LUCY के बहाने : गीता उपदेश

Lucy gita saar
Lucy

बरसों पहले जब मानवीय कंकाल “LUCY” मिली तो वैज्ञानिकों ने पाया कि उसके दिमाग का वजन करीब चार सौ ग्राम रहा होगा.

आज के मानवों का दिमाग करीब 1400 ग्राम का होता है. ये बात जब बेस्सन (Luc Besson) को पता चली तो उनके दिमाग में आया कि दिमाग के इतना बढ़ जाने पर इंसान की क्षमता कितनी बढ़ी होगी?

इसी सोच को लेकर उन्होंने “लूसी” नाम की फिल्म की कहानी लिखनी शुरू की थी जिसका विषय था कि अगर आप अपने दस प्रतिशत दिमाग का इस्तेमाल करके इतना कुछ कर सकते हैं तो 100% इस्तेमाल कर रही लड़की क्या करेगी ?

उनका इरादा था कि कहानी का पहला हिस्सा लीओन द प्रोफेशनल, दूसरा हिस्सा इंसेप्शन और तीसरा हिस्सा 2001 : अ स्पेस ओडेस्सी जैसा बने.

इस फिल्म की कहानी शुरू होती है एक लूसी नाम की 24 साल की युवती से. वो अमेरिकी है, ताइवान में पढ़ाई करती है और अपने बॉयफ्रेंड के चक्कर में एक बड़े ड्रग स्मगलर के जाल में फंस जाती है.

स्मगलर उसके बॉयफ्रेंड को तो मार ही देता है. लूसी और उसके साथ साथ तीन और लोगों को पकड़ कर वो सर्जरी से उनके पेट में एक ड्रग (CPH4) रखवाकर उसकी तस्करी करना चाहता था.

गुंडों की पिटाई में लूसी के पेट पर भी एक लात पड़ जाती है और उसके पेट के अन्दर मौजूद पैकेट फट जाता है. जो ड्रग अन्दर था वो गर्भवती स्त्रियों के शरीर में भ्रूण के विकास के लिए थोड़ी थोड़ी मात्रा में बनता है.

ये बहुत जल्दी खराब हो जाता है, शरीर भी इसे तेजी से सोखता है. शरीर के अन्दर ढेर सा CPH4 जाने से अचानक लूसी के दिमाग और शारीरिक क्षमताओं में बहुत तेज विकास होने लगा.

टेलीपैथी, टेलीकाय्नेसिस, मानसिक रूप से समय में भ्रमण करना, अच्छी योद्धा हो जाना, दर्द महसूस करना बंद कर देना, जैसे कई गुण लूसी में विकसित हो जाते हैं.

स्मगलर के चमचों को पीट-पाट कर निपटाती लूसी अब डॉक्टर के पास जाती है. वो सर्जरी से अपने पेट में पड़ा पैकेट वापस निकलवाती है.

वहीँ उसे इस विषय पर शोध करने वाले एक वैज्ञानिक, प्रोफेसर सैमुअल नॉर्मन का भी पता चलता है. इतनी भारी मात्रा में उस ड्रग के शरीर में होने का क्या नतीजा होगा ये समझने के लिए वो प्रोफेसर के पास जाना चाहती थी.

बाकी के ड्रग जिनके शरीर में छुपाये गए थे उनका पता भी स्मगलर से वसूलती, वो पेरिस के सफ़र पर रवाना होती है. उसका शरीर नयी कोशिकाओं-उतकों के निर्माण में सक्षम नहीं रह गया था इसलिए उसे लगातार ड्रग लेते रहने की जरूरत थी.

उधर अपने आदमियों के मारे जाने, लड़की के हाथों हार और ड्रग्स के नुकसान से भड़का स्मगलर लैंग उसका पीछा कर रहा होता है. जैसे तैसे वो प्रोफेसर नॉर्मन तक पहुँचती है, मगर तब तक उसका शरीर ख़त्म होना शुरू हो चुका होता है.

प्रोफेसर नॉर्मन जब उसे समझाते हैं कि मानवता का उद्देश्य ही जानकारी को एक पीढ़ी आगे पहुँचाना होता है तो वो उनके लेबोरेटरी के कंप्यूटर्स का स्वरुप ही बदल डालती है.

इतने तक में उसका दिमाग करीब सौ फीसदी क्षमता पर पहुँच चुका था और वो पहले मानव को छू पाती है, बिग बैंग और दुनिया का बनना शुरू होना भी देख पाती है.

उसका पीछा करता स्मगलर लैंग जब तक आकर उसपर गोली चलाता तबतक वो 100% की क्षमता पा लेती है. जब गोली चलती है तो सब कुछ लूसी ही हो चुका होता है ! फ़ोन भी वही फ़ोन का कनेक्शन भी लूसी, बन्दूक वो खुद और बन्दूक की गोली भी लूसी, तार भी तार में दौड़ती बिजली भी सब का सब वही!

सब कुछ लूसी ही कैसे हो जाएगा जबतक आप सोचे हम तबतक आपको कुछ और याद दिला दें. किसी बड़े आदमी ने कहा था कि सभी लोगों को हर बार धोखा देना मुमकिन नहीं, आप कुछ लोगों को, ज्यादा से ज्यादा कुछेक बार ठग सकते हैं. फिल्म की कहानी पढ़ते-पढ़ते अब आप समझ गए होंगे कि हमने आपको धोखे से फिर से भगवद्गीता पढ़ा दी है.

कोई अध्याय या विषय यहाँ पूरा नहीं हो रहा, कोई बहुत बड़ा-कठिन सिद्धांत भी नहीं है. भगवद्गीता के सातवें अध्याय के सातवें श्लोक में श्री कृष्ण कहते हैं मुझसे भिन्न कोई दूसरा कारण नहीं है, सारा संसार जिस सूत्र में, धागे की मणियों की तरह गुंथा हुआ है, वो सूत्र मैं ही हूँ.

थोड़ा पीछे पांचवे श्लोक में वो अपरा को अपनी जड़ प्रकृति और परा को अपनी चेतन प्रकृति बता चुके होते हैं. आगे वो बताते हैं कि पृथ्वी की गंध वो हैं, तपस्वियों का तप, अग्नि का तेज, वेदों में ओंकार, सूर्य-चंद्रमा में प्रकाश, जल में रस, बलवानों का सामर्थ्य, सब वही हैं.

आगे सत्ताईसवें श्लोक में वो बताते हैं कि आकर्षण और विकर्षण के बीच झूलते प्राणी मोह में पड़े होते हैं. इन्ही बातों को नौवें अध्याय के सोलहवें से उन्नीसवें श्लोक में फिर से देखा जा सकता है.

नौवें अध्याय के सोलहवें श्लोक में वो कहते हैं क्रतु मैं, यज्ञ मैं, स्वधा मैं, औषधि मैं, मन्त्र मैं, घृत मैं, अग्नि मैं, हवन की क्रिया भी मैं ही हूँ. जिन्हें धूर्तता और नैतिकता जैसे विषयों पर सोचना हो, उन्हें भी भगवद्गीता में ढूंढना चाहिए. भगवान कृष्ण कहते हैं कि कपटियों में द्युत (जुआ) भी मैं ही हूँ. ऐसे कई साम्य भगवद्गीता में ढूँढने पर और भी मिल जायेंगे.

बाकी को खुद ही ढून्ढ के देखिये, क्योंकि ये जो हमने धोखे से पढ़ा डाला वो नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा?

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