ख़ुद में ख़ुदा बसता है

satyam shivam sundaram
satyam shivam sundaram

किसी दूसरे का हो जाना दिलो जान से
किसी दूसरे में देख लेना ख़ुदा
एक सीढ़ी है अपना हो जाने की तरफ़
एक पुल है ख़ुद से ख़ुदा हो जाने की तरफ़

कि किसी दूसरे के इतना क़रीब हो कर ही हम जान पाते हैं
दूसरा तो कोई है ही नहीं
है तो एक ही

एक प्यास, एक तिशनगी, भीतर का एक ख़ालीपन
एक अधूरापन
न जाने किसे ढूँढती रहती है नज़र

रूह कुरलाती है
गहरे से कहीं सिसकियाँ भी निकलती हैं

जन्मों का सफ़र
मिला दिल का मरहम
सब पूर्ण हुआ
प्यास बुझी
सिसकियाँ आनी बंद हुई

फिर अहसास हुआ
सब तो अपने ही अंदर था
ख़ुद में ही परिपूर्ण थे हम
अर्धनारिश्वर थे हम

पर उस चिंगारी का लगना ज़रूरी था
प्यास का समुन्दर हो जाना ज़रूरी था
किसी के मिलने से ही अपने साथ मिलना हुआ
किसी दूसरे का होना बहुत ज़रूरी है यह जानने के लिए
कि सब एक ही है
कि ख़ुद में ख़ुदा बसता है…

अर्धनारीश्वर : कायनाती साज़िश और दुनियावी योजना का संगम

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