मेरे ये कुछ शब्द काम आये तो लिखना सार्थक हुआ समझूँगी… वरना तो इस सार्वभौमिक सत्य को स्वीकार कीजिये कि सबसे अच्छी मौन की भाषा.

सबसे अच्छी मौन की भाषा

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