तथाकथित समाजवाद के समय में 0.00011 प्रतिशत आबादी ने कैसे जमा कर लिए एक तिहाई रुपये नगद?

आज के इंडियन एक्सप्रेस में मनीष सभरवाल का एक आर्टिकल नोटबंदी के बारे में छपा है. सभरवाल आरबीआई बोर्ड में निदेशक के रूप में कार्यरत हैं.

वे लिखते है कि भारत में नोटबंदी के दौरान डेढ़ लाख लोगों ने 5 लाख करोड़ रुपये जमा किए; अर्थात भारत की आबादी के 0.00011 प्रतिशत (हर एक लाख व्यक्तियों में कुल 11 लोग या एक तरह से मानिये कि हर दस हज़ार लोगों में एक व्यक्ति) ने कुल डिमोनेटाईज़ड नकद का 33 प्रतिशत यानि कि एक तिहाई नगद जमा कराया.

[मुश्किलों-चुनौतियों से भरा वर्तमान और भविष्य, सौभाग्य कि हमें मिला दूरदर्शी नेतृत्व]

सभरवाल ने बहुत कुछ लिखा है कि कैसे नोटबंदी ने औपचारिक रोज़गार के सृजन के को बेहतर बना दिया. कैसे बैंको में 18 लाख करोड़ रुपये की नई ऋण क्षमता प्रदान की, कैसे हर महीने 7.9 करोड़ डिजिटल पेमेंट होते है, कैसे 3 लाख करोड़ नयी वित्तीय बचत हुई, कैसे ब्याज दर 2 फीसदी काम हुई, और भ्रष्टाचार में कमी हुई.

[न्यायसंगत होने का भरोसा हो तो कठिन निर्णय भी जनता को स्वीकार्य]

इसके लिए आप इंडियन एक्सप्रेस में उनका लेख पढ़ सकते है.

लेकिन क्या यह सोचने की बात नहीं है कि कैसे भारत में तथाकथित समाजवाद के समय में 0.00011 प्रतिशत आबादी ने एक तिहाई रुपये नगद जमा कर लिए?

मेरा मानना है कि यह रकम (5 लाख करोड़ रुपये) भी नगण्य निकलेगी जब इन 0.00011 प्रतिशत की बेनामी संपत्ति, विदेशो में गैर क़ानूनी तरीके से, चोरी से जमा कराये गए धन की भी जानकारी सामने आएगी.

तो जवाहर, इंदिरा, राजीव और सोनिया (मनमोहन सिर्फ रबर स्टैम्प थे) सरकार के समय में ऐसे भारत की 0.00011 प्रतिशत जनता ने गरीब और माध्यम वर्ग से पैसा लूटा.

मैं फिर दोहरा रहा हूं कि प्रधानमंत्री मोदी भारत में जमे हुए, खानदानी भ्रष्ट लोगों का क्रियेटिव डिस्ट्रक्शन या रचनात्मक विनाश कर रहे हैं.

इस कार्रवाई के बिना नए भारत की नींव नहीं पड़ सकती. आप प्रधानमंत्री जी पर विश्वास रखे.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY