छिटपुट असहिष्णुता की जुगलबंदी छोड़, लिख डालिये इतिहास की सबसे बड़ी राजनैतिक साज़िश की कहानी

परम आदरणीय कृष्णा सोबती जी,

सर्वप्रथम, आपको इस वर्ष का साहित्य के क्षेत्र में देश का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने पर हृदय की गहराइयों से बधाई.

इस पर मेरा मत है कि हिंदी लेखन में आप का नाम और काम देख कर तो यह सम्मान आपको बहुत पहले मिल जाना चाहिए था. ये ज्ञानपीठ वाले भी पता नहीं किस किस को ज्ञान का सर्टिफिकेट बांटते रहते हैं.

बहरहाल, आप तो अपने आप में हिंदी साहित्य की एक पीठ हैं, आप को इन सम्मानों की भला क्या आवश्यकता. फिर भी ये देरी उचित नहीं.

कहीं ऐसा तो नहीं सम्मान देने वालों को ये भय हो कि आप उनका दिया सम्मान भी ना लौटा दें?

वैसे जब आपके द्वारा साहित्य अकादमी का सम्मांन वापस करने की खबर सुनी तो मन में एक विचार आया कि आप से पूछूं कि 2014 के बाद ऐसा क्या हुआ जो पहले नहीं हुआ था.

फिर मुझे अनायास याद आया 1984 का दंगा, जब निर्दोष सिख भाइयों के खिलाफ जबरन अराजकता भड़काई गई थी.

और फिर याद आया 1990 का वो दौर जब घाटी में मासूम कश्मीरी पंडितों के साथ वो सब हुआ जो अकल्पनीय था और फिर लाखों अपने घर से बेघर कर दिए गए.

इन दो अमानवीय भयावह समय का तो मैं भी साक्षी हूँ, मेरी उम्र तो कम है, आपकी तो कहीं अधिक है, सुना है इसके पहले भी इस देश में भीषण मारकाट हो चुकी है.

और जब पता चला कि आप तो बंटवारे में उस पार से आयी हैं तो पलायन का दर्द आप से बेहतर कौन समझ सकता है.

यही सोच कर मन में आया और जानने की इच्छा हुई कि आप से मिल कर पूछूं कि तब आपने इन समयों पर क्या क्या लौटाया था.

तभी एक खबर पढ़ी कि आप ने अपने पर लिखी एक किताब का विमोचन सिर्फ इसलिए रुकवा दिया क्योंकि वो राष्ट्रवादियों के हाथों होना था.

सुनते ही मैं ठिठका था, क्योंकि मुझ को भी अधिकांश वामपंथी-लेखक-मित्र संघी कहते हैं. जबकि मैं राहुल जी की परिभाषा के अनुसार खाकी निक्कर नहीं पहनता.

हाँ, अपने आप को संघ की विचारधारा के करीब जरूर पाता हूँ. वो भी इसलिए क्योंकि आज के समय में दुनिया के हालत को देखते हुए हिन्दुओं को जाति और वर्ग भेद मिटाते हुए एक मंच पर संगठित करना आवश्यक है.

आखिर सवाल अस्तित्व का है. और फिर इसमें बुराई भी क्या है, यह तो एक व्यवहारिक बात है. दुनिया का हर समाज किसी ना किसी रूप में संगठित होता है तो अगर हिन्दू भी हो गया तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट गया.

और फिर मैंने संघ की शाखा में कभी कोई नफरत वाली बात नहीं सुनी. वे तो ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ प्रार्थना गाने वाले लोग हैं. तो फिर सवाल उठता है अपनी मातृभूमि को नमन करने वालो से इतनी नफरत क्यों ?

वैसे मैं इसका कारण कुछ कुछ जानता हूँ. मैंने भी हिंदी लेखन में एक दशक गुजारा है. मैं जानता हूँ कि वामपंथ-समर्थक वामपंथ को ना मानने वालों से कितनी नफरत करते हैं.

इतनी कि किसी स्वतंत्र विचारधारा वाले लेखक को भी लेख, कहानी, उपन्यास छपवाना आसान नहीं और अगर छप गई तो उसकी चर्चा ना होने देना.

सम्मान-अवार्ड तो दूर की बात है, ये किसी और को अपने कार्यक्रम में बुलाते तक नहीं और किसी और के कार्यक्रम में जाते नहीं.

यह उसी विचारधारा का दुष्परिणाम है कि आपने अपनी किताब का विमोचन किसी और के हाथों होने पर विरोध किया.

ऐसे में सवाल तो यह पूछने का मन कर रहा है कि मैडम आप जैसे वरिष्ठ जन दूसरो से इतनी नफरत क्यों करते हैं? जबकि दूसरी तरफ मैंने कभी नहीं सुना कि किसी राष्ट्रवादी और संघी ने किसी वामपंथी को किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में खुले मंच से उसके आने का विरोध किया हो.

हाँ, विचारधारा का विश्लेषण और आलोचना जरूर करते हैं, वो तो मैं भी करता हूँ, मगर नफरत तो नहीं करता. शास्त्रार्थ और बॉयकॉट में तो अंतर है ना मैडम जी.

बहरहाल, अंत में आप से एक विनती है. आप से छोटा हूँ तो ज़िद भी कर सकता हूँ. यूं तो आपने बंटवारे पर खूब लिखा है, लेकिन ये आधा सच है. और जो दूसरों ने भी लिखा है वो भी भ्रमित ही करता है.

जब बंटवारा हुआ तब आप की उम्र पूरी समझ वाली थी, अर्थात आप पूरा सच जानती हैं. आप वो पूरा सच लिखिए, विचारधाराओं के तमाम चश्मे उतार कर लिखिए.

ये वो सच है जो बेहद कडुवा है. लेकिन सच तो फिर सच है और फिर इलाज भी तो कड़वी दवाई से ही होता है.

उसमें बताइये कि कैसे चीटियों को आटा और गाय को रोटी खिलाने वाले लोग बुरी तरह मसले गए. पहले पकिस्तान में, फिर अपने ही देश हिन्दुस्तान में भी.

आखिरकार कौन था जिम्मेवार, इस बंटवारे का? जो दुनिया में और कभी कहीं नहीं हुआ. कौन जवाबदार था इस खूनखराबे का? सत्ता के शीर्ष पर बैठे वे कौन लोग थे जिन्होंने लाखों बेगुनाहों को मर-कट जाने के लिए छोड़ दिया?

छोड़िये ये छिटपुट असहिष्णुता की जुगलबंदी और लिख डालिये इतिहास की सबसे बड़ी राजनैतिक साज़िश की कहानी, जिसमें दो-चार लोगों की सत्ता की भूख ने असंख्य की जान ले ली, फिर भी इन सत्ता के भूखों की भूख नहीं मिटी, जो बाद में भी जारी रही.

आप उस भयावह दौर की साक्षी पीढ़ी में से बचे हुए लोगों में भी शायद अंतिम बुद्धिजीवी लेखक हैं. जिस दिन आप इतिहास के इस काले सच को लिख देंगी, उस दिन सारा हिन्दुस्तान आप को नमन करेगा.

और ये वो सम्मान होगा जिसे कोई ज्ञानपीठ नहीं दिलवा सकता. क्योंकि यह लेखन आने वाली अनगिनत पीढ़ियों के लिए सीख भी होगा और संदेश भी. यही साहित्य का उद्देश्य है और धर्म भी.

सादर,

एक अनजान मगर स्वतंत्र लेखक
मनोज सिंह

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