चमकौर के पहले और उसके बाद

सिक्खों के गुरु गोबिंद सिंह के पास चालीस सिक्खों का एक जत्था पहुंचा.

सरदार महान सिंह के नेतृत्व में जब ये लोग आये तो मुगलों ने आनंदपुर साहिब का किला घेर रखा था.

आये हुए सभी चालीस सिक्ख इस्लामिक हमलावरों को जंग का स्वाद चखाने को आतुर थे. गुरु गोबिंद सिंह हमला करने की इजाजत नहीं दे रहे थे.

हुक्म आने में ये देरी उन चालीस सिक्खों से बर्दाश्त नहीं हुई, खीझ कर वो वापस लौट गए.

गुरु का हुक्म ना मानने की ये खबर जब आस पास के इलाकों से ही आये उन सिक्खों के घरों तक पहुंची तो सबने सर धुन लिया.

गुरु का हुक्म मानने के बदले लौट आये सिक्खों को घरों में खूब लानत-मलामत हुई.

गुरु का हुक्म ही सिक्ख के लिए अंतिम आदेश होता है, ये तब तक लौट आये चालीस सिक्खों को भी समझ में आ गया था.

अपनी करनी पर शर्मिंदा ये सिक्ख, माई भागो के समझाने पर वापस उनके साथ गुरु गोबिंद सिंह जी के पास माफ़ी मांगने पहुंचे.

गुरु अर्जुन देव के समय में भाई पिरो साह थे जो कि चौरासी (84) गांवों के सरदार भाई लंगाह के छोटे भाई थे.

इन सभी गांवों ने गुरु अर्जुन देव जी के समय ही सिक्ख होने की दीक्षा ली थी. माई भागो उसी इलाके से भाई पीरो साह के परिवार से थीं.

जब तक ये लौटते तब तक औरंगज़ेब ने कुरआन की कसम उठाते हुए संधि की वार्ता के लिए गुरु गोबिंद सिंह को ख़त लिखा था.

उस पर भरोसा ना होते हुए भी कुरआन की कसम देखकर उनकी माँ और कुछ साथियों ने उन्हें वार्ता के लिए समझाया.

इस चाल में फंसने का नतीजा ये हुआ कि अपनी दादी के साथ निकले दो साहिबज़ादे जोरावर सिंह जी और साहिबजादा फ़तेह सिंह जी, गुरु गोबिंद सिंह जी से अलग हो गए थे.

यहाँ से आगे की कहानी हाल में ही आई ‘चार साहिबज़ादे’ फिल्म में सबने देख रखी होगी. इस फिल्म को कई जगह टैक्स फ्री भी किया गया और कई धार्मिक प्रवृति के लोगों ने इसे मुफ्त में भी प्रदर्शित किया.

ये फिल्म बीच की घटना यानि चमकौर की जंग के ऊपर और चारों साहिबजादों की कहानी थी.

दोनों बड़े भाई, साहिबज़ादा अजित सिंह जी और साहिबज़ादा जुझार सिंह जी चमकौर के युद्ध में हजारों इस्लामिक हमलावरों से मुकाबला करते शहीद हुए.

[अगर मुसलमान हो गए तो फिर कभी नहीं मारेंगे न?]

गुरु गोबिंद सिंह जी को पांच सिक्खों ने बचाया और वो मालवा इलाके से होते, मुगलों से बचते हुए खिदराना तक पहुंचे थे.

यहीं एक तालाब के पास जब तक पीछा करते इस्लामिक हमलावर गुरु गोबिंद सिंह को घेरते कि माई भागो उन चालीस सिक्खों के साथ आ पहुंची. सिर्फ चालीस सिक्खों के साथ माई भागो ने मुग़ल सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.

ऊँचे टीले से गुरु गोबिंद सिंह और उनके साथ के सिक्ख तीरों से और नीचे माई भागो! जब इस्लामिक हमलावरों के पीठ दिखा कर भागने पर लड़ाई रुकी तो मैदान में बस दो सिक्ख बचे थे.

माफ़ी मांगने के इरादे से आये चालीस के चालीस सिक्ख इस युद्ध में खेत रहे. माई भागो के अलावा गंभीर रूप से घायल, बस चालीस सिक्खों के सरदार महान सिंह, जीवित बचे थे.

गुरु गोबिंद सिंह ने उन चालीसों को आशीर्वाद दिया और घायल माई भागो को भी अपने अंगरक्षक के रूप में साथ लिया. नांदेड में 1708 में गुरु गोबिंद सिंह के गुजर जाने के बाद माई भागो दक्षिण की ओर चली गयीं.

कर्णाटक में बीदर से थोड़ी दूर जिन्वारा के पास उन्होंने आश्रम बनाया और वहीँ साधनारत रहती थी. उनके देहावसान के बाद उनकी कुटिया भी एक तीर्थस्थल हो गई. आज वहां गुरुद्वारा तप स्थान माई भागो है.

नांदेड में भी उनका कमरा सुरक्षित रखा है बस भारतीय वीरांगनाओं को याद करने की आदत छूटी हुई है. शुक्र है कि भारत श्रुति परम्पराओं का भी देश है, वीरांगना तपस्विनी की कहानियां छुपा भी लो तो भी सुनाई दे ही जाती है.

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