विश्व इतिहास में हुई सबसे महँगी ज़मीन की खरीद… यहाँ शीश झुका लेना

गुरु गोबिन्द सिंह जी के दोनों छोटे पुत्र और माता जी अपने रसोइये गंगू के द्वारा की गई धोखेबाज़ी से सरहिन्द के नवाब वज़ीर खान द्वारा पकड़ लिए गए थे. उन दोनों बच्चों को नवाब के दरबार में पेश किया गया.

दरवाज़ा छोटा था जिसके लिए झुक के अंदर जाना पड़ता था और इसका मतलब शुरू से नवाब के आगे सर झुकाने देने का ये तरीका था. लेकिन दोनों साहिबज़ादों ने पहले पैर अंदर रखे.

[अगर मुसलमान हो गए तो फिर कभी नहीं मरेंगे न?]

तीन दिनों तक हर मुसीबत का सामना करते हुए साहिबजादों ने नवाब की इस्लाम कबूल करने की कोई बात नहीं सुनी और न ही उसकी धमकियों से डरे.

बाद में नवाब ने काज़ी को साहिबज़ादों के खिलाफ फतवा जारी करने को कहा लेकिन काज़ी बच्चों को किस जुर्म में फतवा जारी करे ये समझ नहीं आया.

[चमकौर के पहले और उसके बाद]

तब नवाब ने दोनों साहिबज़ादों को मारने के लोए मलेर कोटला के नवाब को बुलावा भेजा जिसके लिए नवाब मलेरकोटला ने मना कर दिया.

उसने कहा कि इन बच्चों का क्या कसूर है? यदि बदला लेना ही है तो इनके बाप से लेना चाहिए. मेरा भाई और भतीजा, गुरू गोबिन्द सिंह के साथ युद्ध करते हुए रणक्षेत्र में शहीद हुए हैं, कत्ल नहीं किये गये हैं. इन बच्चों को मारना मैं बुज़दिली समझता हूँ. अतः इन बेकसूर बच्चों को छोड़ दीजिए.

परन्तु नवाब सरहिंद को उनको मारना ही था… इसके लिए उसका साथ दिया सुच्चानन्द नामक एक आदमी ने.

सुच्चानन्द ने नवाब को परामर्श दिया कि बच्चों की परीक्षा ली जानी चाहिए. अतः उनको भांति-भांति के खिलौने दिये गये. बच्चों ने उन खिलौनों में से धनुष बाण, तलवार इत्यादि अस्त्र-शस्त्र रूप वाले खिलौने चुन लिए.

जब उन से पूछा गया कि इससे आप क्या करोगे तो उनका उत्तर था युद्ध अभ्यास करेंगे. यह विचार सुनकर काज़ी के मन में यह बात बैठ गई कि सुच्चानन्द ठीक ही कहता है कि इनको मार ही देना चाहिए क्योंकि ये युद्ध ज़रूर करेंगे.

वजीर ख़ान ने काज़ी से परामर्श करने के पश्चात उसको दोबारा फतवा देने को कहा. इस बार काज़ी ने कहा कि बच्चे कसूरवार हैं क्योंकि बगावत पर तुले हुए हैं. इनको किले की दीवारों में चुनवा कर कत्ल कर देना चाहिए.

दोनों साहिबज़ादे दीवार में चुनवा कर जल्लाद द्वारा उनके शीश काट कर क़त्ल कर दिए गए… नवाब ने उनके अंतिम संस्कार के लिए किसी को भी जमीन नहीं देने की मुनादी करवा दी.

इस बीच स्थानीय निवासी जौहरी टोडरमल को जब गुरू साहिब के बच्चों को यातनाएं देकर कत्ल करने के हुक्म के विषय में ज्ञात हुआ तो वह अपना समस्त धन लेकर बच्चों को छुड़वाने के विचार से कचहरी पहुँचा किन्तु उस समय बच्चों को शहीद किया जा चुका था.

उसने नवाब से अँत्येष्टि क्रिया के लिए बच्चों के शव माँगे… दोनों साहिबज़ादे अंतिम संस्कार से वंचित हो रहे थे.

नवाब ने कहा कि उतनी ही ज़मीन मिलेगी जितने में स्वर्ण मुद्रा जमीन पर बिछ सकेंगी.

टोडर मल ने सारी स्वर्ण मुद्राएं बिछा दीं लेकिन नवाब ने कहा कि मुद्राएँ खड़ी करके ज़मीन नापो…

फिर एक चारपाई बराबर ज़मीन ही सारी मुद्राएँ खड़ी करके टोडरमल को मिल सकी… बस इतनी ही ज़मीन पर दोनों साहिबज़ादों और गुरुमाता का अंतिम संस्कार हो पाया.

ये विश्व इतिहास में सबसे महँगी ज़मीन खरीद है…

1710 में बंदा बहादुर ने सरहिंद को तबाह कर डाला और वज़ीर खान को मार डाला… सरहिंद पर उन्होंने सिक्ख राज स्थापित कर दिया था ..

जिस कुल जाति कौम के बच्चे यूं करते हैं बलिदान, उस का वर्तमान कुछ भी हो परन्तु भविष्य है महान‘ – मैथिली शरण गुप्त

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY