चातक, जो प्यासा रहेगा सावन में भी, पियेगा पानी तो स्वाति नक्षत्र का ही

तुम पे कोई इलज़ाम भी तो नहीं लगा सकती मैं
वादा खिलाफी का
‘शायद मैं आऊं’
‘शायद तुमसे मिलना हो इस बार’

तुम्हारा ‘शायद’ एक मिट्टी की गुल्लक
जिसमें बंद मेरी कुछ उम्मीदें, कुछ ख्वाहिशें
कुछ ख्वाब
एक अदद इंतज़ार

पहले भी हुआ है ऐसा
अब भी हुआ है ऐसा
न जाने किस जन्म तक होता रहेगा ऐसा
आसमां में काले घने उमड़ते बादल
मोर की आँखों में उमंग
दिल में कसक
पंखों में नाच
कि हवा के परिंदे उड़ा ले गए बादल

हाँ, रूहें तो एक ही हैं
मिलना कहाँ ज़रूरी है
तो फिर क्यों हैं ख्वाब बाहों में सोने के
चाँद पे उतरने के
गुनगुनी हंसी के
आँखों के आईने के
छत पे बिछी सफ़ेद चादरों के

कि प्लेटोनिक लव भी हो जाता है धीरे धीरे हवा
रूहों को भी बांटने होते हैं सुख दुःख
करने होते हैं अधूरे ख्वाब पूरे
बुझानी होती है तिश्नगी
यूँ ही नहीं चली आती वो जिस्मों की पनाह में

यूँ तो बहुत हैं महरम
बहुत हैं मोहब्बत बरसाने वाले
पर मैं क्या करूँ
मैं तो ठहरा वो चातक
जो प्यासा रहेगा सावन में भी
पियेगा पानी तो पियेगा स्वाति नक्षत्र का ही

तो सुनो सोनप्रिया के प्यारे
तुम्हें अपनी ‘शायद’ की मिट्टी की गुल्लक फोड़नी होगी
रूहों के बीच बने पुल को पार करना होगा
चातक की चोंच में डालने होंगे कुछ शरबती मोती…

हर कोई अपने आप में एक नीलकंठ है!

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