Before Sunrise के बहाने : अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्

बिफोर सनराइज (Before Sunrise) एक दिन की कहानी पर बनी हुई फिल्म है. सोलह-सत्रह जून की जो तारिख लेकर फिल्म को घटते दिखाया है, वो आयरिश लेखक जेम्स जॉयस के उलीसस (Ulysses – James Joyce) से ली हुई तारिख है.

कहानी बुडापेस्ट से खुली एक ट्रेन में शुरू होती है जिसमें जेस्स और सेलीन की मुलाकात हो जाती है.

जेस्स विएना जा रहा है जहाँ से उसे अमेरिका के लिए फ्लाइट लेनी है, सेलीन अपनी दादी से मिलकर वापस अपनी यूनिवर्सिटी में, पेरिस लौट रही होती है.

ट्रेन जब विएना पहुँचती है तो जेस्स सेलीन को अपने साथ ही उतर जाने के लिए राजी कर लेता है.

वो लड़की को समझाता है कि दस-बीस साल बाद हो सकता है वो अपनी शादी से खुश ना हो और सोचे कि शायद किसी और को चुना होता तो जिन्दगी बेहतर होती.

उतर आने से उसे ये देखने का मौका मिलेगा कि किसी और पुरुष की तुलना में वो बहुत अलग नहीं है, बिलकुल बोरिंग, हतोत्साहित सा – प्रेरणाविहीन है.

जेस्स की फ्लाइट अगली सुबह थी, लेकिन उसके पास किराये पर कमरा लेने के लायक पैसे भी नहीं थे. इसलिए दोनों रात सड़कों पर गुजारने, विएना घूमने निकल पड़ते हैं.

थोड़ा घूमने फिरने और विएना की देखने लायक जगहों को देखते देखते दोनों को एक दूसरे से कुछ प्यार जैसा होने लगता है. आपस में अब वो खुलकर बातें भी कर रहे होते हैं.

चर्चाएँ प्रेम, जीवन, धर्म से लेकर शहर में क्या देख रहे हैं उस पर भी होती रही. सेलीन बताती है कि उसे अपने पुराने प्रेमी से बहुत प्यार था, लेकिन सम्बन्ध छह महीने पहले टूट गए.

जेस्स बताता है कि वो मेड्रिड में अपनी प्रेमिका से मिलने आया था. इतनी दूर से आने पर जब प्रेमिका ने उसमें कोई ख़ास रूचि नहीं दिखाई, तो सम्बन्ध टूट गए.

इसलिए उसने यूरोप से लौटने के लिए एक सस्ती फ्लाइट की टिकट ली और फ्लाइट की तारीख दो हफ्ते बाद थी इसलिए यूरेल का पास लेकर दो हफ्ते से यूरोप घूम रहा था.

एक नहर के पास से गुजरते उनकी मुलाकात एक भिखारी से दिखते आदमी से भी होती है. वो पैसे मांगने के बदले उनसे एक शब्द चुनने कहता है, जिसपर वो कविता लिख देता. दोनों मिलकर “मिल्कशेक” शब्द चुनते हैं, और वो उसी पर कविता लिख भी देता है (Delusion Angel – David Jewell की कविता, जिसे फिल्म के लिए ही लिखा गया था).

एक कैफ़े में दोनों एक दूसरे के मित्र बनकर एक दूसरे को फ़ोन करने का नाटक भी करते हैं. सेलीन कबूलता है कि जेस्स के मनाने से पहले ही वो उसके साथ ट्रेन से उतरने को तैयार थी.

जेस्स कबूलता है कि उसने जो टिकट खरीदा वो कोई बहुत सस्ता नहीं था, वो बस जीवन से भागने के बहाने खोज रहा था.

दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हैं, कैसा महसूस करते हैं वो भी कबूलते हैं, इस रात के बाद अगली सुबह अलग होने पर शायद दोबारा दोनों की मुलाकात ना हो, दोनों ये भी समझ रहे हैं.

जितना समय मिला है वो उसे अच्छे से साथ गुजारने का फैसला करते हैं. नहीं “अच्छे से बाकी की रात गुजारने” पर जो आप सोच रहे हैं, वो सिर्फ आपकी सोच है. फिल्म में ऐसा कुछ दिखाते नहीं, आपकी कल्पना को छूट दे देते हैं, बस!

जेस्स आखिर के दृश्यों में कबूलता है कि सिर्फ एक रात की मुलाकात और कभी दोबारा ना देखने के बदले वो सेलीन से शादी करना चाहेगा. अगली सुबह फिल्म रेलवे स्टेशन पर ख़त्म हो जाती है जहाँ दोनों एक दूसरे से फिर मिलने का वादा कर रहे होते हैं.

अब जब आप यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का छब्बीसवाँ और सत्ताईसवाँ श्लोक देखिये :-
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।2.26।।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।2.27।।

ये दोनों श्लोक नित्य या सनातन क्या है, और अनित्य यानि समाप्त हो जाने वाला क्या है इसके बारे में हैं. भगवद्गीता के इस हिस्से में श्री कृष्ण बता रहे होते हैं कि ये राजा लोग भी पहले थे, मैं भी था, तुम भी थे, आगे कभी ये नहीं होंगे ऐसा भी नहीं है. काफी कुछ वैसे ही जैसे प्रेम तो सेलीन के मन में पहले भी था, जेस्स के मन में भी था.

उन्हें लग रहा था कि अपने अपने प्रेमी-प्रेमिका से अलग होने पर वो ख़त्म हो गया, लेकिन एक दूसरे से मिलते ही वो फिर जाग गया. उसकी दिशा बदल कर एक दूसरे की तरफ हुई है बस, वो शुरू या ख़त्म तो कभी हुआ ही नहीं था.

जितनी देर में कुछ मुगलिया भक्तियुग की जज़्बात आप और वेटिकन पोषित सेंटिमेंट सिस्टर भगवद्गीता को प्रेम से जोड़े जाने पर आहत हो और कुफ्र-ब्लासफेमी का शोर मचाती मैदान में कूदे आइये इन वाक्यों के संस्कृत पर चलते हैं. यहाँ आपको “अथ च” और “मन्यसे” पद दिखेंगे.

ये भगवान् अपना स्पष्ट मत नहीं बता रहे, यहाँ वो ये कह रहे हैं कि अगर तुम ऐसा सोचो, या मान रहे हो तो गलत सोच रहे हो. अपने हिसाब से सही क्या वो नहीं तुम्हारे सोचने में गलत क्या है उस पर ध्यान दिलाया जा रहा है. भगवद्गीता के दूसरे अध्याय पर इसलिए भी ध्यान दिलाया है क्योंकि ये संवाद की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है.

अपनी बात शुरू करने से पहले आप दूसरे की बात सुनते हैं, जैसा कि पहले अध्याय अर्जुनविषादयोग में किया गया. फिर अपनी बात बताने से पहले संक्षेप में बताते हैं कि क्या क्या बताया जाएगा.

दूसरा अध्याय जो कि सांख्ययोग है, उसके नाम का सांख्य, कितनी मात्रा की गिनती भी बताता है. दूसरे अध्याय में सभी बातों का संक्षेप है इस वजह से बार बार आपको इस पर वापस भी आना पड़ता है.

लम्बाई में भी ये औरों से लम्बा, करीब करीब अट्ठारहवें अध्याय जितना है. यहाँ हर श्लोक सिर्फ एक ही विषय की चर्चा हो, ऐसा जरूरी नहीं, उसमें एक से ज्यादा बात भी हो सकती है. आग तो आग ही रहेगी, उस से खाना पकाना है या घर जलाना है, ये चुनाव आपका है. बार बार वापस दूसरे अध्याय पर आते इसे भी याद रखिये.

बाकी ये जो हमने धोखे से पढ़ा डाला वो नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा?

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