ये अरब किस ओर, और क्यों जा रहा है? भाग-2

अबू सूफ़ियान वो पहले शख्स थे जो अरब में मुस्लिम और गैर-मुस्लिमों के बीच की पहली जंग ‘बद्र’ से लेकर मक्का-फ़तह तक में गैर-मुस्लिम खेमे के नेतृत्वकर्ता रहे थे, इसलिये अरब की तारीख में उनका और उनके खानदान की बड़ी अहमियत है.

अबू सूफ़ियान भी कुरैश थे जिसको अरब में सबसे बेहतरीन खानदानों में गिना जाता रहा है.

[ये अरब किस ओर, और क्यों जा रहा है? भाग-1]

कुरैश में एक बड़े नामी-गिरामी शख्स हुये थे, जिनका नाम था हाशिम (जो नबी-करीम के परदादा थे).

इन हाशिम के बाद दो वंश चले. एक ‘अब्दुल-मुतल्लिब’ का था और दूसरा ‘उमैय्या’ का.

नबी-करीम ‘अब्दुल मुतल्लिब’ के खानदान से थे और ‘उमैय्या’ के वंश में ‘अबू सूफ़ियान’ हुये.

‘उमैय्या’ और ‘मुतल्लिब’ के खानदान में शुरू से ही एक-दूसरे से बड़ी अदावत थी.

इसलिये जब मुतल्लिब के घराने के ‘हज़रत मुहम्मद’ ने अपनी नुबुब्ब्त का ऐलान किया तो उमैय्या के खानदान के लोग चिढ़ गये.

उन्होंने इस ऐलान को इस रूप में लिया कि ये मुतल्लिब के खानदान वालों की ये चाल है जिसके जरिये वो अरब में अपने खानदान को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं और काबा और ज़मज़म को अपने अधिकार में रखना चाहते हैं.

‘उमैय्यद राजवंश’ के बारे में कहा जाता है कि इसकी नींव चौथे ‘हजरत अली’ की खिलाफ़त के बाद ‘अमीर मुआविया’ ने डाली पर वास्तव में इस्लाम के तीसरे खलीफ़ा ‘उस्मान इब्न-अफ्फान’ (644-656) ‘बनू-उमैय्या’ के खानदान से थे.

खलीफा बनते ही ‘हजरत उस्मान’ पर आरोप लगाये गये कि उन्होंने प्रशासन के सारे महत्वपूर्ण पदों पर अपने ‘उम्मैय्द वंश’ के लोगों की नियुक्ति शुरू कर दी है, नबी के भतीजे और दामाद ‘हजरत अली’ को अलग-थलग कर दिया है और ‘मअवान’ नाम के एक प्रशासनिक अधिकारी को सारे महत्वपूर्ण कार्य सौंप दिए हैं.

‘मअवान’ वो शख्स थे जिनको अपने समय में ‘हज़रत मुहम्मद साहब’ ने काफ़िर घोषित करके अरब से बहिकृत कर दिया था.

‘हजरत उस्मान’ की उम्र बहुत ज्यादा थी इसलिये सारे प्रशासनिक कार्यों पर ‘मअवान’ का ही नियंत्रण था.

रोचक बात ये है कि ‘हज़रत उस्मान’ ने ‘मअवान’ को पवित्र कुरान के संकलन का काम भी सौंप दिया.

‘मअवान’ मजहबी नहीं थे और धर्म-कर्म से भी दूर थे, ऊपर से पूर्व में रसूल ने उन्हें लानती घोषित किया हुआ था इसलिये उन पर आरोप लगा कि उन्होंने किताब बदल दी है. उन्हें मुर्तद (धर्म बहिष्कृत) करार दे दिया गया.

शिया पंथ में जो किताबें मान्य हैं उनमें ‘उसूले-काफ़ी’, हयातुल-कूलूब’, ‘हक्कुल-यकीन’ और ‘नहजूल-बलाग़’ बड़े मशहूर हैं.

इन्हीं किताबों से हवाले लेकर शिया मत वाले ये दावा करते हैं कि मूल-किताब में तहरीफ़ की गई है जिसके जिम्मेदार ‘मअवान’ थे.

वो कहते हैं कि किताब में ‘सूरह-नूरैन’ (दो नूर यानि मुहम्मद और अली) और सूरह-विलायत (उत्तराधिकारी) नाम से दो सूरतें थी जिसे ‘मअवान’ ने निकलवा दिया ताकि हाशमी घराने के ‘हज़रत अली’ की फजीलत को कम किया जा सके.

गौरतलब है कि ‘हजरत उस्मान’ का ‘अबू सूफ़ियान’ के साथ भी रक्त संबंध था और ‘उस्मान’ के दायें हाथ ‘मअवान बिन हकम’ कट्टर उम्मैयद थे. इसलिये ‘उस्मान’ की खिलाफ़त पर एक साथ पक्षपात और किताब को तब्दील करवाने के आरोप लग गये.

फ़साद इतना बढ़ा कि अरब के कबीलों के बीच के झगड़े पुनः उभर गए. ‘उमैय्या’ खानदान वाले ये कहने लगे कि आखिर हम फतह-मक्का के दिन अपने बुज़ुर्ग अबू सूफ़ियान की पराजय और समर्पण को कैसे भूल सकते हैं.

इन सब बातों ने और फिर ‘मअवान’ के द्वारा हाशमियों को हाशिये पर रखने की घटनाओं ने ‘उस्मान’ के खिलाफत काल को, बनी-हाशिम घराने (रसूल का खानदान) और उम्मैय्द घराने के बीच रण के मैदान में बदल दिया.

खुद ‘हजरत अबू बकर’ के पुत्र ‘मुहम्मद’ ने उस्मान के खिलाफ विद्रोह कर दिया, कबीला कुरैश के सरदार तल्हा, जुबैर और हजरत अली ने उस्मान की जगह खुद को खलीफा बनाने की कोशिशें शुरू कर दी.

इसी बीच बसरा, कूफ़ा और मिस्र के लोग भी इस रण में शामिल होने आ गये.

एक दिन ये लोग मदीने में घुस आये और उन्होंने ‘हजरत उस्मान’ के मकान को घेर लिया और उनसे मांग की वो खिलाफ़त छोड़ दें या फिर काफ़िर ”मअवान’ को हटा दिया जाये, ‘हज़रत अली’ का सम्मान हो और शासन में हाशमियों (नबी के खानदान) को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए.

‘हजरत उस्मान’ ने आश्वासन दिया कि ऐसा किया जायेगा पर जब शिकायती लोग वापस लौट रहे थे उसी समय यह बात फैल गई कि ‘मअवान’ के इशारे पर ‘उस्मान’ शिकायतियों को सजा देने वाले हैं.

इसी बात से आक्रोशित लोगों ने मदीने में ‘उस्मान’ को घेर लिया और उनकी हत्या कर दी. अली समर्थकों को मौका मिल गया और 656 ई. में अली किसी तरह खलीफा चुन लिये गये.

अब अली विरोधियों ने मांग शुरु कर दी कि उस्मान के कातिलों को सजा दी जाये. रसूल साहब की बीबी हजरत आयशा के नेतृत्व में अली विरोधियों ने गुट बना कर हजरत अली से युद्ध किया जिसे तारीख में जंगे-जुमल (ऊंटों की लड़ाई) के नाम से जाना जाता है.

इस युद्ध के पश्चात् अली को अमीर मुआविया (जो उस्मान के रिश्तेदार थे और अबू सूफियान के बेटे थे) से भी सिफ्फीन में जंग करनी पड़ी, जहां अली हार गये.

अंततः 661 ई. में कूफा की एक मस्जिद में उनकी हत्या भी कर दी गई. जिसके बाद मुआविया बिन अबू सूफियान ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया.

– क्रमशः

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