बच्चों के साथ मस्ती और बाल शोषण का भय : इस पीढ़ी को किसका श्राप लग गया!

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कट्टप्पा जब नन्हे बाहुबली के कोमल पैरों को अपने माथे पर रखता है तो वो दृश्य अद्भुत हो जाता है और फिल्म के पोस्टर की शान बढ़ाता है.

मगर इसमें कुछ भी विशिष्ट नहीं. यह हिन्दुस्तान की संस्कृति रही है. यहां बच्चे भगवान का रूप माने जाते हैं. बाल कन्याएं तो नवरात्रि में देवी की तरह पूजी जाती हैं. उनके पैर बड़े बड़े ऋषि मुनि तक धोकर प्रसाद ग्रहण करते हैं.

यहीं नहीं, बहन के बच्चों को अपने बच्चों से अधिक लाड़ मिलता है. श्रीकृष्ण के बालपन का जितना वर्णन भारत के लोकजीवन में हुआ उतना पूरी दुनिया में नहीं हुआ होगा.

उनके रूठने और बालहठ से यशोदा और वृन्दावनवासी ही नहीं आज का जगत भी भावविभोर हो जाता है. उनकी बाल लीला की कल्पना मात्र से सूरदास अमर हो गए. इतना वृहद बाल साहित्य फिर कभी नहीं लिखा जा सका.

बच्चे कोई भी हों अपने बालपन से दुष्टों का भी मन मोह लेते हैं. और हर बच्चा मासूम और दिव्य होता है. क्या काला, क्या गोरा, क्या सांवला, क्या दुबला, क्या मोटा, सभी बच्चे सुन्दर लगते हैं. और उनके साथ बच्चे बन कर खेलने का मन रूखे से रूखे आदमी को भी हो जाता है.

ये सब बातें मानव के संदर्भ में हो रही है, दानव के लिए नहीं. जो इन अबोध के लिए कुदृष्टि रखता हो उसे दानव ही कहा जाएगा.

मगर इन दानवों की संख्या समाज में कितनी होती है? नगण्य.

ये पहले भी होते थे आज भी होते हैं. मगर आज इन दानवों के कुकर्मों को दिखा-दिखा कर आम लोगों के मन में शक का बीज बो दिया गया है. तथाकथित बुद्धिजीवियों ने लिख-लिख कर मानवता का सत्यानाश कर दिया.

अब हर बच्चे वाला हर किसी दूसरे को शक की निगाह से देखता है. सड़क चलते किसी बच्चे को देख कर मुस्कुराना अपराध माना जा सकता है. घर परिवार के सभी संबंध बच्चे के माता-पिता के लिए विश्वसनीय नहीं रह गए.

वो ज़माने गए जब आसपड़ोस के लोग भी चाचा-चाची मामा-मामी और मौसी-मौसा बन कर प्यार लुटाते थे. अब तो सगे संबंधी पर भी लोग विश्वास नहीं कर रहे.

क्या दुनिया रातों रात इतनी नर्क बन गई? शायद नहीं.

हाँ हमारी नज़रों में मीडिया ने विष ज़रूर भर दिया है. सावधान-सतर्क करने और शक्की बनाने में अंतर है, जिसे आधुनिक समाज समझ नहीं पा रहा.

मेरा तो मन आज भी किसी बच्चे को देख कर करता है कि मैं उसके लिए घोड़ा बन जाऊं, उसके नाक और गाल पर चुटकी लूँ. पता है ऐसा करने पर बच्चे हँसते हैं.

पेट में गुदगुदी करने पर तो उछलने लगते हैं और ऐसे में अगर आप उनकी बमटी दबाओ तो वे जोर से हाथ पैर मारते हुए खिलखिला कर हंसते हैं.

मगर अब ऐसा करने की कोई सोच भी नहीं सकता. और आप सोचना भी मत, वरना आप बाल यौन के अपराधी घोषित किये जा सकते हैं.

पता नहीं, इस पीढ़ी को किस का श्राप लग गया जो बच्चे इस बाल मस्ती से अब अनजान हैं.

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