धर्म बनाम राजनीति

पिछले दो दिनों में फेसबुक पे मिला ज्ञान ….

बंगाल बारूद के ढ़ेर पे बैठा है. बंगाल में लॉ एंड आर्डर फैल हो चुका है. बंगाल के हालात भयावह है. बंगाल की हालत बद्द से बद्दतर है.

बंगाल में बीजेपी सत्तासीन हो के बंगाल की सब समस्याओं को हल कर सकती है. इसलिए नैतिकता शुचिता और आदर्शों को हाशिये पे रख के “मुकुल रॉय” को पार्टी (भाजपा) में लिया गया है/खरीदा गया है/तोते का डर दिखाया गया है.

अगर बंगाल वाकई बारूद के ढ़ेर पे बैठा है तो संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 356 को क्या अगरबत्ती दिखाने के लिए संविधान में सम्मिलित किया था?

अगर बंगाल के हालात वाकई भयावह है तो केंद्र सरकार बजाय खरीद फरोख्त के वहां राष्ट्रपति शासन ना लगाकर क्या देश के साथ धोखा नहीं कर रही?

इतना ही नहीं कुछ मठाधीश और उनके चेले तो रामायण महाभारत जैसे धर्मिक पवित्र ग्रन्थों और भगवानों का हवाला दे रहे हैं.

मुकुल रॉय भाजपा में आये या लाये गए ये निःसन्देह भाजपा का मास्टर स्ट्रोक है. परन्तु हमारे महान सनातन धर्म और राजनीति को पृथक रखिये. मिक्स मत कीजिये. आज की राजनीति में कोई राम नहीं है ना कोई हनुमान और सुग्रीव है. हर तरफ लंका और लँकाधिराज रावण का ही साम्राज्य है.

भगवान प्रभु श्री राम ने जब बाली का वध किया तो इसमें भगवान राम का कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं था. ना भगवान को किष्किंधा की सत्ता चाहिए थी. ना भगवान को लंका विजय के लिए सुग्रीव को राजा बना के वानर सेना का सहयोग लेने का निहित स्वार्थ था.

बाली अधर्म के मार्ग पर था. बाली ने अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी को जबरन बलपूर्वक अपने पास बन्दी बना रखा था, जबकि छोटे भाई की पत्नी अपनी पुत्री के समान होती है.

बाली अधर्म के मार्ग पर था इसलिए भगवान श्री राम के हाथों उसका अंत हुआ. इसको राजनीति से मत जोड़िए.

विभीषण और प्रभु श्री राम का एक दूसरे के प्रति कोई निहित राजनीतिक स्वार्थ नहीं था. वो भक्त और भगवान का रिश्ता था. ना भगवान को लंका की सत्ता चाहिए थी. ना विभीषण को सत्ता मोह था.

रावण अधर्म के मार्ग पे था इसलिए विभीषण ने उसका साथ छोड़ा. भगवान राम के लिए विभीषण शरणागत थे और शरण में आये को प्रश्रय देना क्षत्रिय का धर्म होता है (जैसे हमने दलाईलामा और तस्लीमा नसरीन को शरण दे रखी है). ना भगवान ने कभी विभीषण से रावण को मारने की युक्ति पूछी थी. इसमें राजनीति कहाँ से आ गयी?

धर्मराज युधिष्ठर ने स्पष्ट कहा तो मुझे अपनों की लाशों पे सिंहासन नहीं चाहिए. महाभारत का युद्ध सिर्फ राजसत्ता प्राप्ति का युद्ध नहीं था. वो युद्ध पृथ्वी पे असत्य अधर्म को पराजित कर पुनः सत्य और धर्म की स्थापना के लिए लड़ा गया था.

प्रभु श्री कृष्ण ने कहा है- जब जब संसार में अन्याय, अत्याचार, अधर्म, असत्य बढ़ता है तब तब मैं धर्म सत्य की स्थापना के लिए अवतार लेता हूँ तो अब इसमें राजनीति कहाँ से आई?

पितामह भीष्म को इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त था. थे वो भी सत्य और धर्म के मार्ग पे किंतु असत्य पक्षकारों की तरफ से इसलिए अपनी मृत्यु का मार्ग उन्होंने खुद बताया. इसमें भी कोई उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं थी.

द्रोण वध में भी पांडवों का कोई निहित राजनीतिक स्वार्थ नहीं था. ऊपर मैंने स्पष्ट लिखा है महाभारत का युद्ध राजसत्ता प्राप्ति का नहीं अपितु धर्म की स्थापना का युद्ध था …. हालांकि द्रोण वध के लिए धर्मराज युधिष्ठर ने छल का सहारा लिया जिसका उन्होंने प्रायश्चित भी किया …. क्या वर्तमान के किसी नेता/दल में है हिम्मत अपने लिए हुए फैसले के खिलाफ प्रायश्चित करने की?

राजीव गांधी और भाजपा के बीच एक हौड़ मची थी …. खुद को एक दूजे से बड़ा रामभक्त साबित करने की ….

जहां खुद को बड़ा रामभक्त साबित करने के लिए राजीव गांधी ने राम लल्ला के मंदिर के पट खुलवाए …. वहीं अपने 1989 के चुनाव अभियान की शुरुवात भी अयोध्या से की थी ….

वहीं दूजी और बीजेपी ने राम रथ यात्रा के द्वारा खुद को बड़ा रामभक्त साबित करने की कोशिश की ….

लेकिन …. किंतु …. परन्तु …. बट …. ईफ …………

राम लल्ला आज भी टेंट में विराजमान है …. राममंदिर ना भाजपा ने बनवाया ना कांग्रेस ने ………. हां राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दे पे कोटि कोटि हिंदुओं की भावनाओं को जरूर छला गया ….

मैं तो कहता हूं राजनीति में धार्मिक/राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल किसी भी दल द्वारा होना ही नहीं चाहिए. चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को इसपे संज्ञान लेना चाहिए.

धर्म/धर्माचार्य और राजनीति एक दूजे के पूरक है ये बात मैं भी मानता हूं. परन्तु भाई साब ये सब सतयुग में ही ठीक लगता था. ये कलयुग है. यहां कोई राम नहीं है. हमाम में सब नंगे हैं….. चारों तरफ असंख्य रावण हैं…..

इसलिए प्लीज़ हमारे धार्मिक ग्रन्थों और आराध्यों का हवाला वर्तमान की राजनीति में मत दीजिये.

मुकुल रॉय भाजपा में आये हैं.

उनका खुले दिल से स्वागत कीजिये.

ये शानदार जानदार ज़िंदाबाद फैसला है भाजपा का.

लेकिन धर्म और आराध्यों को राजनीति से पृथक रखिये.

और भाजपा का विरोध करने वालों को इतना ही कहूंगा सारी नैतिकता आदर्शों शुचिताओं का ठेका अकेला भाजपा ने ही नहीं ले रखा है.

भविष्य में और भी इस तरह के फैसलों को देखने/सुनने की आदत डाल लीजिये.

– रितेश प्रज्ञांश

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