Muons : भारत हत्यारा है अपनी ‘पुरातन विरासतों’ का

Muons (म्युओंस) एक अंतरिक्षीय कण है जो पृथ्वी पर 24 घंटे किरणों के रूप में गिरता रहता है. म्युओंस हर जगह मौजूद हैं. यहाँ तक कि जब आप ये वाक्य पढ़ रहे होंगे तो छह म्युओंस आपके मोबाइल स्क्रीन पर उभर रहे इस वाक्य पर दौड़ लगाकर निकल गए होंगे.

अत्यंत घनी ऊर्जा से परिपूर्ण म्युओंस संपूर्ण आकाशगंगा में प्रवाहित हो रहे हैं. अत्यंत सूक्ष्म म्युओंस नंगी आँखों से नहीं देखे जा सकते.

इनका पता लगाने के लिए वैज्ञानिक विशेष डिटेक्टर्स की मदद लेते हैं. डिटेक्टर्स के जरिये म्युओंस का थ्रीडी मैप बनाया जा सकता है.

इस महानन्हे म्युओंस ने खोजियों की दुनिया में बड़ी क्रांति लाकर रख दी है. इस अंतरिक्ष के मेहमान का लाभ बड़े पुरातात्विक अभियानों में लिया जा रहा है.

म्युओंस ने विश्व के सबसे रोचक रहस्यमयी ग्रेट पिरामिड ऑफ़ ग़िज़ा के सदियों से दफन राज़ का पर्दाफाश कर दिया है. गिजा का पिरामिड पिछले तीन सौ साल से खोजियों के लिए अविजित रहा है.

इस विशाल पिरामिड में दफ़्न ‘क्वींस चैंबर’ तक आज की तारीख में कोई नहीं पहुँच सका है. इसके भूल-भुलैया वाले गलियारों में फंसकर कइयों ने अपनी जान गंवाई है. उस चैंबर में खज़ाना होने से लेकर कई अलौकिक चीजे होने का दावा किया जाता रहा है.

2015 में जापान के नागोया विश्वविद्यालय से आए एक वैज्ञानिक कुनिहिरो मोरिशिमा ने ग्रेट पिरामिड में ‘म्यूओन डिटेक्टर’ लगाए और डाटा एकत्रित करना शुरू कर दिया.

पृथ्वी पर हर स्थान पर मौजूद म्युओंस पिरामिड के भीतर उन रहस्यमयी क्षेत्रों यानि किंग्स और क्वींस चैंबर के बीच से भी गुजर रहे थे.

मार्च 2016 में जब डाटा देखा गया तो स्वयं कुनिहिरो को भी भरोसा नहीं हुआ. अति सूक्ष्म म्युओंस ने बताया कि ‘क्वींस चैंबर’ शुरू होने से पहले लगभग सौ फुट लंबा ‘शून्य’ है. म्युओंस इस शून्य की कोई आकृति नहीं बना सके.

उन्नीसवीं सदी से अब तक इस विशाल खाली स्पेस के बारे में किसी को कुछ मालूम नहीं था. इस नई खोज ने पुराविदों को नई उलझन में डाल दिया है कि आखिर ये ‘शून्य’ क्या हो सकता है.

तो देखा आपने कि तकनीक की मदद से उन स्थानों के नक़्शे खींचे जा सकते हैं जो चारो ओर से बंद है. ग़िज़ा का ये पिरामिड प्राचीन विश्व आश्चर्यों में इकलौता बचा हुआ है.

ये विश्व विरासत है इसलिए इसमें ड्रिलिंग की अनुमति नहीं है. इस पाबंदी के चलते ‘म्यूओन डिटेक्टर’ का सहारा लिया गया. इस नई तकनीक को भारत में आज़माया जा सकता है.

पद्मनाभन मंदिर के बंद तहखानों में तो ‘म्युओंस’ की एंट्री जरूर होगी. हमें पता चल सकेगा कि उन तहखानों में कितनी अकूत संपदा पड़ी हुई है. ताज महल के बंद कमरों में जब ‘म्युओंस’ घुसेंगे तो पता चल जाएगा कि वहां ताले क्यों जड़ दिए गए.

दुर्भाग्य से भारत अपनी ‘पुरातन विरासतों’ का हत्यारा है. मध्यप्रदेश और राजस्थान में कई पुरातात्विक स्थल ढहा दिए जाते हैं, अनुसंधान तो दूर की बात है. हर साल पुरातात्विक खोजों और धरोहरों को संवारने के लिए जो बजट राज्य सरकारें मंज़ूर करती हैं, उसका जिक्र करने में भी शर्म आती है.

ग्रेट पिरामिड ऑफ़ ग़िज़ा में एक महत्वपूर्ण खोजी अभियान हुआ था. इसका सीधा प्रसारण पूरी दुनिया देखा था और नेशनल ज्योग्राफिक ने करोड़ो डॉलर की कमाई की थी. सिर्फ दस मिनट का प्रसारण.

क़्वींस चैंबर की ओर जाने वाले एक शॉफ्ट में एक कैमरालैस मिनी रोबोट को भेजा गया था. देखने वालों की सांसे रुक गई थी. पश्चिम ‘प्राचीनता’ को पूजता है और हम उससे निजात पाना चाहते हैं.

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