भानुमति – 9

सभा समाप्त होने पर प्रधानमंत्री विदुर उद्धव को अपने घर ले जा रहे थे, मार्ग में प्रतिहारी ने उन्हें सूचित किया कि साम्राज्ञी सत्यवती उनसे तथा उद्धव से मिलना चाहती हैं.

जब वे दोनों माता के कक्ष में पहुंचे तो उन्हें व्यग्रता से अपनी प्रतीक्षा करते हुए पाया.

औपचारिक अभिवादन तथा आशीर्वाद के आदान-प्रदान पश्चात माता ने कहा, “उद्धव, मुझसे वह समाचार कहो पुत्र जिसे सुनने के लिए मैं पिछले वर्ष भर से व्याकुल हूँ. क्या मेरे बच्चों का कुछ पता चला?”

उद्धव ने विदुर की ओर देखा, संकेत पाकर बोले, “माता सब कुशल है. आपकी पुत्रवधू अपने सभी पुत्रों सहित राक्षसों के देश में निवास कर रही हैं.”

“राक्षसों के देश में? वह तो बड़ा भयंकर स्थान होगा.”

“हाँ माता, हमारे नगरों की अपेक्षा तो भयंकर ही है, परन्तु अगर हम अपनी तुला से ना मापें तो किसी भी अन्य स्थान की तुलना में वह उतना ही सुंदर है जितने अन्य.

यद्यपि भीम के अतिरिक्त अन्य सभी भाई माता कुंती के साथ वहां से निकल आना चाहते हैं. संत सहदेव की नहीं कहता, उन्हें तो प्रत्येक स्थान पर अपना आकाश और उसमें चमकते तारे दिख ही जाते हैं.”

“वे जीवित और सकुशल हैं, उन्हें उनका अधिकार मिल जाये तो मैं भी चैन से अपना यह शरीर छोडूं. अच्छा विदुर, राजसभा का क्या निर्णय रहा?”

विदुर विनीत भाव से बोले, “माता, दुर्योधन का हठ था. वह कृष्णा को प्राप्त कर शक्तिशाली होने के लिए अधीर है. पितामह की आज्ञा से बीस कुरु-राजकुमार, कर्ण तथा अश्वत्थामा हस्तिनापुर की ओर से स्वयंवर में भाग लेंगे.”

“आश्चर्य, इसपर द्रोण कैसे सहमत हुए पुत्र?”

“कदाचित उन्होंने सोचा हो कि दुर्योधन को एक पाठ पढ़ाना आवश्यक है. उन्हें लगा होगा कि यादवों तथा अन्य राज्यों के राजपुत्रों के होते द्रौपदी शत्रु राष्ट्र के किसी युवक का चयन नहीं करेगी.

एक बात और माता, उद्धव ने बताया कि कृष्ण की इच्छा है कि पांडव भी छद्मवेश में स्वयंवर में सम्मिलित हों.”

उद्धव बोले, “परन्तु माता, इसमें एक समस्या है. भीम वहां से नहीं आना चाहते. भीम नहीं आएंगे तो अन्य भाई भी उन्हें छोड़कर नहीं आ सकते.”

“इस युग में भाइयों में ऐसा प्रेम देखने को नहीं मिलता. परन्तु भीम सदैव के लिए तो वहीं नहीं रह सकते.”

मंद मुस्कान के साथ उद्धव ने कहा, “आप नहीं जानती माता, हमारे भीमसेन अब मात्र राजकुमार नहीं, राक्षसावर्त के सम्राट हैं, उनकी एक राक्षसी पत्नी तथा उससे उत्पन्न एक पुत्र भी है.”

इस सूचना पर माता सहित विदुर का भी मुँह खुला रह गया. उद्धव आगे बोले, “उनका कहना है माता कि वे भरतवंश के एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने एक नए साम्राज्य का निर्माण किया है. अब पांडवों को भटकने की क्या आवश्यकता? और वे घटोत्कच से दूर भी नहीं होना चाहते.”

माता प्रसन्न हो बोली, “अहा, मेरे कुरुवंश का नया दीपक, भले ही किसी राक्षसी के गर्भ से क्यों ना हो, वो अपनी पीढ़ी का पहला कौरव है. समय आने पर युवराज बनेगा मेरा यह पुत्र. परन्तु घटोत्कच! यह कैसा नाम हुआ?”

“माता, राक्षस उसे अपने देवता विरोचन का अवतार मानते हैं, उसे विरोचन ही कहते हैं, परन्तु उसके रोम रहित, घड़े की पेंदी जैसे शरीर को देख भ्राता भीम उसे स्नेहवश घटोत्कच पुकारते हैं. राजा वृकोदर का पुत्र घटोत्कच.”

“ठीक है, भीम को उसे छोड़ने की क्या आवश्यकता है, उसे उसकी माता सहित यहां हस्तिनापुर में होना चाहिए.”

“नहीं माता, उनकी संस्कृति भिन्न है. पुत्र पर माता का अधिकार पिता से अधिक होता है, और जनता भी उसमें अपना राजा देखती है. घटोत्कच का राक्षसावर्त से बाहर आना असंभव है.”

“ये तो कठिन परिस्थिति है. यदि ऐसा है तो भीम को उसका त्याग करना होगा. पांडवों को कृष्ण की इच्छानुसार द्रौपदी के स्वयंवर में जाना चाहिए. पुत्र विदुर, क्या तुम भीम को नहीं समझा सकते?”

“माता, हठ पर अड़े भीम के अतिरिक्त मैं इस संसार के किसी भी व्यक्ति को समझा सकता हूँ. आप महामुनि व्यास से क्यों नहीं कहती, भीम उनकी आज्ञा नहीं टाल सकते.”

“तुम्हें पता है विदुर, व्यास महामुनि है पर उससे कहीं उत्तम पुत्र है. अब मैं समझी कि वह बिना किसी सूचना के कल ही हस्तिनापुर क्यों आ गया था. उसे अपनी इस माता की भविष्य में होने वाली इच्छाओं का भी ध्यान रहता है. उसके पास जाकर कहो कि मैंने उसे बुलाया है, यद्यपि वह स्वतः आता ही होगा.

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भानुमति को पुष्कर जाने की आज्ञा माता सत्यवती ने दे दी थी. भानुमति यह सोचकर पुलकित थी कि वह अपने कान्हा से फिर से मिलेगी. वो कान्हा जिसने गोपियों संग रास रचाया, जिसने उसकी मान रक्षा की, जिसने उसे बहन माना, जिसे वह भैया कह कर पुकार सकती है. वो तब तक नाचना चाहती थी, जब तक उसका पति आ नहीं जाता. दुर्योधन प्रायः नित्य ही रात्रि के कई पहर पश्चात सुरा के नशे में चूर होकर आता था और भानुमति से प्रेममयी बातें करता.

परन्तु आज जब दुर्योधन आया तो क्रोध से उसके नथुने फड़क रहे थे. आते ही उसने भानुमति का हाथ मरोड़ते हुए कहा, “क्यों री दुष्टा, तू आज आचार्य के पास गई थी?”

पीड़ा से बिलबिलाती भानुमति ने कहा, “मुझे दर्द हो रहा है स्वामी, हाथ छोड़िये. आचार्य के यहां तो मैं सामान्य तौर पर रोज ही जाती हूँ”.

“झूठ मत बोल, मुझे पता है कि तू वहां सामान्य तौर पर नहीं, मेरे विरुद्ध षड्यंत्र करने गई थी. बोल, बोल कि तूने आचार्य से यह नहीं कहा कि वे मुझे काम्पिल्य जाने से रोकें? तुझे क्या लगता है कि द्रौपदी के आने से तेरा युवराज्ञी का पद छिन जाएगा, और तू कभी साम्राज्ञी नहीं बनेगी? तो सुन, द्रौपदी आये ना आये, मैं तुझे कभी साम्राज्ञी का पद नहीं दूंगा”, उसने भानुमति को धक्का देते हुए कहा, “दूर हट जा मेरी नजर से, तू मर ही क्यों नहीं जाती.”

“हाँ, मार दीजिये मुझे, आपने तो अपने बच्चे को भी मार दिया होता.”

दुर्योधन के मस्तिष्क को कुछ पल लगे समझने में कि उसकी पत्नी उससे क्या कह रही है. पर जब उसने समझा तो उसका क्रोध जाता रहा. बोला, “क्या तुम गर्भवती हो?”

“हाँ स्वामी.”

“तो तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया.”

“कैसे बताती, पहले मुझे विश्वास तो आता.”

“अब तुम्हें पूर्ण विश्वास है?”

“हाँ स्वामी.”

वर्षों बाद दुर्योधन ने सुखद समाचार सुना था. उसकी पहली पत्नी, भानुमति की बड़ी बहन प्रसव के समय ही चल बसी थी. अभी उसके प्रहार से कहीं बच्चे को कुछ हो ना गया हो, उसने भानुमति को अपनी बलिष्ठ भुजाओं में सुरक्षात्मक ढंग से उठा लिया. आज वह बहुत प्रसन्न था. उसका होने वाला पुत्र अपनी पीढ़ी का पहला कुरु होगा, वही सम्राट बनेगा. अभागा दुर्योधन, उसे क्या पता कि किसी वन में पहला कुरु जन्म ले चुका था.

उसने बहुत नम्र स्वर में कहा, “तो पगली, तू आचार्य के पास क्यों गई थी?”

“मैं चाहती थी कि मेरा पुत्र हस्तिनापुर का सम्राट बने.” उसने इतने भोलेपन से कहा कि दुर्योधन का मन भीग गया. समझाते हुए बोला, “तो इसमें द्रौपदी के आने से क्या अंतर आ जायेगा. हमारा पहला पुत्र है यह, यही सम्राट बनेगा. परन्तु तुम समझो प्रिये, कि यदि मेरा संबंध काम्पिल्य से हो जाता है तो तेरा ये दुर्योधन कितना शक्तिशाली हो जाएगा. मुझे जाने दो प्रिये.”

दुर्योधन के सीने से चिपकी भानुमति ने विचार किया कि उसे बस अपने पति का प्रेम ही तो चाहिए. कभी-कभी उसका पति उद्विग्न हो जाता है तो क्या हुआ, उसे प्रेम भी तो करता है. वह नहीं रोकेगी अपने पति को.

थोड़ी देर बाद दुर्योधन ने उसे धीरे से हिलाकर पूछा, “सो गई क्या? अच्छा ये तो बताओ कि तुम आचार्य के साथ कृष्ण से मिलने क्यों जा रही हो. मेरी आज्ञा तो तुमने ली नहीं, पितामही से ले आई.”

भानुमति समझ गई कि शकुनि के गुप्तचरों से कुछ नहीं छुपा, बोली, “आप ही ने तो मुझे पिछले वर्ष कान्हा से सौजन्य स्थापित करने को कहा था. अब जब वो इतने पास आ रहे हैं तो मैं उनसे क्यों ना मिलूं, उन्होंने मुझे बहन भी तो माना है.”

“अच्छा तो जरा बताओ तो कि बहन अपने भाई से क्यों मिलने जा रही है”, हँसते हुए दुर्योधन ने कहा, “क्या उनसे भी प्रार्थना करोगी कि वे मेरा विवाह ना होने दें?”

यद्यपि उसका पति हँस रहा था, भानुमति डर गई और बोली, “अब मुझे कहीं नहीं जाना. मैं जहां हूँ, जैसी हूँ, सन्तुष्ट हूँ.” अपने पति के सीने से लगी भानुमति सो गई. थोड़े समय पश्चात दुर्योधन ने उसे उठाकर कहा, “भानु, मैं चाहता हूं कि तुम वासुदेव से मिलो. वे तुम पर बहुत स्नेह रखते हैं, वे तुम्हारी बात अवश्य मानेंगे. मैं जन्मजात अभागा हूँ भानु, यदि मेरा विवाह पांचाली से हो गया तो मेरे सारे दुष्ट ग्रह कट जाएंगे. भानु, तुम उनसे कहना कि वे इस संबंध हेतु सहायक बनें. बोलो, तुम ऐसा करोगी ना प्रिये?”

दुर्योधन के ये वचन भानुमति के कानों में पिघले सीसे की भांति लगे. उसका पति उससे कुट्टनी का कार्य करने की प्रार्थना कर रहा था. वो कहीं डूब मरना चाहती थी पर उसने निश्चय कर लिया कि उसका पति जिसमें प्रसन्न रहे, वह वही कार्य करेगी. उसके हामी भरने पर दुर्योधन ने कहा, “और तुम्हें केवल आचार्य के साथ जाने की आवश्यकता नहीं है. मैं मामा शकुनि से कहूंगा कि वो भी तुम्हारे साथ जाएं.”
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कृष्ण जब अपने अन्य अतिरथियों को मीलों पीछे छोड़कर अपनी गोप सेना की छोटी टुकड़ी के साथ पुष्कर दुर्ग के सामने पहुंचे तो उन्हें अत्यंत आश्चर्य हुआ. दुर्ग पर एक भी धनुर्धर नहीं था, उसके स्थान पर मांगलिक वेश में सामान्य नागरिक खड़े थे जिन्होंने कृष्ण के चार अश्वों वाले रथ को देखते ही उनकी जयजयकार की. कृष्ण समझ गए कि उद्धव सफल रहे, उन्होंने पितामह को पुष्कर वापस कर देने के लिए मना लिया.

दुर्ग से मैत्रीपूर्ण शंख फूंके गए, कृष्ण ने उद्धव के शंख की जानी पहचानी ध्वनि सुनी और उनकी आँखों में यह सोचकर अश्रु भर आये कि यदि उद्धव ना हो तो यह कृष्ण क्या कर सकता है. द्रोण और शकुनि ने वासुदेव का स्वागत किया, विश्राम के पश्चात द्रोण उनसे मिलने आये. उन्होंने कृष्ण के बारे में जो सुना था, उससे कहीं अधिक उन्हें पाया.

द्रोण ने उनसे पूछा, “वासुदेव, आप अकेले ही पुष्कर पर चढ़े आये, यदि यहां युद्ध होता तो?”

“तो मैं युद्ध करता आचार्य. परन्तु मेरा विचार था कि इस छोटी सी कठिनाई से निपटने के लिए हमारी सेनाओं के स्थान पर मेरा और दुर्योधन का द्वंद पर्याप्त रहता. व्यर्थ रक्त बहाने से क्या लाभ?”

“और आपको यह क्यों लगा कि दुर्योधन आपसे द्वंद स्वीकार कर ही लेता, अथवा आप उसे हरा ही देते?”

“पहले प्रश्न का उत्तर यह कि वह आपका शिष्य है, युद्धदान और द्वंद से विमुख नहीं हो सकता. दूसरे प्रश्न का उत्तर यह कि मेरा कार्य कर्म करना है, फल की चिंता मैं क्यों करूँ.”

“तो क्या अविचारित कर्म भी उचित है?”

“मेरे कर्म भी मेरी आस्था पर निर्भर होते हैं आचार्य. जैसे मुझे आप पर और पितामह पर आस्था थी कि आप पुष्कर लौटा देंगे, आप अधर्म नहीं होने देंगे.”

“आस्था, धर्म, आप इतने अधिकार से इन पर बात करते हैं जैसे आपको पता हो कि धर्म क्या है.”

“वह तो मैं आपसे सीखने आया हूँ, परन्तु जब मैं देखता हूँ कि एक गुरु अपने शत्रु के पुत्र को अपना शिष्य मान लेता है तो मुझे धर्म के दर्शन हो जाते हैं. वैसे शिखंडी अब कैसा है?”

“उसने पुरुषत्व प्राप्त कर लिया है. परंतु अस्वस्थ है.”

“मुझे स्वयंवर में उसकी आवश्यकता होगी. उद्धव उसे ले आएंगे. आचार्य, मेरा एक प्रश्न है, आप द्रुपद को शत्रु मानते हैं, फिर भी दुर्योधन को अनुमति देते हैं कि वह द्रौपदी को प्राप्त कर सके?”

“दुर्योधन स्वयंवर में भाग ले, परन्तु यह तो निश्चित है कि यदि द्रौपदी हस्तिनापुर आती है तो मैं हस्तिनापुर का त्याग कर दूंगा.”

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अगले दिन भानुमति कृष्ण से मिलने आई तो उसके साथ स्थूलकाय शकुनि भी था. शकुनि के साथ समुचित अभिवादन पश्चात कृष्ण ने भानुमति की ओर देखा, उन्होंने पाया कि वह कुछ कुम्हला गई है. धीमे पगों से सकुचाती हुई भानुमति ने जब बहनों की तरह दाहिने हाथ से कृष्ण के पैर छुए तो उन्होंने उसकी आँखों में अथाह विवशता देखी, अवश्य ही यह शकुनि का प्रभाव होगा.

“कैसी हो बहन? सब कुशल तो है? युवराज कैसे हैं?”

भानुमति कुछ कहती, उसके पहले ही शकुनि बोल पड़ा, “अब जिसके पति भरतश्रेष्ठ दुर्योधन हों, और भाई स्वयं कृष्ण वासुदेव, वह भला अकुशल कैसे हो सकती है. युवराज भी आपके स्वागत हेतु आने वाले थे, पर आप तो जानते ही है कि राज्य के कार्यों से अवकाश मिलना कितना कठिन होता है.”

“अवश्य शकुनि जी, वैसे गांधार में सब कुशल तो है ना?”

इस प्रश्न पर शकुनि थोड़ा अचकचा गया, परन्तु तुरन्त ही सम्भलते हुए कहा, “जी वासुदेव, सब कुशल है. भानुमति आपसे बहन के अधिकार से एक प्रार्थना करना चाहती है. है ना भानुमति?”

विवशता की मूर्ति भानु ने कहा, “भैया, मैं अपने पति की प्रसन्नता चाहती हूं, और उनकी प्रसन्नता इस बात में है कि द्रौपदी उन्हें स्वीकार करे. आर्यपुत्र चाहते हैं, मैं भी चाहती हूं कि द्रौपदी उनका वरण करे”.

शकुनि ने बात लपकते हुए कहा, “हाँ हाँ भानुमति, वासुदेव अपनी बहन के लिए इतना तो करेंगे ही. वे तुम्हें वचन देंगे कि द्रौपदी युवराज को ही चुने.”

कृष्ण बोले, “ये कैसी बात कर रहे हैं शकुनि जी. एक तरफ तो आप कहते हैं कि भानुमति मेरी बहन है, तो मैं अपनी ही बहन के लिए ऐसी सौतन क्यों लाऊं जो उसे अपदस्थ कर सकती है. फिर मैं किसी कन्या के स्वयंवर में ये वचन कैसे दे सकता हूँ कि वह किसी विशिष्ट व्यक्ति को ही चुने. और यदि द्रौपदी ने कोई परीक्षा रखी हो तो?”

कृष्ण की खरी बातें सुनकर शकुनि भौचक्का रह गया, फिर बोला, “नहीं, नहीं, मेरा तात्पर्य था कि चूंकि आप द्रौपदी के मित्र हैं तो युवराज की थोड़ी प्रशंसा कर देते. भानुमति भी यही चाहती है, है ना भानुमति?”

“हाँ, भैया. आपसे जो बन पड़े, आप कीजियेगा.”

“ठीक है बहन, मैं शकुनि जी को राजपरिवार से मिलवा दूंगा, वे स्वयं जो चाहे कह लेंगे. पर यदि परीक्षा हुई तो द्रौपदी भी कहाँ स्वतंत्र हो पाएगी.”

शकुनि फिर बोला, “उसकी कोई चिंता नहीं वासुदेव, युवराज अप्रतिम वीर हैं, वे किसी भी परीक्षा में उत्तीर्ण होंगे. बस आप मुझे राजपरिवार से मिलवा दें और अपनी ओर से भी दुर्योधन के पक्ष में बोल दें तो बड़ी कृपा होगी, क्यों भानुमति?”

केशव बोल पड़े, “परन्तु यदि दुर्योधन द्रौपदी को प्राप्त कर लेते हैं तो द्रोणाचार्य हस्तिनापुर का त्याग कर देंगे. मेरी बहन उन्हें पिता मानती है, वो बहुत दुखी भी होगी, और पितामह को भी ये अच्छा नहीं लगेगा. तो शकुनि जी, कुछ ऐसा करें कि अश्वत्थामा यह शपथ ले कि चाहे किसी भी कुरु से द्रौपदी का विवाह हो, आचार्य हस्तिनापुर का त्याग नहीं करेंगे.”

“जैसी आपकी इच्छा वासुदेव, अब हमें आज्ञा दें.” शकुनि ने जैसे तैसे अपने भारी शरीर को उठाया और बाहर की ओर बढ़ चला. भानुमति भी उसके पीछे चली. शकुनि जब छोलदारी से बाहर तक पहुंचा तो कृष्ण ने आवाज लगाई, “अरे भानुमति, जरा इधर आओ. मैं भी कितना भुलक्कड़ हो रहा हूँ. तुम्हारा उपहार तो रह ही गया.”

शकुनि को वहीं छोड़ भानुमति कृष्ण के पास आई. कृष्ण ने अपने शरीर का एक आभूषण निकाल कर उसे भानुमति की हथेली पर रखा और उसकी आँखों में झांककर बोले, “घबरा मत बहन, दुर्योधन द्रौपदी को प्राप्त नहीं कर सकेगा. मेरा वचन है.”

और भानुमति के कपोल रक्ताभ हो चले.

भानुमति – 8

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