अप्प दीपो भव : संसार के बिना शांति दो कौड़ी की है?

चूंकि अस्तित्व का केवल एक ही स्वभाव है सौंदर्य इसलिये यहाँ जो कुछ पैदा होगा वह सौंदर्य से मुक्त नहीं होगा. आप संसार की चाहे ज़ितनी भी बुराई कर लो भय और स्वार्थ इस जगत को भलिभांती संभाल लेगा क्योंकि वह भी इस जगत के सौंदर्य का हिस्सा है संसार के बिना शांति दौ कौड़ी की है – Shailender Singh

प्रिय शैलेन्द्र सिंह

प्रेम प्रणाम

अस्तित्व केवल शून्यता है.

निर्विकार, निराकार, सदा वर्तमान है.

इसी शून्यता से प्रकृति का जन्म होता है और इसी में प्रकृति विलीन होती है.

यह क्रम सतत पल पल चलता रहता है.

सत्यम शिवम् सुन्दरम का उद्घोष कर के भारत के ऋषियों ने इसे बोधगम्य बनाने की कोशिश की है.

जिसका वर्णन नहीं हो सकता जो शब्दों में नहीं कहा जा सकता है उसे संक्षिप्त में सत्यम शिवम् सुन्दरम के एक ही सूत्र में कह कर वे मौन में डूब कर इसीमें लीन हो गये.

यह शून्य से जन्मी प्रकृति अद्भुत है रहस्यमयी है अनंत अनंत रूपों में रंगों में इसका सौन्दर्य सतत बिखर रहा है सौन्दर्य इसके वस्त्र हैं इसका लिबास है. यह सुंदरता की दैवी है इसके सौन्दर्य का बखान शब्दों में करना संभव नहीं.

सूरज चाँद सितारे और पृथ्वी के कण कण से पात पात और फूल फूल से सुन्दरता छलक रही है. अनगिनत पेड़ों, पौधों, नदियों, पर्वत मालाओं, खेतों, खलिहानों, जंगलों और रेगिस्तानों को स्वयं में समेटे हुए यह पृथ्वी सूरज की आराधना करते हुए अपने नृत्य में लीन है.

पल भर को इसके क़दम नहीं रुकते सागर की उतुंग लहरें दौड़ दौड़ कर कहीं चट्टानों से टकरा रही हैं तो कहीं रेतीले किनारों को चूम कर मद मस्त हो कर उछल उछल कर गीत गा रही है.

कहीं नदियाँ सागर से मिलने के लिए कल कल करती सतत बहती जा रही है. फूल, फल, पशु पँछी, मोर, पपीहे की पीहु पीहु, कौओं की काँव काँव और कोयल की कुहू कुहू में पेड़ों की शाखाओं से सर सर करती हवाओं में अदभुत संगीत है.

मनुष्य या कोई ऐसा प्राणी नहीं जिससे सौन्दर्य नहीं झलकता हो. मनुष्यों द्वारा निर्मित वस्तुओं में भी ग़ज़ब का सौन्दर्य है. सारी दुनिया में जितनी कलाएँ हैं सभी में सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है.

मनुष्यों द्वारा निर्मित संगीत, काव्य, साहित्य, मूर्तिकला, चित्रकला कोई जगह ऐसी नहीं है जहाँ सौन्दर्य का वास न हो इसके बावजूद भी अधिकतर मनुष्यों में सौन्दर्य का बोध नहीं है.

इस सत्य को हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा. जिस व्यक्ति में भी सौन्दर्य बोध होगा उसे हिंसा करना मुश्किल हो जायेगा. प्रेम और अहिंसा सौन्दर्य की छाया है और सत्य अप्रकट है अदृश्य है.

सौन्दर्य अतिशय रूप से स्वयं को हजारों रूप रस गंध और स्पर्श के द्वारा मोहित करता है आकर्षित करता है. हम एक फूल को या रंगबिरंगे पँछी को या तितली को या सवेरे उगते हुए सूरज को और आकाश में फैलती हुई सतरंगी प्रकाश की किरणों को देखकर अवाक् से रह जाते हैं और पल दो पल में पूरा आसमान रंगों से भर जाता है.

फिर वही सूरज की किरणें नदियों पर कल कल करती चंचल लहरों को छूती है और हमारी आँख में उसके लशकारे पड़ते हैं. इसी तरह पल पल दिन रात सतत सौन्दर्य अपने नये नये रूपों में हमारा मन मोह लेता है.

सच ही में सुन्दरता शून्यता की सबसे अधिक जीवंत क्षणजिवी और सुकोमल, नाज़ुक सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है.

हमारी मुट्ठीयों की पकड़ में नहीं आ सकता है सौन्दर्य. मैं लाख शब्दों में सौन्दर्य की परिभाषा करूँ लेकिन यह दिल ही जानता है कि यह कार्य असंभव है सौन्दर्य की परिभाषा शब्दों में हो ही नहीं सकती इसिलिए किसी शायर ने एक गीत में कहा है!

तुझ को देखा है मेरी नज़रों ने
तेरी तारीफ हो मगर कैसे
के बने ये नज़र ज़ुबाँ कैसे
के बने ये ज़ुबाँ नज़र कैसे?
न ज़ुबाँ को दिखाई देता है
न निगाहों से बात होती है
ज़िक्र होता है जब क़यामत का
तेरे जलवों की बात होती है!

कवि, शायर, चित्रकार, संगीतकार हर प्रकार के सृजन में लीन व्यक्ति में बड़ी संवेदनशीलता होती है. व्यक्ति जितना अधिक संवेदनशील होगा वह उतना ही प्रेमपूर्ण, अहिंसक, और करुणावान होगा उसे हर जगह सुंदरता के पीछे शून्यता का एहसास होगा.

वह किसी खिलते हुए फूल को देख कर उसके सौन्दर्य से इतना अभिभूत हो सकता है कि खुशी के मारे उसकी आँखों से प्रेम के आँसू छलकने लग जायें. इसलिए वह फूल को जी भर कर देख तो सकता है.

लेकिन उसे उस खिलते हुए फूल को छूना या तोड़ना ज़रा भी गँवारा नहीं होगा. वह अहोभाव से भर कर आश्चर्य चकित होकर उस फूल की सुगंध को महसूस करते हुए उसको झुक कर नमस्कार करेगा इसी दृश्य को किसी और शायर ने इस तरह बयान किया है!

चाँदनी रातों में इक इक फूल को
बेख़ुदी कहती है सज़दा कीजिये
वो कभी मिल जाये तो क्या कीजिये
रात दिन सूरत को देखा कीजिये!

हाँ जी ऐसा भी होता है फूलों को या चाँद सूरज को देखकर ही सज़दा करने को जी नहीं चाहता पर कभी कभी किसी प्रेमिका के अप्रतिम सौन्दर्य को देख कर भी वासना विलीन हो जाती है और हमारे भीतर उसके सौन्दर्य के प्रति समर्पित होने की घटना घटती है.

और जब एक दूसरे का हाथ हाथों में लिए हुए बातों ही बातों में जब मिलन की घड़ियाँ गुजर जाती है तो बाद में होश आता है कि यह क्या हुआ कि आँखों ही आँखों में हम एक दूसरे में ऐसे डूब गये कि ऐसा लगा जैसे यह रात घड़ी दो घड़ी में ही गुजर गई हो.

ऐसी भावदशा में समय बहुत जल्दी भागता हुआ सा लगता है और ऐसी ही अनुभूति बुद्ध पुरुष के सानिध्य में होती है. ओशो के श्री मुख से सुना जीसस का यह वचन मुझे याद आया है. किसी ने जीसस से पूछा कि व्हाट विल बी देयर इन युवर किंगडम आफ गाड? तो जीसस ने कहा देयर शैल टाइम नो लोंगर! आपके प्रभु के राज्य में क्या होगा? तो जीसस ने कहा वहाँ समय नहीं होगा.

बड़ा अजीब सा जवाब लगता है पर ऐसा सच में ही होता है. जब कोई गहन प्रेम में या ध्यान में होता है तो ऐसी अनहोनी घटनाएँ भी घटती है. इसीलिए ओशो कहते हैं कि समाधि की पहली झलक मनुष्य को पहली बार संभोग में मिली होगी.

लेकिन दुर्भाग्य से अब मनुष्य इतना विकृत हो चुका है और तथाकथित धर्मों ने विशेषकर इस्लाम की मान्यताओं ने स्त्रियों और पुरुषों के बीच के सौन्दर्य बोध के आकर्षण को ही समाप्त कर दिया है और उसकी जगह कामवासना की कुरूपता ने ले ली है.

इसी कारण मुसलमान पुरुष जीवन भर कामवासना से मुक्त नहीं हो सकते. अस्सी वर्ष के बूढ़े भी काम लोलुप होकर नाबालिग़ लड़कियों को खरीद कर विवाह के नाम पर उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं.

जिस समाज में भी स्त्रियों के शरीर को सिर से लेकर पाँव तक पूरा ढाँक कर रखा जायेगा वह समाज कामुकता के रोग से बहुत पीड़ित रहेगा और उस समाज से प्रेम हमेशा के लिए विदा हो जाये तो कोई आश्चर्य नहीं.

प्रेम का फूल बड़ा नाज़ुक होता है वह केवल स्वतंत्रता की भूमि में ही खिल सकता है उसे कोई दौलत से नहीं खरीद सकता न ही कोई उसे बेच सकता है. शरीर ख़रीदा और बेचा जा सकता है, इसलिए अरेंज मेरेज विवाह सामाजिक व्यवस्था है.

जीवन भर की आर्थिक सुरक्षा का उपाय है. और प्रेम असुरक्षा में खिलने वाला फूल है, प्रेम प्रकृति का दान है दो स्वतंत्र व्यक्तियों के बीच घटने वाली सुंदरतम जादुई आश्चर्य जनक घटना है.

लेकिन जब तक बचपन से ही स्त्री पुरुष के बीच का फ़ासला नहीं मिटेगा तब तक कामवासना की कुरूपता से जीवन भर छुटकारा नहीं हो सकता और फिर इस दमित चित्त दशा में ध्यान के फूल खिलना भी संभव नहीं है.

इस्लामिक देशों में तो स्त्रियों की आत्मा को ही नष्ट कर के उसे केवल बच्चे पैदा करने की मशीन बना दिया गया है. उसे संभोग के कामवासना के सुख से भी वंचित कर दिया गया है.

इस बात का अधिकतर ग़ैर मुस्लिम लोगों को पता ही नहीं है. छोटी उम्र की सात आठ वर्ष की बालिकाओं की योनि की ख़तना कर दी जाती है ताकि उसे जीवन भर संभोग में भी कुछ सुख मिलता है शरीर में भी कोई उमंग कोई उत्तेजना होती है इसका भी पता न चले.

बस एक मुर्दा लाश की तरह होती है जिसे केवल पुरुष जब चाहे अपनी हवस पूरा करने के लिए उपयोग कर सकता है. स्त्रियाँ भी तलाक़ के भय से इस कुप्रथा का विरोध नहीं कर सकती जरा भी इनकार किया कि पता नही तीन तलाक़ हो जाये, फिर किसी मौलवी के पास हलाला करवाने भी जाना पड़े.

ऐसा नहीं कि अशिक्षित जाहिल गँवार ग़रीब लोग ही इसका पालन करते हों. मीना कुमारी जैसी प्रसिद्ध अभिनेत्री को भी जब उसके पति कमाल अमरोही ने भी ग़ुस्से में तीन बार तलाक़ तलाक़ तलाक़ कह दिया तो फिर उसके बाद मीना कुमारी को भी किसी ग़ैर पुरुष के साथ जिसे वह प्यार नहीं करती उससे शारिरिक सम्बन्ध बनाना पड़ा और उसके बाद वह भीतर से बुरी तरह टूटकर निराश हो गई थी.

इस्लाम की इस तरह की धार्मिक कुरूपता के लिए युरोप में क़ानूनन पाबंदी है फिर भी लोग धोखे से अपनी नाबालिग़ लड़कियों को फुसलाकर इस घिनौनी प्रथा को अंजाम देते रहते हैं. और इसके बारे में अखबारों में ख़बरें छपती रहती है और चोरी छिपे स्त्रियों के प्रति यह जघन्य अपराध होता रहता है.

जिस व्यक्ति ने जीवन में प्रेम का स्वाद नहीं जाना उसके जीवन में ध्यान की संभावना भी बहुत कम होती है और इससे विपरीत भी ठीक है जिसने ध्यान का स्वाद नहीं जाना वह कामवासना को ही प्रेम समझने की ग़लतफ़हमी का शिकार रहता है.

फिर ऐसे व्यक्ति के लिए सत्य, अहिंसा, शांति ये सब शब्द केवल कोरे सिद्धांत होकर रह जाते हैं. फिर वह इन्हें लाख बुद्धि से समझने की कोशिश करे उसके अंतर्मन में इसकी कोई प्रतिभिज्ञा नहीं बन पाती और वह स्वयं के ही मूल स्वभाव से परिचित होने से वंचित रह जाता है.

शैलेंद्र जी, आपकी बात ठीक है कि संसार के बिना शांति दो कौड़ी की है. लेकिन जिसने इस मनुष्यों के संसार के सुख दुख झेले हैं केवल वही शांति की तलाश करने के लिए इधर उधर भटकता है.

किसी पशु पँछी को शांति की तलाश नहीं है क्योंकि वे इतने अशांत नहीं होते वे अधिकतर शरीर के तल पर ही जीते हैं. और केवल मनुष्य में ही यह संभावना है कि वह अपने शरीर से ऊपर उठ सके तथाकथित धर्मों के जाल में फँस कर लोग मरने के बाद किसी जन्नत की स्वर्ग की आशा में इस जीवन में जो उपलब्ध हो सकता है उससे वंचित रह जाते हैं.

आंख बंद कर लेने से, झुका लेने से क्या होगा? किसको धोखा दे रहे हो?

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