वरना मुफ्तखोरी और करचोरी की आदत से न व्यापारी निजात पाएगा, न ही ग्राहक

आप को यदि हर नुक्कड़ पर अमरूद के दो-दो ठेले नजर आए तो आप समझ जाओगे कि अमरुद का मौसम है.

और हर घर आधा-एक किलो अमरुद पड़े ही होंगे, क्यों कि सस्ते और अच्छे होते है, सेहत के लिए अच्छे होते है.

वैसे ही यदि पुरानी दिल्ली घूमते हुए आप को हर दूसरे खम्भे पर जीएसटी कंसल्टेंट का विज्ञापन टंगा मिले तो समझ लेना लगभग हर व्यापारी जीएसटी पंजीकृत है या होने के जुगाड़ में है.

कल चावड़ी बाजार के गलियों में मैंने यह पाया कि हर कोई जीएसटी को अपने कारोबार में शामिल करने के लिए बाध्य और उत्सुक, दोनों है.

लेकिन शायद संगणकीकरण की वजह से जीएसटी कई छोटे व्यापारियों में एक असहजता दिखाई दी. पुरानी दिल्ली का छोटे से छोटा व्यापारी कम्पोजीशन स्कीम के ऊपर कारोबार करता है.

और ये व्यापारी माल बेचते है, न कि सेवा देते है – कम्पोजीशन का सबसे बड़ा लाभग्राही तबका सेवा संस्थान है, जो माल बेचने के बजाए सेवाएं देते है.

अब मैंने कल दो जगह पक्का बिल माँगा. मैं पक्का बिल लेता तो हर कहीं से हूँ, लेकिन कई जगह दुकानदार साफ़ मना करता है – “हम 5-10 हजार के कम में बिल बनाते ही नहीं. झंझट बहुत है. लेना है तो लो!” – बेचारा ज़रूरतमंद ग्राहक मना नहीं कर पाता.

तो एक जगह बिल देने का कारण रहा मेरे पास नकद रकम का न होना – मैंने कार्ड से पैसे देने के बारे में कहा, तो उन्होंने 18% कर की बात की. मैंने कहा जोड़ दो.

उन्होंने अपने मुंशी के पास भेजा. उस ने पहले तो नाम पूछा, फिर पता पूछा, फिर फोन नंबर पूछा.

मैंने बोला “कैश में कर दो भाई, क्या दिक्कत है?” उसने दो-टूक कहा “कैश तो आप दे नहीं रहे. जो बिल कार्ड या ऑनलाइन भुगतान का बनता है, उस का बिल ज़रूर बनता है!”.

उस ने तीन बार मेरा जीएसटी नंबर पूछा. मेरे कहने पर कि मैं कंज्यूमर हूँ, उस ने दो बार अपने मालिक से पूछा कि क्या किया जाए. फिर बिल काटा, फिर पैसा काटा, और मुझे माल, गेटपास दे कर रवाना किया.

दूसरी जगह भी यही दिक्कत – वहां तो मैं नकद दे रहा था. पर नाम, पता, फोन इत्यादि पूछ कर उस हिसाब से बिल बनाने में देर जरूर लगती है.

पुरानी दिल्ली के बाजार में समय पैसा होता है. एक-दो लोगों के दूकान में बिल बनाने के लिए एक आदमी ख़ास रखने की गुंजाइश नहीं होती, और दुकानदार सौदे निबटाए या बिल काटे?

ऊपर से कहा गया कि भाई कुछ गलती छूट गई तो नोटिफिकेशन भेज-भेज कर नाक में दम कर देते है. इसलिए छोटे सौदे हम कैश में निबटाते है. उस के तो हम कच्चे बिल भी नहीं देते. बस पैसा दो, माल उठाओ, चलते बनो!

दूसरे एक इलेक्ट्रोनिक्स पुर्जों की दुकान में बोला गया कि चायना का माल तो अंडरइनवॉइस हो कर ही आता है, तो हमें सारे माल के पक्के बिल देने की ख़ास आवश्यकता नहीं बचती.

अब जानकार मित्र मुझे यह बताए कि जो बातें मैंने खुद व्यापारियों से सुनी, क्या वे सही है?

जो लोग माल के केवल आंशिक हिस्से के बिल बनाते है, और बाकी ऐसे ही हाथोंहाथ बेच देते है, उन का सब कुछ सही चलता है? तो फिर नए कर प्रणाली की तो आत्मा ही मर गई समझो!

केवल सारों के आधिकारिक सहभाग से ही जीएसटी सुचारू रूप से लागू नहीं होगा. इन खामियों को दूर करना पड़ेगा, और तब तक डंडा चलाते रहना पड़ेगा, वरना मुफ्तखोरी और करचोरी की आदत से न व्यापारी न ही ग्राहक निजात पाएगा!

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