विद्या बालन जैसी पक्की फसल को नहीं पचा सकते सोशल मीडिया के कच्चे दिमाग़

पहली बार विद्या बालन को जब टीवी विज्ञापन में देखा था तो उसकी कामुक लेकिन गहराई से आती आवाज़ की मैं कायल हो गयी थी. चेहरे के भाव और ऐसी आवाज़ का संयोजन बहुत कम स्त्री में दिखाई देता है.

उसको देखकर सबसे पहला ख़याल यही आया था कि इस लड़की पर अभी तक किसी फिल्म निर्देशक की नज़र क्यों नहीं पड़ी. और उसके कुछ ही दिनों बाद विद्या के वास्तविक स्वरूप के अनुरूप ही विधु विनोद चोपड़ा विद्या को लेकर परिणीता के साथ प्रस्तुत हुए.

फिल्म तो जो थी सो थी, विद्या ने अपनी अर्जित की हुई सारी विद्याएँ अपने अभिनय में झोंक दी…

कुछ ऐसी फ़िल्में भी की जो उनके व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं थी लेकिन फिर उनके अभिनय का ही कमाल था कि डर्टी पिक्चर में फूहड़ अंग प्रदर्शन के बावजूद जहाँ एक ओर वो आलोचनाओं का शिकार हो रही थी वहीं दूसरी ओर उनके अभिनय की प्रशंसा भी हो रही थी.

बहुत कम ऐसे लोग होते हैं जिनमें अपने जीवन के साथ प्रयोग करने का साहस होता है और उस प्रयोग के अच्छे बुरे परिणामों को स्वीकार करने का भी.

बॉलीवुड तारिकाओं की बात की जाए तो सुष्मिता और रेखा के बाद विद्या को भी मैं उसी श्रेणी में रखती हूँ.

भौतिकता की इस अंधाधुंध दौड़ में हम अपनी नैसर्गिक विद्या जिसे छठी इन्द्री कहते हैं, खोते जा रहे हैं. किसी का चेहरा, आवाज़ और उसका आभामंडल देखने के लिए आपको उससे रुबरु मिलने की भी आवश्यकता नहीं होती.

आप अपनी छठी इन्द्री का इस्तमाल कर आराम से किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को जज कर सकते हैं. इसलिए जब जवान द्वारा विद्या के वक्षों को घूरने वाली खबर आग की तरह फ़ैली तो मैं हर बार मेरी छठी इन्द्री कहती रही इस खबर को तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत किया जा रहा है.

जितना मैंने विद्या को जाना है वो प्रसिद्धि के लिए हद दर्जे तक अंग प्रदर्शन भले कर ले लेकिन देश की सेना के सन्दर्भ में ऐसा बयान नामुमकिन है.

किसी बात को सन्दर्भ से काटकर प्रस्तुत करने से आप कुछ दिनों तक चटखारे तो ले सकते हो, खासकर जब बात महिलाओं के विशेष अंगों की हो. लेकिन सच्चाई सामने आने पर उसके अंगप्रदर्शन से अधिक आपके द्वारा उसके विरोध में लिखे गए बयान आपको अधिक नंगा करते हैं.

मायालोक में छोटे स्कर्ट पहने ठुमका लगाते हुई कच्ची बालियाँ ऐसा करे तो समझ भी आता है. लेकिन विद्या बालन पकी हुई फसल है… उसको पचाने के लिए लेखन की भूख होना ही काफी नहीं, खाने से पहले विचारों की प्रार्थना भी आवश्यक है.

बाकी आप फंसते रहिये वामपंथियों के जाल में, और साबित करते रहिये कि आज भी मेन स्ट्रीम मीडिया ही नचा रहा है सोशल मीडिया को.

बाकी अनुभवी पत्रकार विपुल रेगे द्वारा इस खबर पर की गयी खोज की रिपोर्ट भी एक बार पढ़ लीजिये –

एक खबर की हेडलाइन पढ़कर फेसबुकियों ने कल से गजब का कोहराम मचा दिया. विद्या बालन की डर्टी पिक्चर के लगभग सारे फ़ोटो इस्तेमाल कर लिए गए.

पोस्ट करने वाले इतनी जल्दी में थे कि उन्होंने हेडलाइन के नीचे पूरी खबर पढ़ी ही नहीं. इंटरव्यू में विद्या बालन ने बताया था कि ये घटना उनके साथ कॉलेज के दिनों में घटी थी.

खबर के इस हिस्से को नवभारत टाइम्स ने भौंडे तरीके से आपके सामने रखा. ये भी संभव है कि इंटरव्यू में विद्या ने इस बात को अलग ढंग से कहा हो और रिपोर्टर ने इसे सनसनीखेज बना कर पेश किया हो.

याद रहे घूरने वाली घटना के वक्त विद्या फिल्मों में आई भी नहीं थी. एनबीटी जैसे मीडिया बयान को मसाला लगाकर पेश करते हैं और हमारी तो आदत है बिना अनुसंधान पोस्ट करने की.

पोस्ट डालने की उत्तेजना में हम भूल जाते है कि हम खुद सोशल मीडिया के जवाबदेह पत्रकार हैं.

सेना के जवान का जिक्र आया, सेना का अपमान आप सह नहीं सके, ये ठीक बात है लेकिन खबर को बिना जाने-समझे पोस्ट करने लगे.

सेना हमारे लिए आदर्श है लेकिन क्या कभी सेना के जवानों से गलती नहीं होती. कई ऐसे मामले पूर्व में आए हैं. और ऐसे जवानों का प्रतिशत सेना में बहुत कम है.

विद्या बालन के बयान को पूरी भारतीय सेना के विरुद्ध जोड़कर देखेंगे तो मुश्किल हो जाएगी. वो मामला सेना के जवान और एक कॉलेज की लड़की के बीच का था जिसे एनबीटी ने भारतीय सेना से जोड़कर पत्रकारिता की कलुषता दिखाई है.

ये तो ऐसा ही हुआ कि बिल्ली के गू को साफ करने के बजाय उससे आंगन लीपने लगना. फेसबुक पर भी आंगन लीपा गया है.

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