मोदीमेनिया की मारी कांग्रेस पार्टी बेचारी

2012 का गुजरात विधानसभा चुनाव केवल गुजरात का विधानसभा चुनाव भर नहीं था. पूरा देश 2g, 3g, कोलगेट, जीजाजी, अगस्तावेस्टलेंड, आदर्श जैसे मनमोहनी घोटालों से त्रस्त होकर गुजरात चुनाव को बड़ी आशाभरी नजरों से देख रहा था.

क्योंकि इन चुनावों से ही 2014 के लोकसभा चुनावों में मनमोहनी नामक भ्रष्टाचार की बीमारी से छुटकारा पाने की देश को आशा थी.

जब गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम आ रहे थे तो पूरा देश सांस थामे उन परिणामों को देख रहा था.

और जैसा कि पूरे देश को आशा थी, गुजरात के वही परिणाम आये, गुजरात की जनता ने मोदी को तीसरी बार अपना मुख्यमंत्री चुन लिया.

कांग्रेस को एक बार फिर गुजरात की जनता ने सत्ता से दूर कर दिया. उस राज्य से जहां का नेता AP पर्दे के पीछे से अघोषित प्रधानमंत्री के तौर पर पूरे देश का शासन चला रहा था और हिंदू आतंकवाद के नाम पर पूरे सनातन समाज को कठघरे में खड़ाकर लक्षित साम्प्रदायिक हिंसा अधिनियम के द्वारा पूरे देश के हिन्दुओं को यजीदी बनाकर समूल नष्ट करने की योजना बना चुका था.

एक ओर जहां देश को “मनमोहनी” नामक भ्रष्टाचार की बीमारी लग गई तो दूसरी ओर गुजरात ही वो राज्य था जहां से कांग्रेस को 2002, 2007 के विधानसभा चुनाव में मोदीमेनिया नामक बीमारी लग चुकी थी.

और जो साल दर साल बढ़ती ही चली जा रही थी. इस बीमारी को रोकने के लिये मौत का सौदागर जैसे जुमलों से लेकर 2002 की हिंसा में आरोपी बनाने की हर सम्भव कोशिश की गयी. कई आयोग बनाये गये.

जांच अधिकारियों ने घंटों तक पूछताछ की. पर कांग्रेस इस मोदीमेनिया नामक बीमारी से छुटकारा न पा सकी. हालत कुछ इस तरह हो गयी कि “मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की”.

2012 की गुजरात विजय ने पूरे देश को बता दिया कि 2 साल बाद देश मनमोहनी नामक भ्रष्टाचार के साईलेंट किलर की बीमारी से मुक्त हो जायेगा. और यह सपना 2014 के लोकसभा चुनाव में सच हो गया.

आयुर्वेद के एक पुराने आयुर्वेदाचार्य चरक ने सदियों पहले एक सिद्धांत दिया था. यत्ररोगप्रादुर्भवति तत्रेवतस्यौषधि.. यानि “जो रोग जहां से प्रारंभ होता है वहीं उसकी औषधि भी होती हैं “…!!!

तो कांग्रेस को मोदीमेनिया नामक बीमारी गुजरात से ही लगी थी जो बढ़ते बढ़ते पूरे देश में इतनी फैल गई कि पार्टी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग गया… राज्यों में लगातार पराजय के बाद लोकसभा में विपक्ष का पद तक नहीं मिला… AP और उसकी सलाहकार मंडली समझ गयी कि यदि इस मोदीमेनिया नामक बीमारी से छुटकारा पाना है तो उसके नाभिकेन्द्र पर ही प्रहार करना होगा…

मरता क्या न करता… जब किसी व्यक्ति को जानलेवा लाईलाज रोग हो जाता हैं और हर नामीगिरामी डॉक्टर इलाज करने से इंकार कर देता है तो वो मरीज हर उस जगह, नीमहकीम के पास जाता हैं जहां से उसे ठीक होने की थोड़ी सी भी उम्मीद दिखाई देती हैं.

गुजरात में मोदी और कांग्रेस आज इसी दौर से गुजर रहें हैं. दोनों ही पक्षों का सब कुछ दांव पर लगा है. कांग्रेस हार्दिक, जिग्नेश, अल्पेश जैसे नीमहकीमों के दर पर लौट लगा रही है.

राहुल 2002 की हिंसा की चर्चा की बजाय मंदिरो में जा रहें हैं तो मोदी भी चुनाव से पहले बुलेट ट्रेन, रोरो फैरी से लेकर हजारों करोड़ की विकास योजनाओं की घोषणा करने के साथ गुजरात में धुआंधार रैलियां और रोड़शो कर रहे हैं… क्योकि मोदी भी जानते हैं कि वे भले ही देश के प्रधानमंत्री बन गये हो पर उनका मूल शक्तिकेन्द्र गुजरात ही हैं…

जैसे 2012 के गुजरात चुनाव ने 2014 में देश के भविष्य का निर्धारण किया था उसी प्रकार 2017 का चुनाव 2019 में भारत के भाग्य का निर्धारण करेगा.

कांग्रेस यदि इस चुनाव को जीत जाती है तो इस जीत से उसको 2019 में मोदीमेनिया से छुटकारा पाने की उम्मीद बन जायेगी क्योंकि तब वो मोदीमेनिया नामक बीमारी के शक्तिकेन्द्र को नियंत्रण में लेकर उसकी शक्ति स्त्रोत को सुखाने का पूरा प्रयास करेंगी.

पर यदि मोदी ये चुनाव जीत जाते हैं तो जिस तरह 2012 के विधानसभा चुनाव ने 2 साल बाद देश को मनमोहनी भ्रष्टाचार की बीमारी से मुक्त कर दिया था. तो इस बार का विधानसभा चुनाव 2019 में देश को कांग्रेसमुक्त करने के नारे पर आखिरी मोहर लगा देगा.

 

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