Strasburg : पराई धरती पर अपने रिश्ते

कुछ समय कार्यालय के कामकाज के कारण काफी व्यस्तता रही. मुझे लगभग बारह दिन के लिए वियना (ऑस्ट्रिया) ब्रातिस्लावा (स्लोवाकिया), Strasburg (फ्रांस), रोम और पालेर्मो (इटली) जाना पड़ा. वापस लौटने के बाद यात्रा एवं लंबित कार्यो को निपटाने में समय निकला.

Strasburg मेरे लिए स्पेशल है. जब मैं सितम्बर 2002 में फ्रांस सपरिवार गया तो पेरिस में 2 दिन कागजी कार्रवाई के बाद हमारा बैच Strasburg पंहुचा. मन में थोड़ी सी चिड़चिड़ाहट भी थी कि Ecole nationale d’administration (राष्ट्रीय प्रशानिक विद्यालय) या ENA की पढ़ाई पेरिस में क्यों नहीं थी.

बहरहाल Strasburg मेरी आशा के विपरीत बेहद सुंदर एवं लुभावना शहर निकला. ENA का कैंपस शहर के ऐतहासिक केंद्र में था जिसे पेतित फ्रांस (Petite France), या लघु फ्रांस कहते है, जो चारो तरफ नहर से घिरा हुआ है.

पेतित फ्रांस में अधिकतर घर और भवन 400-500 साल पुराने है और आंशिक रूप से लकड़ी (half-timbered houses) के बने हुए है. सितंबर के महीने में उन घरो की खिड़किया जिरेनियम के लाल फूल के गमलो से दमकते रहते थे.

मैं तो चला जाता था ENA में पढ़ाई करने के लिए. मेरा बेटा उस समय 4 वर्ष का था. घर के नजदीक एक फ्रेंच स्कूल में उसका एडमिशन बिना एक यूरो दिए सिर्फ उसका बर्थ सर्टिफिकेट और निवास का पता देखकर हो गया था.

स्कूल में 2 घंटे का लंच ब्रेक होता था और चार बजे समाप्त हो जाता था और बुधवार को छुट्टी होती थी.

स्कूल के बाद और बुधवार को पत्नी बेटे को कुछ खिला पिला कर पेतित फ़्रांस में एना के पास एक पार्क में खिलाने के लिए ले जाती थी.

उस पार्क में बहुत ही नई डिजाइन के झूले थे, बालू के गड्ढे तथा कई तरह की बाधाएं बनी थी जिसमें बच्चे खेलते कूदते थे. बेटा उस पार्क के गेट को देखते ही भागता था और अपने पसंद के झूले में बैठकर खेलने लगता था.

अगर सांय को कोई क्लास नहीं हुई तो मैं भी पार्क में चला जाता था और पेतित फ़्रांस की संकरी, छोटे-छोटे पत्थरों की बनी गलियों से होते हुए तरह-तरह के शोरूम और बेकरी के सामने से निकल के घर आ जाते थे.

मेरा एक छोटा सा फ्लैट था जिसका मकान मालिक एक 60 वर्षीय अविवाहित फ्रेंच था जिसका नाम बेर्ना (Bernard) था. बेर्ना पेशे से किसान था. वह कई तरह के फल एवं सब्जियां उगाता था. तथा वाइन बनाने के लिए उसके पास अंगूर का छोटा सा खेत भी था.

वह अपनी मां के साथ रहता था जो उस समय 90 वर्ष की थी. बहुत ही जल्द उससे हमारी मित्रता हो गई. उस समय वह कोई सेल फ़ोन नहीं रखता था. वह अक्सर खेत में काम करने के बाद बिना किसी सूचना के रात्रि को हमारे घर मिटटी में सने हाथ और जूते में आ जाता था. साथ में कुछ ताजे फल और सब्ज़ियाँ.

फिर शुरू होती थी बेर्ना की कुकिंग. टमाटर का सूप, Strasburg में बनने वाला पास्ता – स्पैटज़ल (spaetzle) तथा कभी-कभी चेरी या एप्पल पाई. कुछ अवसरों पर वह हमें कार में ले जाता और एक बेकरी से कुछ ब्रेड और ओलिव खरीद के उसे घर में वाइन या बियर के साथ खाते थे. कभी-कभी वह अपनी मां के साथ हमारे घर आता था.

एक मग बियर के बाद जब अगली बियर लेता तो उसकी मां उसे घूर कर सिर्फ यह कहती कि “बेर्ना…!” और बेर्ना कहता “ओह, मोमा… अभी तो सिर्फ एक ही पी है.” उसे एक बात का अफसोस हमेशा रहता था कि हम लोग शाकाहारी थे और वह मीट के व्यंजन नहीं बना सकता था.

समय समय पे वह हमें 40 किलोमीटर दूर अपने पुश्तैनी गांव ले जाता था जहां उसका बड़ा भाई सपरिवार रहता था. वहां घर के बाहर मिटटी के तन्दूर में लकड़ी जलाकर वह और उसका भाई tarte flambee – जो एक आलसासीएन (Alsatian) पिज़्ज़ा है – बनाता था और एक पेड़ के नीचे चार घंटे का लंच उसकी माँ और परिवार के साथ कई पकवानो और वाइन के साथ होता था.

कई बार शनिवार या रविवार को हम उसके साथ आसपास के दर्शनीय स्थलों को देखने जाया करते थे. एक तरह से हम बेर्ना के परिवार का हिस्सा हो गए थे. 31 जुलाई 2003 को Strasburg में हमारी आखरी रात थी और अगले दिन पेरिस अध्ययन के लिए जाना था.

बेर्ना हमारे घर अपनी मां के साथ आया. उसकी 90 वर्षीय मां सीढ़ी चढ़ कर पहली मंजिल के हमारे फ्लैट में आई और उन्होंने अपने हाथ से बनाई हुई एप्पल पाई हमें गिफ्ट में दी. साथ में केक बनाने का पुश्तैनी मिटटी का बना कुगेलहॉफ (kugelhopf) साँचा जो कई सौ वर्ष पुराना था.

मेरी पत्नी ने बेर्ना से केक बनाना सीखा था और आज भी हम उस पुश्तैनी सांचे को बेटे के बर्थडे के दिन निकालते हैं और उसके लिए केक उसी सांचे में बनाई जाती है.

सन 2008 में फ्रांस घूमने गए. Strasburg बेर्ना से मिलने के लिए गए और बेर्ना के भाई के द्वारा बेर्ना से संपर्क किया.

बेर्ना हमें स्टेशन पर लेने आया और अपने गांव ले गया. लेकिन सबसे पहले गांव की सिमेट्री या कब्रिस्तान ले गया जहाँ उसकी माँ 93 वर्ष की आयु में निधन के बाद चिर निंद्रा में थी.

बेर्ना ने बताया कि जब हम पेरिस और उसके बाद भारत से उसके घर फोन करते थे, तो उसकी मां फोन उठाती थी. उसने कहा कि मेरी छोटी-मोटी बात से उसकी मां को कितनी प्रसन्नता होती थी, वह नहीं बता सकता.

इस बार Strasburg जाने के पहले मैंने बेर्ना से संपर्क किया और उससे मुलाकात की. उसके साथ दो रात्रि भोजन किया, जम कर गप-शप की और उसके साथ Strasburg की सैर की.

इसलिए Strasburg मेरे लिए स्पेशल है.

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