जन्मदिवस विशेष : गलत सलाहकारों के चलते आज भाजपा में अप्रासंगिक आडवाणी

भारतीय जनता पार्टी के दिग्‍गज नेता लालकृष्‍ण आडवाणी का आज जन्‍मदिन है. वह आज 90 साल के हो गए.

जनसंघ से लेकर भाजपा तक के सफर में आडवाणी से ज़्यादा योगदान किसी का नहीं है.

भाजपा की दूसरी पीढ़ी यानी जो आज सरकार में बैठे हैं उसमें से 90 फ़ीसद से ज़्यादा लोग आडवाणी की देन माने जाते हैं.

इसके बावजूद केवल गलत सलाहकारों के चलते आडवाणी जी आज भाजपा में अप्रासंगिक हो गए है.

1984 में भाजपा की क़रारी हार के बाद उसे 1996 में सरकार बनाने तक पहुंचाने में आडवाणी के योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

राम मंदिर आंदोलन के दौरान देश में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय नेता होने और संघ परिवार का पूरा आशीर्वाद होने के बावजूद आडवाणी ने 1995 में वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार ऐलान करके सबको हैरानी में डाल दिया था.

उस वक़्त वे पीएम बन सकते थे लेकिन आडवाणी ने कहा कि भाजपा में वाजपेयी से बड़ा नेता कोई नहीं हैं.

पचास साल तक वे वाजपेयी के साथ नंबर दो बने रहे. लेकिन पार्टी पर उनका एकछत्र अधिकार बना रहा. लेकिन एक बड़ी गलती ने उनके पूरे राजनीतिक जीवन की मेहनत को अप्रासंगिक कर दिया.

2005 में 4 जून का दिन आडवाणी के राजनीतिक जीवन पर बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर गया.

उस दिन कराची में जिन्ना की मजार पर उनके भाषण को याद करते हुए आडवाणी ने कहा था कि जिन्ना सेक्यूलर पाकिस्तान चाहते थे.

जिन्ना के पक्ष में खड़े दिखते आडवाणी को लेकर पूरे देश मे हंगामा हो गया. संघ के सबसे चहेते नेता आडवाणी को बढ़ते विरोध के दबाव में इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

कुछ नेताओं ने उन्हें दिल्ली में अपना बयान बदलने की सलाह भी दी थी लेकिन आडवाणी जी अपने सलाहकार सुधींद्र कुलकर्णी के चलते अपनी बात पर अड़े रहे और जीवन की सबसे बडी गलती कर बैठे.

भाजपा के शिखर पुरुष आडवाणी का दुख अब शायद ही कोई समझ सकता है. वे पीएम इन वेटिंग का टैग लेकर घूमते रहे लेकिन पीएम की गद्दी पर मोदी बैठ गए.

उसके बाद कहा गया कि उनको राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जा सकता है. लेकिन वहां पर भी रामनाथ कोविंद बाजी मार ले गए.

अपने सियासी जीवन के आखिरी सिरे पर खड़े आडवाणी आज अकेले हो गए हैं. कभी जिनके इशारे पर भाजपा की नीतियां बनती और बिगड़ती थी वो आज खुद अपनी पहचान खोज रहे हैं.

ये सब मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि संसद में वेंकैया नायडू नामांकन के बाद आडवाणी को टीवी चैनल्स पर अकेले टहलते देखा है.

नामांकन के दौरान पीएम मोदी और अमित शाह समेत तमाम नेता थे. लेकिन नामांकन खत्म होने के बाद सभी चले गए. संसद के गलियारों में अकेले रह गए तो लाल कृष्ण आडवाणी.

संसद भवन के गलियारे में अकेले आडवाणी का टहलना जीवन की एक कड़वी सच्चाई की तरफ इशारा कर रहा है.

आप जिंदगी भर कुछ भी कर लो लेकिन अगर एक गलती कर दी तो आखिर में अकेले ही रह जाना है.

उस दिन संसद के गेट नंबर 4 से गेट नंबर 1 के बीच टहलते आडवाणी सभी सियासतदानों को बता रहे थे कि अगर उन्होंने विचारधारा छोड़ दी और गलत सलाहकारों से घिर गए तो आज नहीं तो कल उनका भी यही हाल होने वाला है.

बहरहाल आडवाणी को हमेशा इस बात के लिए जाना जाएगा कि उन्होंने छोटे से विस्थापित सिंधी समाज से होने के बावजूद अपनी चमत्कारिक सांगठनिक क्षमता के चलते 2 सांसदों वाली पार्टी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा दिया.

अपने दौर में कार्यकर्ताओं में वे सबसे लोकप्रिय नेता थे. आज भी मोदी जी से लेकर अरुण जेटली तक और राजनाथ सिंह से लेकर सुषमा स्वराज तक जितने भी भाजपा के दिग्गज हैं, सब उनके ही तैयार किये हुए कार्यकर्ता माने जाते है. उनका व्यक्तित्व अतुलनीय है.

जन्मदिवस पर शुभकामनाएं आडवाणी जी.

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